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अंतरराष्ट्रीय हिंदी पत्रिकाएँ:
कागज से क्लाउड तक का सफर
- पूर्णिमा वर्मन


जब हम अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं की बात करते हैं, तो भारत सहित अनेक देशों में प्रकाशित विविध विधाओं और स्वरूपों की पत्रिकाएँ ध्यान में आती हैं। इनका वितरण क्षेत्र अलग-अलग है—कुछ सीमित भौगोलिक क्षेत्रों तक केंद्रित हैं, तो कुछ वैश्विक स्तर पर सक्रिय हैं। प्रकाशन के माध्यम के आधार पर इन्हें तीन श्रेणियों में बाँटा जा सकता है: मुद्रित (कागज पर), ऑनलाइन (वेब पर), और हाइब्रिड (कागज और वेब दोनों पर)। अक्सर देखा जाता है कि किसी पत्रिका का मुद्रित संस्करण देश के भीतर लोकप्रिय होता है, जबकि उसका वेब संस्करण प्रवासियों और विदेशी पाठकों के बीच संवाद का सेतु बनता है। यह लेख मुख्य रूप से उन पत्रिकाओं पर केंद्रित है जिनका प्रकाशन और प्रसार अंतरराष्ट्रीय है।

वेब पत्रिकाओं के विविध रूप और चुनौतियाँ
वेब प्रकाशन के क्षेत्र में तकनीकी विकास ने कई शैलियों को जन्म दिया है, जैसे—पीडीएफ (PDF), फ्लिपबुक, इंटरएक्टिव वेब पोर्टल और ई-पत्रिकाएँ। कुछ पत्रिकाओं को केवल ऑनलाइन पढ़ा जा सकता है, जबकि कुछ 'डाउनलोड' की सुविधा देती हैं ताकि पाठक उन्हें ऑफलाइन भी पढ़ सकें।

हालाँकि, यहाँ एक तकनीकी और विधागत द्वंद्व भी है। इंटरनेट पर कई ऐसी वेबसाइटें हैं जहाँ सामग्री बिना किसी निश्चित तिथि या अंक के निरंतर जोड़ी जाती रहती है। वहाँ पाठक के लिए यह समझना कठिन होता है कि पत्रिका का स्वरूप साप्ताहिक है, मासिक है या अनियतकालीन। ऐसी वेबसाइटों को 'पत्रिका' की श्रेणी में रखा जाए या केवल 'वेब पोर्टल' माना जाए, यह आज भी चर्चा और विवाद का विषय है।

मुद्रित पत्रिकाओं का डिजिटल अवतार भारत की प्रतिष्ठित मुद्रित पत्रिकाएँ जैसे वागर्थ, अमृत प्रभात, हरिगंधा, और मधुमती अब वेब पर भी निःशुल्क उपलब्ध हैं। डिजिटल उपलब्धता के कारण विदेशों में बैठा पाठक न केवल इन्हें पढ़ सकता है, बल्कि भविष्य के संदर्भ के लिए सुरक्षित भी रख सकता है। इसके अतिरिक्त, ब्लॉगर और वर्डप्रेस जैसे प्लेटफॉर्म्स पर भी अनेक पत्रिकाएँ सक्रिय हैं, जिनके पाठकों की संख्या हजारों में है।

हिंदी इंटरनेट का शुरुआती दौर: ब्लॉगर से पहले की दुनिया
यह एक आम धारणा है कि वेब पर आम आदमी के लिए ठिकाने 'ब्लॉगर' के आने के बाद शुरू हुए, लेकिन वास्तविकता अलग है। १९९५ के दौर में, जब मैंने प्रतिदिन ६-८ घंटे वेब सर्फिंग शुरू की थी, तब भी कई हिंदी साइटें मौजूद थीं। उस समय तकनीक इतनी उन्नत नहीं थी; कुछ साइटें अलग-अलग हिंदी फोंट्स का उपयोग करती थीं, तो कुछ देवनागरी लिपि को 'इमेज' (Image) बनाकर अपलोड करती थीं।

