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६. ५. २१३

इस सप्ताह-

अनुभूति में- श्यामनारायण मिश्र, बसंत ठाकुर, वशिनी शर्मा, रामसनेहीलाल शर्मा यायावर और संतोष कुमार खरे की रचनाएँ।

- घर परिवार में

रसोईघर में- हमारी रसोई संपादक शुचि इस बार प्रस्तुत कर रही हैं विदेशी व्यंजनों के क्रम में- चटपटे कुरकुरे आलू

रूप-पुराना-रंग नया- शौक से खरीदी गई सुंदर चीजें पुरानी हो जाने पर फिर से सहेजें रूप बदलकर- ढक्कनों के लिये विशेष स्थान

सुनो कहानी- छोटे बच्चों के लिये विशेष रूप से लिखी गई छोटी कहानियों के साप्ताहिक स्तंभ में इस बार प्रस्तुत है कहानी- खाने का समय

- रचना और मनोरंजन में

नवगीत की पाठशाला में- कार्यशाला- २७ का विषय है पेड़ नीम का छायावाला। विस्तार से जानने के लिये कृपया यहाँ देखें।

साहित्य समाचार में- देश-विदेश से साहित्यिक-सांस्कृतिक समाचारों, सूचनाओं, घोषणाओं, गोष्ठियों आदि के विषय में जानने के लिये यहाँ देखें।

लोकप्रिय कहानियों के अंतर्गत- २४ मार्च २००५ को प्रकाशित कमला सरूप की नेपाली कहानी का हिंदी रूपांतर यादों की अनुभूतियाँ

वर्ग पहेली-१३२
गोपालकृष्ण-भट्ट
-आकुल और रश्मि आशीष के सहयोग से

सप्ताह का कार्टून-
कीर्तीश की कूची से

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साहित्य एवं संस्कृति में-

वरिष्ठ कथाकारों की प्रसिद्ध कहानियों के स्तंभ गौरवगाथा में मृदुला गर्ग की कहानी बेनाम रिश्ता

चित्राजी निमंत्रण-पत्र के साथ हाथ से लिखे मनुहार पत्र के हर अक्षर को अपनी नजरों से आँकती उनमें अंतर्निहित भावों को सहलाने लगीं। कई बार पढ़े पत्र। सोचा विवाह में इकट्ठे लोग पूछेंगे—मैं कौन हूँ? क्या रिश्ता है शालिग्रामजी से मेरा? क्या जवाब दूँगी मैं? क्या जवाब देंगे शालिग्रामजी? दोनों के बीच बने संबंध को मैंने कभी मानस पर उतारा भी नहीं। नाम देना तो दूर की बात थी। बार-बार फटकारने के बाद भी वह अनजान, अबोल और बेनाम रिश्ता चित्राजी को जाना-पहचाना और बेहद आत्मीय लगने लगा था। कभी-कभी उसके बड़े भोलेपन से भयभीत अवश्य हो जाती थीं और तब उस रिश्ते के नामकरण के लिए मानो अपने शब्द भंडार में इकट्ठे हजारों शब्दों को खंगाल जातीं। नहीं मिला था नाम। और जब नाम ही नहीं मिला तो पुकारें कैसे? सलिए सच तो यही था कि उन्होंने कभी उस रिश्ते को आवाज नहीं दी। रिश्ते के जन्म और अपनी जिंदगी के रुक जाने के समय पर भी नहीं। जिंदगी के पुनःचालित होकर उसकी भाग-दौड़ में भी नहीं।
...आगे-

*

रघुविन्द्र यादव की लघुकथा
संस्कार
*

नचिकेता का रचना प्रसंग
गीत के विकास में बिहार का योगदान
*

सतीश जायसवाल का यात्रा संस्मरण
मायावी कामरूप का रूप
*

पुनर्पाठ में तेजेन्द्र शर्मा का आलेख
यूनाइटेड किंगडम का हिन्दी कथा साहित्य
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पिछले सप्ताह-


संजीव निगम का व्यंग्य
अफसरी के प्यार में
*

डॉ. प्रेमचन्द्र गोस्वामी का आलेख
हिन्दी पत्रकारिता के पुरोधा: गणेश शंकर विद्यार्थी
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नर्मदा प्रसाद उपाध्याय का
ललित निबंध- गुलमोहर गर्मियों के
*

पुनर्पाठ में मीनाक्षी धन्वन्तरि का
यात्रा संस्मरण- रियाध के पार दुबई में
*

समकालीन कहानियों में भारत से
पद्मा शर्मा की कहानी- फन्दा

रात को ही सोचकर सोयी थी कि सुबह आराम से उठूँगी अक्सर रविवार की सुबह देर से ही उठना होता फोन की घण्टी ने अचानक ही नींद से जगा दिया कनफोड़़ू और कर्कश लग रही थी फोन की घण्टी अलसाते हुए सब एक-दूसरे को ताकते प्रतीक्षा कर रहे थे कि कोई रिसीवर उठाने की पहल करे ‘‘देखो तुम्हारा ही होगा’’ कहते हुए मृगांक ने ताकीद दी मैंने अलसाकर और मन ही मन भुनभुनाकर रिसीवर मुँह पर लगाते हुए कहा-‘‘हलो’’..... उधर से कानों में रस टपकाती लड़की की आवाज आयी-‘‘ जी आप पूर्णिमा जी बोल रही हैं मैंने मैंने झल्लाते हुए कहा ‘जी कहिए।’ उधर से आवाज आयी-‘‘....देखिए सौ लोगों में से आपके नाम का ड्रा निकला है। आपके नाम एक लाख रुपये का इनाम है इसलिए हमने आपको फोन लगाया हैं।’’ मैं सोचने लगी आए दिन सुनते रहते थे कि आजकल कई कम्पनियाँ इनाम के नाम पर आम जनता को बेवकूफ बना रही हैं उस लड़की की बात सुनते ही मैं सतर्क हो गयी मैंने कहा, ‘‘कैसा इनाम?’’...आगे-

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"अभिव्यक्ति" व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को प्रकाशित होती है।


प्रकाशन : प्रवीण सक्सेना -|- परियोजना निदेशन : अश्विन गांधी
संपादन, कलाशिल्प एवं परिवर्धन : पूर्णिमा वर्मन
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सहयोग : कल्पना रामानी

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