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कहानियाँ

समकालीन हिंदी कहानियों के स्तंभ में प्रस्तुत है
भारत से कल्पना मनोरमा की कहानी- प्रतिफल


वे फरवरी की उतरती सर्दी के दिन थे। पवन तितलियों के साथ अठखेलियाँ करते हुए गुनगुनाने लगी थी। उन्हीं दिनों ललिता पति के साथ ट्रांसफर होकर सहारनपुर आई थी। रहने के लिए रेलवे कॉलोनी में एक सरकारी आवास मिला था, जो उसे बिल्कुल अच्छा नहीं लगा था। घर बड़ा था, लेकिन उसकी दीवारों की जर्जरता देखकर वह कराह उठी थी। पति की नौकरी इसीलिए उसे कभी भी अच्छी नहीं लगी थी। नए ऑफिस की भाग-दौड़ में उसका पति ऐसा जुटा कि उसे ललिता और बच्चों की कोई सुध नहीं रह गई थी। ललिता अकेले अपनी बिटिया रूपाली और बेटे धीरू के साथ घर के सामान को व्यवस्थित कर धीरे-धीरे जमाने लगी थी।

वैसे तो ललिता दिन भर नए सरकारी आवास को सजाने-संवारने में लगी रहती, लेकिन इलाहाबाद की यादें उसे रह-रहकर साल जातीं। पास-पड़ोसियों से परिचय जल्दी न बनाने वाली ललिता को सहारनपुर थोड़ा भी नहीं जँचा था। “आने वाला पल जाने वाला है...” की धुन पर उसके नएपन ने भी पुराना होना शुरू कर ही दिया। बच्चों के एडमिशन हुए और उन्हें स्कूल छोड़ने जाने-आने के क्रम में उसकी एक-दो सहेलियाँ भी बन गईं। उन्हीं की पुकार पर ललिता अब कभी-कभी बाहर निकलने लगी थी। एक दिन ललिता की नई मित्र प्रमिला उससे करी पत्ता माँगने घर आ पहुँची।

उसके बताए अनुसार ललिता ने जब किचन गार्डन का जंग खाया गेट खोलकर पहली बार सरकारी बगीचे को देखा, तो जो घर उसे अंदर से एक आँख नहीं भा रहा था, उसके पीछे का दृश्य उसे लुभा गया। उसने देखा—आम, जामुन, करी पत्ता, शहतूत और गुलाब की झाड़ियाँ बहुत ही बेतरतीबी से बढ़ चुकी थीं। बगीचे की ज़मीन सूखी घास से पटी पड़ी थी। प्रमिला करी पत्ता लेकर जा चुकी थी और ललिता अभी भी बगीचे में खड़ी सभी पेड़-पौधों को देखे जा रही थी। उसने देखा वहाँ कई तरह के वृक्षों में शहतूत के कई छोटे-बड़े पेड़ लगे थे। एक शहतूत सबसे पुराना दिख रहा था, जिसने घर के पीछे वाली बालकनी को आधा कब्जाया हुआ था। ललिता ने पंजों पर उचकते हुए देखने का प्रयास किया और जब कुछ दिखाई नहीं दिया, तब उसे ध्यान आया कि यह तो उसका अपना घर है। हँसते हुए उसने अपने सिर पर चपत लगाई और घर से होते हुए पहली बार पीछे वाली बालकनी खोलकर जाकर खड़ी हो गई।

बालकनी का विस्तार देख उसे अपनी बेवकूफ़ी पर संकोच हुआ कि बेकार में वह कपड़े सुखाने के लिए महीनों से परेशान थी। दूसरे दिन पति को ऑफिस भेजकर और रूपाली को स्कूल छोड़ने के बाद, ललिता ने अपनी महराजिन के साथ बालकनी-सफ़ाई का अभियान छेड़ दिया। जब तक सब घर लौटे, तब तक घर का वह कोना चमक उठा था। ललिता ने पति को ले जाकर दिखाया तो वह भी बहुत खुश हुए।