उस समय हम इन्हें 'वेब होम' या हिंदी में 'जालघर' कहते थे। 'जियोसिटीज' (GeoCities) और 'एँजिलफायर' (AngelFire) उस दौर के प्रमुख वेब होस्ट थे। दिलचस्प तथ्य यह है कि ब्लॉगर का जन्म इसके चार साल बाद १९९९ में हुआ था। १९९५ से पहले भी कुछ साइटें रही होंगी (जैसे पारिजात फोंट में बनी देशभक्ति की कविताओं की साइटें), लेकिन तकनीक और संरक्षण के अभाव में वे आज वेब पर जीवित नहीं हैं।

एक विस्मृत सितारा: राज जैन और 'आखर'
१९९५-९६ के आसपास बेंगलुरु के राज जैन ने एँजिलफायर पर एक महत्वपूर्ण जालघर बनाया था। राजस्थान के मूल निवासी राज जैन अपनी सरल और मर्मस्पर्शी कविताओं के लिए प्रसिद्ध थे। उनके जालघर 'राज जैन्स पोइट्री' पर गीत, गजल और अंग्रेजी रचनाओं का सुंदर संग्रह था। उन्होंने 'आहट' (जियोसिटीज पर) और 'आखर' जैसे अन्य प्रयोग भी किए। वे 'साउथ एशियन वुमेन फोरम' के भी नियमित लेखक थे। उनके गीत "ये कैसी मीठी उलझन है" को अमेरिका के शेखर और तेजस्विनी फाटक ने स्वरबद्ध किया था। २00१ में 'अनुभूति' के आरंभ से ही वे हमारे साथ जुड़े रहे, किंतु दुर्भाग्यवश हृदयाघात के कारण असमय ही वे हमें छोड़कर चले गए।

हिंदी वेब पत्रकारिता के मील के पत्थर: १९९७ से २००० का दौर
काव्यालय: एक डिजिटल कविता क्रांति १९९७ में वाणी मुरारका ने 'काव्यालय' ([संदिग्ध लिंक हटा दिया गया]) की स्थापना की, जो हिंदी काव्य जगत के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ था। कोलकाता में सॉफ्टवेयर व्यवसाय से जुड़ी और बाद में अमेरिका से कंप्यूटर विज्ञान में पी.एच.डी. करने वाली वाणी जी स्वयं एक संवेदनशील कवि और चित्रकार हैं। उस दौर में, जब भारत में इंटरनेट अपनी शैशवावस्था में था, एक निःशुल्क हिंदी काव्य मंच की कल्पना करना भी कठिन था। 'काव्यालय' न केवल अपनी मौलिक वैचारिकता के लिए जाना गया, बल्कि इसने बाद में आने वाली अनेक हिंदी वेबसाइटों के लिए 'प्रेरणा स्रोत' का कार्य किया।

उद्गम और तकनीकी नवाचार
१५ जनवरी १९९९ को अमेरिका से अंशु श्रीवास्तव और लोकेश जौहरी के संपादन में 'उद्गम' का प्रकाशन शुरू हुआ। यह सही अर्थों में एक व्यवस्थित वेब पत्रिका थी, जो कहानी, कविता, लेख और कला जैसे स्तंभों में विभाजित थी। विशेष बात यह थी कि यूनिकोड के अभाव वाले उस दौर में इन्होंने पत्रिका के लिए अपना स्वयं का हिंदी फोंट विकसित किया था। दुर्भाग्यवश, यह पत्रिका २००५ के आसपास बंद हो गई।

साहित्य कुंज और सुमन कुमार घई
कनाडा से हिंदी के विकास में सुमन कुमार घई का योगदान अतुलनीय है। उन्होंने 'जियोसिटीज' पर शेरो-शायरी और रामचरितमानस का एक विशाल संकलन तैयार किया था। सुमन जी 'अभिव्यक्ति' में 'कनाडा कमान' स्तंभ के माध्यम से वहां की सांस्कृतिक गतिविधियों से पाठकों को जोड़ते रहे हैं। वर्तमान में वे 'साहित्य कुंज' पत्रिका और 'हिंदी राइटर्स गिल्ड' के माध्यम से वैश्विक हिंदी जगत को समृद्ध कर रहे हैं।

