ललित निबंध
 
अपवित्रो पवित्रो वा डॉ शोभाकांत झा
अमलतास से मेरा परिचय धर्म प्रकाश जैन
अशोक के फूल हजारी प्रसाद द्विवेदी
उजाला एक विश्वास डॉ. प्रेम जनमेजय
एक फूल खिलना चाहता है गोविंद कुमार गुंजन
उम्र पचपन याद आता है बचपन भारती परिमल
कदंब का रोम रोम अनुराग नीलांबर शिशिर

कागा रे मोरे बाबुल से कहियो 

महेश परिमल
कार्तिक हे सखि पुण्य महीना मृदुला सिन्हा
कुब्जा सुंदरी कुबेरनाथ राय
खिड़की खुली हो अगर डॉ. श्रीराम परिहार
गुलमोहर दर गुलमोहर पूर्णिमा वर्मन
चिट्ठी में बंद यादें मेहरुन्निसा परवेज़
ताली तो छूट गई अज्ञेय
दीपावली का दार्शनिक पक्ष महेशचंद्र कटरपंच

बौराया फागुन होली के रंग

कपिलमुनि पंकज
महाकवि माघ का प्रभात वर्णन महावीर प्रसाद द्विवेदी
माधव और माधव नर्मदा प्रसाद उपाध्याय
यह पगध्वनि उमाकांत मालवीय
रंग बोलते हैं जयप्रकाश मानस
रिश्ते बोझ नहीं होते डॉ. महेश परिमल

रोको! यह वसंत जाने न पाए

श्यामसुंदर दूबे
लला फिर आईयो खेलन होली प्रेम जनमेजय
वसंत कहाँ हो तुम महेश परिमल
वसंत का संदेशवाहक कचनार भुवनेश्वर प्रसाद गुरुमैता
सम्मान के चीते पर सवार डॉ. श्रीराम परिहार
समय बहता हुआ दुर्गा प्रसाद शुक्ला