“बालकनी मैंने साफ़ कर ली है, लेकिन बगीचे की सफ़ाई आपको करानी होगी।” लगे हाथ उसने पति से वादा ले लिया। “ललिता, क्यों न आज हम यहीं चटाई पर बैठकर खाना खाएँ? क्यों, क्या कहती हो?” “पहले पेड़ों की छँटाई और सफ़ाई के लिए हाँ तो बोलो।” “हाँ बाबा! कल ही किसी को ऑफिस से भेजता हूँ।”

महराजिन की मदद से खाना बड़ी बालकनी में चटाई बिछाकर लगाया गया। खाना खाने के दौरान पति ऑफिस की बातें बताता जा रहा था और बच्चे बालकनी की ग्रिल से झाँकते हुए पेड़-पौधों के नाम पूछते जा रहे थे। ललिता बच्चों को पेड़ों के नाम उनके गुणों सहित बताती जाती और उन्हें दुलारती जाती। ललिता को बहुत दिनों के बाद सहारनपुर की शाम इलाहाबाद जैसी लगी थी।

बरसात की एक दोपहर ललिता अचार की बरनी को धूप दिखाने बालकनी में रखने आई थी। पेड़-पौधों के साथ हरे-भरे शहतूत की छाया फर्श पर कई चित्र उकेर रही थी, जिसे देखकर उसे अच्छा लगा- निश्चित ही कभी इस घर में रहने वाला शहतूत प्रेमी रहा होगा, तभी तो इतने सारे शहतूत के वृक्ष लगाकर चला गया। देखो तो! पेड़ लगाता कोई है और फल कोई और खाता है। क्या लगाने वाले की निजी बातें ये वृक्ष जानते होंगे? कितना भी कोई अपना सामान समेट कर चला जाता होगा, लेकिन उसकी यादों का कुछ अंश धरोहर के रूप में इनके पास ज़रूर रह जाता होगा।

ललिता अपने भाव-लोक में डूबी हुई थी कि हवा का सहयोग लेकर शहतूत की एक फुनगी ने उसके कान में गुदगुदाया, तो छन्न से उसकी तंद्रा भंग हो गई।

समय पंख लगाकर उड़ता गया और ललिता को इस सरकारी घर में आए हुए लगभग चार साल बीत चुके थे। सहारनपुर की आबो-हवा उसे अच्छी लगने लगी थी। अब रेलवे ऑफिसर कॉलोनी की कोई बात उससे छिपी नहीं थी। शाम को जब महिलाएँ सैर-सपाटे के लिए निकलतीं, तब ललिता बालकनी में किताब लेकर बैठ जाती। एक कोने में शहतूत झूमता रहता और दूसरे में आराम कुर्सी डाले ललिता कबीर और मीरा को बाँचती रहती। वैसे तो ललिता के पास दो बालकनियाँ थीं, लेकिन शहतूत वाली बालकनी उसे हर मामले में ज्यादा पसंद थी। इसीलिए धीरे-धीरे अपनी बैठकी के साथ-साथ उसने वहाँ कपड़े सुखाने के लिए कई डोरियाँ भी बाँध ली थीं। जब कभी आसमान पर बादलों की आमद होती और ठंडी-ठंडी पुरवा हवाएँ चलने लगतीं, तो बगीचे के पेड़ों को झूमते देख उसे बहुत अच्छा लगता।