अभिव्यक्ति और अनुभूति की विकास यात्रा
१९९५ में इंटरनेट पर अपनी बात रखने की असीम संभावनाओं ने मुझे प्रभावित किया। १९९६ में मैंने 'जियोसिटीज' पर अपना पहला जालघर बनाया। मेरी रुचि जावा स्क्रिप्ट के माध्यम से कविताओं और चित्रों को सजीव (चलता फिरता दिखाने में) बनाने में थी। जो मूवी जैसा दृश्य उत्पन्न करते थे। कालाँतर में यही प्रयोग १५ अगस्त २००० को 'अभिव्यक्ति' और 'अनुभूति' नामक दो स्वतंत्र पत्रिकाओं के रूप में विकसित हुए। २००१ से पाक्षिक और २००८ से साप्ताहिक होने वाली ये पत्रिकाएँ आज भी पुरालेखों के साथ पाठकों के लिए उपलब्ध हैं, जिनमें भारतीय साहित्य, संस्कृति और दर्शन का विशाल संकलन है।

हिंदी वेब फोंट के जनक: हर्ष कुमार
१९९६ में हिंदी वेब फोंट के क्षेत्र में हर्ष कुमार ने ऐतिहासिक कार्य किया। उन्होंने 'जियोसिटीज' पर 'सुशा' (Shusha) फोंट का बीटा संस्करण जारी किया। यह हिंदी का पहला वेब फोंट था, जिसने 'अभिव्यक्ति', 'अनुभूति' और 'काव्यालय' जैसी वेबसाइटों को एक नई पहचान दी। हर्ष जी, जो भारतीय रेल में उच्च पद पर कार्यरत रहे हैं, एक कुशल टेक्नोक्रेट होने के साथ-साथ 'एक भेंट' और 'बेटी' जैसे काव्य संग्रहों के रचयिता भी हैं।

तकनीकी सारथी: रवि रतलामी और रोहित कुमार 'हैप्पी'
हिंदी की तकनीकी क्रांति में रवि रतलामी (रविशंकर श्रीवास्तव) का नाम अग्रणी है। वे एक टेक्नोक्रेट और वरिष्ठ तकनीकी लेखक हैं, जिन्होंने 'अभिव्यक्ति' के माध्यम से हजारों पाठकों को कंप्यूटर पर हिंदी के उपयोग का प्रशिक्षण दिया। इसी प्रकार, न्यूजीलैंड से रोहित कुमार 'हैप्पी' ने 'भारत दर्शन' का प्रकाशन शुरू किया। न्यूजीलैंड में हिंदी के प्रचार-प्रसार और विशेषकर कोविड काल के दौरान महत्वपूर्ण वेबिनार आयोजित करने में उनकी भूमिका सराहनीय रही है।

वैश्विक विस्तार: फिजी से नॉर्वे तक हिंदी की गूँज
जियोसिटीज का अंत और 'वेबैक मशीन' की भूमिका जियोसिटीज (GeoCities) जैसी सेवाओं के बंद हो जाने से शुरुआती दौर के कई महत्वपूर्ण जालघर आज सीधे उपलब्ध नहीं हैं। हालाँकि, 'वेबैक मशीन' (Wayback Machine) के आर्काइव्स में इनके कुछ अंश आज भी सुरक्षित हैं। व्यक्तिगत शोध के दौरान मुझे राज जैन की साइट का १५ जनवरी १९९९ का सबसे पुराना सुरक्षित अंक मिला है। यह आशा की जानी चाहिए कि किसी न किसी डिजिटल लाइब्रेरी में ये ऐतिहासिक पन्ने सुरक्षित होंगे, जो भविष्य में हिंदी इंटरनेट के इतिहास की प्रामाणिकता सिद्ध करेंगे।

फिजी में हिंदी पत्रकारिता और ई-क्रांति
फिजी के पूर्व मंत्री और हिंदी प्रेमी डॉ. विवेकानंद शर्मा का इस दिशा में योगदान स्मरणीय है। उनके प्रयासों से १९८२ में 'उदयाचल' और 'प्रशांत समाचार' जैसे प्रकाशन शुरू हुए। ९० के दशक में 'संस्कृति' और 'लहर' जैसी पत्रिकाओं ने फिजी में हिंदी को जीवित रखा। हालाँकि, फिजी की पहली पूर्ण ई-पत्रिका २६ अगस्त २०२० को 'इंडिया फिजी फ्रेंडशिप फोरम' (IFFF) द्वारा लॉन्च की गई। इसका मुख्य उद्देश्य युवाओं को हिंदी और साझा सांस्कृतिक विरासत से जोड़ना है।

