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. 4. 2007

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हास्य व्यंग्य

इस सप्ताह—

समकालीन कहानियों में
भारत से एस आर हरनोट की कहानी चश्मदीद
जज महोदय ने एक सरसरी निगाह सुमना पर डाली। उन्हें लगा जैसे एक छोटा-सा गाँव उस लड़की के साथ कटघरे में खड़ा हो गया हो। उलझे हुए बाल. . .जैसे कई महीनों से धोए ही न हो। कई लटें माथे से गालों पर गिरती-पड़ती। शर्मसार आँखें। जैसे तमाम दुनिया की लज्जा उनमें समा गई हो। सिर पर ओढ़ी मैली-सी चुनरी। मुरझाया हुआ चेहरा। सूखे-फटे ओंठ। पीड़ाओं से लदे-भरे। उन्हें मिट्टी और गोबर की गंध अपनी तरफ़ आती महसूस हुई. . .जैसे वे किसी न्याय-गद्दी पर नहीं बल्कि गाँव के किसी खेत की मुँडेर पर बैठे हो। कार्यवाही शुरू हो गई। भीतर गहरा सन्नाटा पसर गया था। प्रतिवादी पक्ष का वकील अपनी जगह से उठा। लंबा काला चोगा सँभाला और सुमना के पास जा कर खड़ा हो गया।

*

हास्य-व्यंग्य में
डॉ. नवीन चंद्र लोहानी का आलेख वाह डकैत हाय पुलिस
एंकर परेशान था, उत्तेजना में था, खुश था, वह हाथ नचा रहा था, खीसें निपोर रहा था। उँगली से इशारा कर रहा था। तेज़ी में था। पुलिस को डपट रहा था। डकैत की जी हुज़ूरी कर रहा था। बार-बार डकैत को श्री के संबोधन से नवाज़ता, उसकी सुरक्षा के लिए पुलिस को कठघरे में खड़ा करता और बार-बार अपने चैनल की तारीफ़ करता। टेलिविजन के इतिहास की ज़िक्र करता बताता जो उनका चैनल दिखा रहा है आज तक किसी ने नहीं दिखाया। हाय-हाय पुलिस तुम जिसे नहीं खोज पाए हमारा संवाददाता करा लाया।

*

दृष्टिकोण में महेश चंद्र द्विवेदी की कलम खोल रही है
भारतीय दंड-संहिता की कमज़ोर कड़ियाँ
अनेक प्रकरणों में वादी को खुश करने के लिए पुलिस एफ. आई. आर. लिख तो लेती है लेकिन एफ.आई. आर. की भाषा ऐसी कर देती है कि संज्ञेय अपराध भी असंज्ञेय हो जाता है- मान लीजिए पिटते-पिटते आप की हड्डी क्रैक हो गई तो पुलिस उसे तब तक क्रैक क्यों माने जब तक डाक्टर क्रैक होने का सर्टीफ़िकेट न दे दे या आप उसे ऐसा मनवाने के लिए 'खुश़' न कर दें। अगर पुलिस 'खुश' हो गई तो वह अभियुक्त की तुरंत गिरफ़्तारी भी कर लेगी, नहीं तो आप से डाक्टरी मुआइना करा कर रिपोर्ट लाने को कह देगी। अब डाक्टर साहब को आप 'खुश' न कर पाए तो वह आप की चोट को सरसरी निगाह से देखकर 'सिंपल इंजरी' लिख देंगे।

