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लेखकों से
 १. ६. २०१९

इस माह-

अनुभूति में-
मंजुलता श्रीवास्तव, मंजुल मंजर, अनिता कपूर, परमजीत कौर रीत और बनवारीलाल खामोश की रचनाएँ।

-- घर परिवार में

रसोईघर में- गरमी के मौसम में नर्म तरावट के लिये हमारी रसोई संपादक शुचि प्रस्तुत कर रही हैं- स्ट्राबेरी हिमानी

स्वास्थ्य में- २४ आसान सुझाव जो जल्दी वजन घटाने में सहायक हो सकते हैं- ११- नमकीन इकट्ठा न करें और १२- सुबह का नाश्ता ३०० कैलोरी।

बागबानी- तीन आसान बातें जो बागबानी को सफल, स्वस्थ और रोचक बनाने की दिशा में उपयोगी हो सकते हैं-  कुछ उपयोगी सुझाव-

अभिरुचि में- विभिन्न देशों के व्यक्तिगत डाक-टिकटों की जानकारी से सम्बंधित पूर्णिमा वर्मन का आलेख- डाकटिकटों पर कमल का फूल

- रचना व मनोरंजन में

क्या आप जानते हैं- इस माह (जून) की विभिन्न तिथियों में) कितने गौरवशाली भारतीय नागरिकों ने जन्म लिया? ...विस्तार से

संग्रह और संकलन- में प्रस्तुत है- आचार्य संजीव वर्मा सलिल की कलम से मधुकर अष्ठाना के नवगीत संग्रह- पहने हुए धूप के चेहरे का परिचय। 

वर्ग पहेली- ३१४
गोपालकृष्ण-भट्ट-आकुल और
रश्मि-आशीष के सहयोग से


हास परिहास
में पाठकों द्वारा भेजे गए चुटकुले

साहित्य एवं संस्कृति में- 

समकालीन कहानियों में भारत से सुशांत सुप्रिय
की कहानी- तितलियाँ

बाईसवीं सदी में एक दिन देश में ग़ज़ब हो गया। सुबह लोग सो कर उठे तो देखा कि चारों ओर तितलियाँ ही तितलियाँ हैं। गाँवों, क़स्बों, शहरों, महानगरों में जिधर देखो उधर तितलियाँ ही तितलियाँ थीं। घरों में तितलियाँ थीं। बाजारों में तितलियाँ थीं। खेतों में तितलियाँ थीं। आँगनों में तितलियाँ थीं। गलियों-मोहल्लों में, सड़कों-चौराहों पर करोड़ों-अरबों की संख्या में तितलियाँ ही तितलियाँ थीं। दफ़्तरों में तितलियाँ थीं। मंत्रालयों में तितलियाँ थीं। अदालतों में तितलियाँ थीं। अस्पतालों में तितलियाँ थीं। तितलियाँ इतनी तादाद में थीं कि लोग कम हो गए, तितलियाँ ज़्यादा हो गईं। सामान्य जन-जीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया। लगता था जैसे तितलियों ने देश पर हमला बोल दिया हो।
दिल्ली में संसद का सत्र चल रहा था। तितलियाँ भारी संख्या में लोकसभा और राज्यसभा में घुस आईं। दर्शक-दीर्घा में तितलियाँ ही तितलियाँ मँडराने लगीं। अध्यक्ष और सभापति के आसनों के चारों ओर तितलियाँ ही तितलियाँ फड़फड़ाने लगीं। आख़िर दोनों सदनों की कार्रवाई दिन भर के लिए स्थगित करनी पड़ी।  आगे...
*

अंतरा करवड़े की
लघुकथा- शाश्वत
*

अजयेन्द्रनाथ त्रिवेदी का
ललित निबंध- कदंब कहाँ है
*

रचना प्रसंग में कुमार रवींद्र का आलेख
कविता की मिथकीय भंगिमा  
*

पुनर्पाठ में गुरमीत बेदी के साथ
पर्यटन- चंबा की घाटी में

पिछले अंक-में--- शीशम विशेषांक

पंचतंत्र से लघुकथा-
जुलाहा और यक्ष
*

डॉ विद्युल्लता का ललित निबंध
शीशम कितना मनोहारी
*

मुकेश कुमार पारीख की कलम से
भारत का प्रमुख पेड़ शीशम
*

पुनर्पाठ में गिरीश भंडारी का आलेख
वृक्ष : भिन्न देश-भिन्न परम्पराएँ
*

वरिष्ठ कथाकारों की प्रसिद्ध कहानियों के स्तंभ गौरव गाथा में प्रस्तुत है जैनेंद्र की कहानी- तत्सत

एक गहन वन में दो शिकारी पहुँचे। वे पुराने शिकारी थे। शिकार की टोह में दूर-दूर घूम रहे थे, लेकिन ऐसा घना जंगल उन्हें नहीं मिला था। देखते ही जी में दहशत होती थी। वहाँ एक बड़े पेड़ की छाँह में उन्होंने वास किया और आपस में बातें करने लगे।
एक ने कहा, "आह, कैसा भयानक जंगल है।"
दूसरे ने कहा, "और कितना घना!"
इसी तरह कुछ देर बात करके और विश्राम करके वे शिकारी आगे बढ़ गए।
उनके चले जाने पर पास के शीशम के पेड़ ने बड़ से कहा, "बड़ दादा, अभी तुम्हारी छाँह में ये कौन थे? वे गए?" बड़ ने कहा,
"हाँ गए। तुम उन्हें नहीं जानते हो?"
शीशम ने कहा, "नहीं, वे बड़े अजब मालूम होते थे। कौन थे, दादा?''
दादा ने कहा, "जब छोटा था, तब इन्हें देखा था। इन्हें आदमी कहते हैं। इनमें पत्ते नहीं होते, तना ही तना है। देखा, वे चलते कैसे हैं? अपने तने की दो शाखों पर ही चलते चले जाते हैं।"
शीशम- "ये लोग इतने ही ओछे रहते हैं, आगे...

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यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को प्रकाशित होती है।


प्रकाशन : प्रवीण सक्सेना -|- परियोजना निदेशन : अश्विन गांधी
संपादन, कलाशिल्प एवं परिवर्धन : पूर्णिमा वर्मन

 
सहयोग : कल्पना रामानी
 

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