यूरोप, ब्रिटेन और मध्यपूर्व की पत्रिकाएँ
ब्रिटेन से १९९७ में पद्मेश गुप्त के संपादन में शुरू हुई 'पुरवाई' ने हिंदी पत्रकारिता को नई दिशा दी। पहले यह कागज पर प्रकाशित होती थी, किंतु २०१९ से कथाकार तेजेंद्र शर्मा के संपादन में यह वेब पत्रिका के रूप में पाठकों के बीच है। इसी तरह, लंदन से शैल अग्रवाल २००७ से 'लेखनी' का सफल संपादन कर रही हैं।
यूरोप के अन्य देशों में नॉर्वे का नाम प्रमुख है। यहाँ से सुरेश चंद्र शुक्ल के संपादन में 'शांतिदूत', 'त्रिवेणी', 'स्पाइल', 'परिचय' और 'पहचान' जैसी पत्रिकाओं ने हिंदी को वैश्विक पहचान दिलाई। सुरेश जी की कहानियों ने प्रवासी भारतीयों की समस्याओं को प्रमुखता से स्वर दिया है।

यूनिकोड युग और विकिपीडिया का उदय वर्ष २००३ हिंदी इंटरनेट के लिए एक क्रांतिकारी मोड़ था, क्योंकि इसी समय 'यूनिकोड' (Unicode) के आगमन ने हिंदी टाइपिंग और प्रकाशन को अत्यंत सरल बना दिया। इसी कालखंड में हिंदी विकिपीडिया और उसके सहयोगी संस्करणों (विकिसूक्ति, विक्शनरी आदि) की शुरुआत हुई। यद्यपि अंग्रेजी विकिपीडिया (१९८१) के २२ वर्ष बाद हिंदी इसमें शामिल हुई, लेकिन इसने हिंदी के लिए सूचना का एक अनंत भंडार खोल दिया। लगभग इसी समय राजेंद्र चौधरी द्वारा संपादित 'बोलोजी' का 'हिंदी नेस्ट' के रूप में रूपांतरण हुआ।

अमेरिका और मध्य-पूर्व से प्रकाशित पत्रिकाएँ आज अमेरिका की धरती से 'विश्व हिंदी न्यास' की 'हिंदी जगत', 'हिंदी बालजगत' और 'विज्ञान प्रकाश' जैसी महत्वपूर्ण पत्रिकाएँ प्रकाशित हो रही हैं। इसके साथ ही 'विश्वा', 'दृष्टि' और 'हिंदी कौस्तुभ' जैसी पत्रिकाएँ भी प्रवासी समाज को एकजुट रखे हुए हैं।

मध्य-पूर्व की बात करें तो संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) की राजधानी अबू धाबी से कथाकार कृष्ण बिहारी के संपादन में प्रकाशित अर्धवार्षिक पत्रिका 'निकट' विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यह मध्य-पूर्व से प्रकाशित होने वाली पहली साहित्यिक पत्रिका है। कागज पर प्रकाशित होने और डाक द्वारा वितरित होने के बावजूद, अपने वैश्विक दृष्टिकोण और गंभीर सामग्री के कारण इसका अंतरराष्ट्रीय महत्व है।

बहुभाषी आयाम और साम्यवादी देशों में हिंदी
सेतु: द्विभाषी साहित्य का वैश्विक मंच अमेरिका के पिट्सबर्ग नगर से २०१६ से प्रकाशित होने वाली 'सेतु' (Setu) एक विशिष्ट मासिक वेब पत्रिका है। अन्य पत्रिकाओं के विपरीत, 'सेतु' के हिंदी और अंग्रेजी संस्करण एक-दूसरे से पूरी तरह स्वतंत्र हैं। संसार भर के प्रतिनिधि संपादकों द्वारा संचालित इस पत्रिका में स्थानीय प्रवासियों के साथ-साथ विश्वभर के विशेषज्ञों के लेख प्रकाशित होते हैं। जैसा कि इसके नाम से स्पष्ट है, यह पत्रिका वैश्विक साहित्य के बीच एक सेतु की भूमिका निभा रही है।