*

संस्मरण में
भीष्म साहनी की आपबीती- हानूश का जन्

''हानूश'' नाटक की प्रेरणा मुझे चेकोस्लोवेकिया की राजधानी प्राग से मिली। यूरोप की यात्रा करते हुए एक बार शीला और मैं प्राग पहुँचे। उन दिनों निर्मल वर्मा वहीं पर थे। होटल में सामान रखने के फौरन बाद मैं उनकी खोज में निकल पड़ा। उस हॉस्टल में जा पहुँचा जिसका पता पहले से मेरे पास था। कमरा तो मैंने ढूँढ़ निकाला, पर पता चला कि निर्मल वहाँ पर नहीं हैं। संभवतः वह इटली की यात्रा पर गए हुए थे। बड़ी निराशा हुई। पर अचानक ही, दुसरे दिन वह पहुँच भी गए और फिर उनके साथ उन सभी विरल स्मारकों, गिरजा स्थलों को देखने का सुअवसर मिला, विशेषकर गॉथिक और 'बरोक' गिरजाघरों को जिनकी निर्मल को गहरी जानकारी थी।

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महानगर की कहानियों में
कृष्णानंद कृष्ण की लघुकथा स्वाभिमानी
बरामदे में बैठे-बैठे वे विचारों के समुद्र में गोते लगा रहे थे। कभी सामने रोशनदान के ऊपर बैठे चिड़ा-चिड़ी को देखते तो कभी अपने वर्तमान और अतीत में झाँकते। और कभी वे अतीत के आत्मीय क्षणों को पकड़ने की कोशिश करते, किंतु बार-बार फिसल जाते थे। रोशनदान में लगाए गए घोंसले के भीतर चिड़ा-चिड़ी के बच्चे भूख से चिल्ला रहे थे। एक समय उनकी भी ऐसी ही स्थिति थी। वे भी अपने बच्चों के पालन-पोषण में व्यस्त रहते थे। उनके लिए येन-केन-प्रकारेण सारी सुविधाएँ जुटाने में वे कभी हिचकते नहीं थे। कभी किसी को तकलीफ़ नहीं होने दी।


सप्ताह का विचार
बैर क्रोध का अचार या मुरब्बा है।
–आचार्य रामचंद्र शुक्ल

 

आशुतोष दुबे, अंजना संधीर, बशीर अतहर, चक्रधर शुक्ल और  सुनील जोगी की नई रचनाएँ

ताज़ा हिंदी चिट्ठों के सारांश
नारद से

-पिछले अंकों से-
कहानियों में

बैसाखियाँ - इला प्रसाद
पगडंडियों की आहटें - जयनंदन
अगर वो उसे माफ़ कर दे-अर्चना पेन्यूली
होली का मज़ाक- यशपाल
एक और सूरज- जितेन ठाकुर
शिवः माम् मर्षयतु- लोकबाबू

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हास्य व्यंग्य में

जिस रोज़ मुझे भगवान...-तरुण जोशी
ग्लोबल
वार्मिंग...-शास्त्री नित्यगोपाल कटारे
आखिर ऐसा क्यों होता है?-अलका पाठक
काव्य कामना-अशोक चक्रधर

*

प्रौद्योगिकी में
श्रीश बेंजवाल शर्मा सिखा रहे हैं
कंप्यूटर पर यूनिकोड हिंदी टाइपिंग

*

विज्ञानवार्ता मे
गुरु दयाल प्रदीप सुलझा रहे हैं
रचना-प्रक्रिया की प्रक्रिया

*

प्रकृति और पर्यावरण में
स्वाधीन की पड़ताल
गरमाती धरती घबराती दुनिया

*

आज सिरहाने
ज्ञानप्रकाश विवेक का उपन्यास
दिल्ली दरवाज़ा

*

संस्कृति में
ममता भारती का आलेख
संस्कृति में सात का महत्

*

साक्षात्कार में
मधुलता अरोरा की बातचीत
महिलावादी कार्यकर्ता
दिव्या जैन से

*

महानगर की कहानियों में
सुवर्ण शेखर दीक्षित की लघुकथा
कल्पवृक्

*

रसोईघर में
गृहलक्ष्मी पका रही हैं
बेक्डबीन आलू कैसरोल

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प्रकाशन : प्रवीण सक्सेना -|- परियोजना निदेशन : अश्विन गांधी
संपादन¸ कलाशिल्प एवं परिवर्धन : पूर्णिमा वर्मन
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सहयोग : दीपिका जोशी

 

 

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