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लेखकों से
 १. ५. २०१७

इस पखवारे-

अनुभूति-में-
कृष्ण बक्षी, वीरेन्द्र अकेला, विमलेश त्रिपाठी, टीकमचंद ढोडड़िया तथा सुमित्रानंदन पंत की रचनाएँ।

- घर परिवार में

रसोईघर में- इस माह गर्मी के उमस भरे मौसम में हमारी रसोई संपादक शुचि प्रस्तुत कर रही हैं शीतलता से भरपूर आम की चुस्की

स्वास्थ्य में- मस्तिष्क को सदा स्वस्थ, सक्रिय और स्फूर्तिदायक बनाए रखने के २४ उपाय- ८- स्मृति पर काम करें

बागबानी- के अंतर्गत घर की सुख स्वास्थ्य और समृद्धि के लिये शुभ पौधों की शृंखला में इस पखवारे प्रस्तुत है- ८- फाइकस एली

भारत के सर्वश्रेष्ठ गाँव- जो हम सबके लिये प्रेरणादायक हैं- ८- शतप्रतिशत साक्षर पोथनिक्कड

- रचना व मनोरंजन में

क्या आप जानते हैं- इस माह (मई की विभिन्न तिथियों में) कितने गौरवशाली भारतीय नागरिकों ने जन्म लिया? ...विस्तार से

संग्रह और संकलन- में प्रस्तुत है- संजीव सलिल की कलम से कुमार रवीन्द्र के नवगीत संग्रह- ''अप्प दीपो भव'' का परिचय।

 वर्ग पहेली- २८९
गोपालकृष्ण-भट्ट-आकुल और
रश्मि-आशीष के सहयोग से


हास परिहास
में पाठकों द्वारा भेजे गए चुटकुले

साहित्य एवं संस्कृति में- 

समकालीन कहानियों में प्रस्तुत है यू.एस.ए. से
सुर्शन प्रियदर्शिनी-की-कहानी- विघटन

उस की ख़ामोशी आँखों से उतर कर ओठों पर सहम गई थी, भिंचे ओठों में कसमसा कर बैठी थी, वह जिधर अपना चेहरा घुमाती ख़ामोशी भी उस के साथ लिपटी-लिपटी घिसट जाती थी पर अंदर कुछ फड़फड़ा कर उड़ने को आतुर था। इस समय जानबूझ कर किसी ने उस के पंखों को हाथ में मरोड़ कर रखा था। पर तुम्हें कुछ तो अंदाज रहा होगा - अंदर से फड़फड़ा कर कूद गये थे मेरे शब्द। था... लेकिन इतना तो बिलकुल नहीं। खिड़की के बाहर बर्फ का साम्राज्य फैला हुआ था दूर तक। यहाँ तक कि जो सड़क कल तक एक दरीच की तरह नजर आती थी वह भी कहीं इस सफेद चादर के नीचे दफन हो गई थी। ऐसे में किसी कार का आना - जाना भी नहीं था जो इस बर्फीली ख़ामोशी में अपनी मोहर लगा सकती और इस चुप्पी को तोड़ सकती। इतनी भी क्या बेरुखी अपने प्रति कि सामने आती बाढ़ की उछाल न दिखाई दे, मैं अपने आप में फुसफुसाया। जानती हो यह कितना गलत हुआ है। इस पर भी वह चुप थी। इस समय शायद हम दोनों के बीच कुछ फड़फड़ा रहा था, बाहर आने को आतुर... पर उस की ख़ामोशी उसको ढँके हुए थी। उस की उदासी मुझे भी छूने लगी थी।...आगे-
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सुशील यादव का व्यंग्य
मंगल ग्रह पर पानी 
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सतीश जायसवाल का यात्रा संस्मरण
अभी जो है जीवन है
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राजेन्द्र वर्मा से रचना प्रसंग
गजल का शिल्प

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पुनर्पाठ में अतुल अरोरा के संस्मरण
''बड़ी सड़क की तेज गली में'' का ग्यारहवाँ भाग

पिछले पखवारे-

विनोद कुमार दवे का
व्यंग्य- मोबाइल
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विमलेश त्रिपाठी का आलेख
हिंदी कविता के दो अतिवाद
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पर्व परिचय में अग्निशेखर से जानें
'नवरेह' है कश्मीरियों का विशेष नवसंवत्सर

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पुनर्पाठ में अतुल अरोरा के संस्मरण
''बड़ी सड़क की तेज गली में'' का दसवाँ भाग

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समकालीन कहानियों में प्रस्तुत है भारत से
सुमति सक्सेना लाल-की-कहानी- आखिरी घर

अजब लगता है सोच कर कि किस्मत ने मुझे ज़िंदगी के आखि़री मुहाने पर अपने घर के इतना नज़दीक पहुँचा दिया, फिर भी इतना दूर। थोड़ा सा टहल कर उस घर के आस-पास जाने की इच्छा तक नहीं होती। कौन है भला मेरा वहाँ। मुझे तो कुछ भी नहीं पता कैसी थी बापू की पत्नी। कितने बच्चे थे उनके। जाऊँ उस घर में तो क्या बताऊँ उन सबको? ईंट गारे से बने मकान भर को क्या घर पुकारा जा सकता है? सोचती हूँ बगल में अब कौन रहता होगा? ओम प्रकाश या कोई और? क्या करना है मुझे। अब तो कुछ जानने सोचने की इच्छा भी नहीं होती। इसी सड़क पर कोठियों के पीछे बनी गली के उस ओर था हमारा छोटा सा घर। यहीं के गर्वन्मैंट गर्ल्स स्कूल में पढ़ती थी मैं। उस घर के आँगन और सामने की गली में खेलते-कूदते सोचा था कहीं, कि थोड़ी ही दूर पर बने इस वृद्धा आश्रम में बीतेंगे मेरी ज़िन्दगी के आखि़री दिन। शाम होती है तो आकर खिड़की पर खड़ी हो जाती हूँ। धुंधलका होने से पहले ही पूरे बाजार की रोशनियाँ जल जाती हैं। इतनी तेज़ चमक के साथ कि आँखें चौंधियाने लगती हैं।...आगे-

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यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को प्रकाशित होती है।


प्रकाशन : प्रवीण सक्सेना -|- परियोजना निदेशन : अश्विन गांधी
संपादन, कलाशिल्प एवं परिवर्धन : पूर्णिमा वर्मन

 
सहयोग : कल्पना रामानी
 

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