अमेरिका से अन्य महत्वपूर्ण स्वर साहित्यिक पत्रिकाओं के अतिरिक्त 'संयुक्त राष्ट्र समाचार' अमेरिका से हिंदी में प्रकाशित होने वाला एक प्रमुख डिजिटल हस्ताक्षर है। मुक्ता सिंह ज़ॉक्की द्वारा संपादित 'ई-कल्पना' इस क्षेत्र की अनूठी पत्रिका है, जो अपने लेखकों को मानदेय प्रदान करती रही है और इसकी कहानियाँ यूट्यूब पर भी उपलब्ध हैं। २०१५ में सुधा धींगड़ा द्वारा स्थापित 'विभोम-स्वर' और २००६ से आत्माराम शर्मा के संपादन में निकल रही 'गर्भनाल' यूएसए की अन्य महत्वपूर्ण मासिक पत्रिकाएँ हैं। ये दोनों ही पीडीएफ (PDF) स्वरूप में डाउनलोड के लिए उपलब्ध हैं।

विस्मृत होती बहुभाषी पत्रिकाएँ
'इ-विश्वा' (अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति) और 'अन्यथा' जैसी पत्रिकाओं ने भी हिंदी के विस्तार में बड़ा योगदान दिया। कृष्ण किशोर के संपादन में २००४ से प्रकाशित 'अन्यथा' अपनी तरह की पहली पत्रिका थी जो हिंदी, अंग्रेजी, फ्रेंच और स्पैनिश—इन चार भाषाओं में एक साथ निकलती थी। हालाँकि, ये पत्रिकाएँ २००८ से २०११ के बीच बंद हो गईं, लेकिन इनका ऐतिहासिक महत्व आज भी अक्षुण्ण है।

रूस में हिंदी पत्रकारिता का स्वर्णिम काल
अन्य भारतेतर देशों की तुलना में रूस में हिंदी का अध्ययन और प्रचार सदैव अग्रणी रहा है। मास्को में एक समर्पित हिंदी प्रकाशन गृह भी है। १९७२ से यहाँ से 'सोवियत संघ' नामक मासिक पत्रिका प्रकाशित होनी शुरू हुई थी, जो हिंदी सहित २० भाषाओं में एक साथ छपती थी। इसके प्रधान संपादक निकोलाई ग्रिवाचोव थे। इसी क्रम में 'सोवियत नारी' (संपादक: ई. पा. गोलुबेन) भी अत्यंत लोकप्रिय रही, जो सोवियत महिलाओं के जीवन को रेखांकित करती थी। वर्तमान में दिल्ली स्थित रूसी दूतावास द्वारा 'सोवियत दर्पण' का प्रकाशन भारत-रूस मित्रता की एक महत्वपूर्ण कड़ी है।

चीन से 'चीन सचित्र' का योगदान
चीन से 'चीन सचित्र' (China Pictorial) नामक मासिक पत्रिका का प्रकाशन हिंदी पत्रकारिता के वैश्विक प्रसार का एक और उदाहरण है। बीजिंग से प्रकाशित होने वाली यह पत्रिका विश्व की १९ भाषाओं में निकलती है। हिंदी में इसके ३२५ से अधिक अंक प्रकाशित हो चुके हैं, जो चीन संबंधी जानकारियों को हिंदी पाठकों तक पहुँचाने का मुख्य माध्यम हैं।

नूतन प्रयोग, वैश्विक प्रभाव और भविष्य की राह - 'अनन्य': एक वैश्विक नेटवर्क का उदय
वर्ष २०२२ में न्यूयॉर्क स्थित भारतीय वाणिज्य दूतावास के सहयोग से अनूप भार्गव के संयोजन में 'अनन्य' पत्रिका का शुभारंभ हुआ। 'फ्लिप-बुक' शैली में प्रकाशित यह पत्रिका एक अनूठा वैश्विक प्रयोग है। इसके अंतर्गत लगभग १२ देशों (जैसे यूएई, ब्रिटेन, रूस, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया आदि) से अलग-अलग 'अनन्य' संस्करण प्रकाशित होते हैं। स्थानीय साहित्यकारों द्वारा संपादित ये पत्रिकाएँ पाक्षिक या मासिक अंतराल पर वेब पर उपलब्ध हैं, जो प्रवासी हिंदी जगत को एक सूत्र में पिरोने का काम कर रही हैं।

