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समकालीन कहानियों में
इस माह
प्रस्तुत है-
भारत से
कल्पना मनोरमा की
कहानी
प्रतिफल

वे
फरवरी की उतरती सर्दी के दिन थे। पवन तितलियों के साथ
अठखेलियाँ करते हुए गुनगुनाने लगी थी। उन्हीं दिनों ललिता पति
के साथ ट्रांसफर होकर सहारनपुर आई थी। रहने के लिए रेलवे
कॉलोनी में एक सरकारी आवास मिला था, जो उसे बिल्कुल अच्छा नहीं
लगा था। घर बड़ा था, लेकिन उसकी दीवारों की जर्जरता देखकर वह
कराह उठी थी। पति की नौकरी इसीलिए उसे कभी भी अच्छी नहीं लगी
थी। नए ऑफिस की भाग-दौड़ में उसका पति ऐसा जुटा कि उसे ललिता
और बच्चों की कोई सुध नहीं रह गई थी। ललिता अकेले अपनी बिटिया
रूपाली और बेटे धीरू के साथ घर के सामान को व्यवस्थित कर
धीरे-धीरे जमाने लगी थी। वैसे तो
ललिता दिन भर नए सरकारी आवास को सजाने-संवारने में लगी रहती,
लेकिन ...आगे-
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