वेब उपस्थिति की चुनौतियाँ और लुप्त होते पदचिह्न
समय के साथ अनेक महत्वपूर्ण पत्रिकाएँ वेब पर आईं, जैसे 'प्रवासी टुडे', 'कलायन', 'नया ज्ञानोदय' और 'तद्भव'। हालाँकि इनमें से कुछ आज भी मुद्रित स्वरूप में जीवित हो सकती हैं, किंतु इनके वेब संस्करण या तो निष्क्रिय हो गए हैं या तकनीकी बदलावों के कारण ओझल हो गए हैं। हिंदी की डिजिटल उपस्थिति इतनी विशाल है कि हर पत्रिका को सूचीबद्ध करना कठिन है, किंतु अनेक शोधार्थी इस बिखरे हुए इतिहास की कड़ियाँ जोड़ने में निरंतर प्रयासरत हैं।

'अभिव्यक्ति': वैश्वि
क संवाद का सेतु’
व्यक्तिगत अनुभव साझा करूँ तो 'अभिव्यक्ति' जैसी पत्रिकाओं ने विश्व के अलग-अलग कोनों में रच रहे साहित्य को एक मंच प्रदान किया। पूर्व में अमेरिका से सुषम बेदी, इंग्लैंड से उषा राजे या पोलैंड से प्रो. हरजेंद्र चौधरी जैसे रचनाकारों के कार्यों से वैश्विक हिंदी समाज अपरिचित था। वेब पत्रिकाओं ने इन भौगोलिक दूरियों को मिटाकर एक ऐसा साझा परिदृश्य तैयार किया, जिससे न केवल रचनाकार आपस में जुड़े, बल्कि पाठकों के मन में भी अपनी भाषा के प्रति गर्व की अनुभूति जागी।

अकादमिक जगत में प्रवासी साहित्य की धमक
आज लगभग हर विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में प्रवासी साहित्य पर एक स्वतंत्र प्रश्नपत्र शामिल है। अकादमिक क्षेत्र में यह मुकाम हासिल करने में दशकों लग जाते, यदि वेब पत्रिकाएँ न होतीं। इन्हीं डिजिटल मंचों के कारण शिक्षाविदों को यह समझ आया कि प्रवासी साहित्य केवल संस्मरण नहीं, बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक बदलाव का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है, जिसे नई पीढ़ी को पढ़ाया जाना अनिवार्य है।

हिंदी पत्रकारिता का नवजीवन और असीमित विस्तार अंग्रेजी साहित्य की तरह अब हिंदी में भी विश्व के हर कोने की कहानियाँ उपलब्ध हैं। आज भारतीय प्रतिभाएँ दुनिया भर में हर उच्च पद पर कार्यरत हैं और उनके अनुभवों ने हिंदी साहित्य को समृद्ध किया है। वेब पत्रिकाओं ने कागज की सीमित पहुँच को तोड़कर एक छोटे से गाँव से लेकर महानगरों के अंतिम छोर तक भारतीयता की गूँज पहुँचाई है।

तकनीकी गति और सामाजिक सरोकार इंटरनेट ने हिंदी पत्रकारिता को असाधारण गति दी है। आज कोई भी रचना प्रकाशित होते ही पल भर में वैश्विक हो जाती है। यह गति केवल अध्ययन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने तकनीक, बागवानी, स्वास्थ्य और घरेलू सहयोग जैसे विषयों पर आधारित पत्रिकाओं के माध्यम से व्यवसाय और स्वरोजगार के नए अवसर भी खोले हैं। विशेष रूप से महिलाओं, बुजुर्गों और विद्यार्थियों के लिए यह एक सुविधाजनक और सशक्त माध्यम बनकर उभरा है।

वेब पत्रकारिता का लोकतंत्र और उभरती चुनौतियाँ
लोकतांत्रिक माध्यम और सामग्री की गुणवत्ता मुद्रित पत्रिकाओं के प्रकाशन में लगने वाली भारी पूँजी अक्सर उनके सरोकारों और हितों को प्रभावित करती है। इस तुलना में इंटरनेट कहीं अधिक लोकतांत्रिक है। यहाँ वेबसाइट बनाना और उसे चलाना न केवल किफायती है, बल्कि ब्लॉगर और वर्डप्रेस जैसे प्लेटफॉर्म्स ने तो इसे पूरी तरह निःशुल्क और सुलभ बना दिया है। भारत जैसे देश में, जहाँ साहित्यिक पत्रिकाओं का आर्थिक संचालन एक कठिन चुनौती है, वहाँ वेब पत्रिकाएँ तकनीकी दक्षता और सीमित संसाधनों के साथ भी जीवित रह सकती हैं। यहाँ पत्रिका का अस्तित्व उसकी मार्केटिंग पर नहीं, बल्कि उसकी सामग्री की 'गुणवत्ता' पर निर्भर करता है, जो एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को जन्म देता है।

सामाजिक बदलाव और डिजिटल साथी वेब पत्रिकाओं और पोर्टल्स ने ग्रामीण क्षेत्रों में साक्षरता और सूचना के प्रसार में क्रांतिकारी भूमिका निभाई है। आज के एकल परिवारों के दौर में, जब पारंपरिक ज्ञान साझा करने वाले बुजुर्ग साथ नहीं होते, तब इंटरनेट पर उपलब्ध घरेलू नुस्खे, स्वास्थ्य संबंधी जानकारी, योग और मनोवैज्ञानिक सुझाव जीवन को सुगम बना रहे हैं। वास्तव में, वेब पर मौजूद यह ज्ञान-भंडार एक 'सच्चे मित्र' की तरह है, जो न केवल पाठकों का मनोबल बढ़ाता है बल्कि उनके अकेलेपन को भी दूर करता है।

सावधानी और सतर्कता: सिक्के का दूसरा पहलू
एक क्लिक पर वैश्विक दुनिया नई तकनीक ने सूचनाओं के साथ-साथ ज्ञान-विज्ञान के तमाम अनुशासनों तक युवाओं की पहुँच आसान बना दी है। आज फेसबुक, इंस्टाग्राम और अन्य डिजिटल समूहों के माध्यम से एक क्लिक पर साहित्य और सूचना की पूरी दुनिया उपलब्ध है। वेब पत्रिकाओं के इस सफर ने न केवल हिंदी को आधुनिक बनाया है, बल्कि वैश्विक समाज में अकेलेपन को दूर कर आत्मीयता के नए समूह भी निर्मित किए हैं।

इतना सब सकारात्मक होने का अर्थ यह कदापि नहीं है कि इंटरनेट केवल कल्याणकारी ही है। सूचनाओं के इस महासागर में सही और गलत का चुनाव करना एक कठिन चुनौती है। गलत जानकारियों से गुमराह होने का भय सदैव बना रहता है। साथ ही, इंटरनेट पर आर्थिक धोखाधड़ी और भावनात्मक आघात पहुँचाने वाले तत्वों की भी कमी नहीं है। मोबाइल से बढ़ती घनिष्ठता अक्सर परिवार के सदस्यों के बीच दूरी का कारण बन जाती है। अनगिनत वेबसाइटों के अंतहीन भ्रमण में समय की बर्बादी और इंटरनेट की लत जैसे खतरे भी आज हमारे सामने एक बड़ी चुनौती के रूप में खड़े हैं।

"अंततः, अंतरराष्ट्रीय हिंदी वेब पत्रिकाओं का यह सफर केवल तकनीक का विस्तार नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर हिंदी भाषा के आत्मगौरव की पुनर्स्थापना है। मुद्रित पन्नों से शुरू होकर डिजिटल क्लाउड तक पहुँची इस यात्रा ने 'वसुधैव कुटुंबकम' की भावना को सही अर्थों में चरितार्थ किया है। हालाँकि सूचनाओं के इस महासागर में सतहीपन और भटकाव के खतरे मौजूद हैं, लेकिन गुणवत्तापूर्ण साहित्य और सजग संपादन के माध्यम से ये पत्रिकाएँ भविष्य में भी विश्व भर के हिंदी प्रेमियों को एक सूत्र में पिरोए रखेंगी। आज एक क्लिक पर उपलब्ध यह हिंदी जगत हमारी अटूट सांस्कृतिक जिजीविषा का प्रमाण है।"

पुनश्चः पाठकों से निवेदन है कि यदि उनके पास उस दौर की किसी पत्रिका की डिजिटल प्रति या जानकारी है, तो वे इसे मेरे ईमेल पर साझा करें।

१ फरवरी २०२६

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