“पेड़ों के मामले में सहारनपुर इलाहाबाद से अच्छा है न! सच ही कहा है किसी ने कि वृक्ष मनुष्य के नजदीकी रिश्तेदार होते हैं। देखो, कैसे नेह से पवन को हम तक पहुँचाते रहते हैं,” ललिता ने दुलराते हुए अपनी बिटिया रूपाली से कहा। ललिता का उस शहतूत के साथ बच्चों जैसा लगाव जुड़ गया था। लेकिन जिस प्रकार प्राकृतिक वातावरण हमारे बाहरी शरीर की संरचना को पोषित करता है, उसी प्रकार एक अदृश्य वातावरण हमारे मन के प्रभामंडल को रचता है। हम छोटी-छोटी चीजों से प्रभावित होते भी हैं और दूसरों को करते भी हैं। जो जिसका साथी होगा, वह ज़रूर ही उसे अपने अस्तित्व से प्रभावित करता होगा। वही हाल ललिता के साथ हुआ।

पति के पुनः ट्रांसफर होने का वक्त आ गया था। इस बार उनकी पोस्टिंग ऐसी जगह हुई थी जहाँ शिक्षा की व्यवस्था अच्छी नहीं थी। बहुत पूछताछ के बाद अंततोगत्वा ललिता को बच्चों के साथ सहारनपुर रुकने पर विचार करना पड़ा। वैसे तो फोन के माध्यम से ललिता हर छोटी-बड़ी बात पति से पूछती रहती थी, लेकिन फिर भी बहुत से कामों के लिए उसे बहुत कुछ झेलना पड़ रहा था।

अब उस शहतूत के पेड़ को ही ले लो। जिस पेड़ से उसे पति के रहते कोई दिक्कत नहीं थी, क्योंकि वह कटाई-छँटाई का काम नियम से कराते रहते थे, उनके जाने के बाद उस पेड़ को खूब बढ़ने-पसरने का मौका मिल गया। देखते-देखते वह इतना घना होता चला गया कि पंछियों के साथ उस पर चमगादड़ों का भी बसेरा हो गया। शहतूत जब पकते तो बालकनी में खून जैसे लाल धब्बे पड़े रहते और उसकी डालियाँ कमरे तक कूड़ा फैलाने लगी थीं। ललिता के हल्के रंग वाले कपड़ों में जिद्दी धब्बे लगने लगे, तो कभी-कभी शहतूत की टहनियों में फँसकर उसके मुलायम फैब्रिक के कपड़े भी फटने लगे थे। कुल मिलाकर, जो शहतूत उसका प्यारा सखा जैसा था, अब वह उसे 'शरारती तत्व' सा प्रतीत होने लगा था।

उसका मन रह-रहकर उदास हो जाता तो बच्चे पूछने भी लगते, लेकिन उन्हें छोटा समझकर वह शांत करा देती। बहुत सोचने के बाद अपनी परेशानी का कारण बताते हुए ललिता ने पति से पेड़ कटवाने की बात फोन पर कही। "अच्छा, अबकी बार जब छुट्टी आऊँगा तो सोचूँगा," कहते हुए उन्होंने ललिता की बात पर विशेष ध्यान नहीं दिया।

ललिता अब उस बालकनी का दरवाज़ा फिर से बंद रखने लगी थी। उन्हीं दिनों के दौरान ललिता को बच्चों को लेकर पिकनिक पर जाना था। उसने एक सिल्क का दुपट्टा धोकर बेख्याली में छोटी बालकनी में न फैलाकर, उसी पेड़ के पास तार पर सुखाया और भूल गई। खेल-खेल में उसके बेटे धीरू ने उसे खींचा, तो शहतूत की डाली में उलझकर दुपट्टे में एक बड़ा-सा चीरा लग गया और वह बुरी तरह फट गया। रूपाली ने उसे कपड़ों के बीच में छिपा दिया।

जिस दिन पिकनिक जाना था, उस दिन ललिता ने बिटिया से वही दुपट्टा लाने को कहा। वह बहुत देर तक बहाने बनाती रही, लेकिन ललिता जब उसे डाँटने लगी तो उसने दुपट्टा उसके हाथ में पकड़ा दिया। दुपट्टे को कंधे पर डालते ही ललिता के होश उड़ गए। उसने उलट-पलट कर उसे कई बार देखा, लेकिन उसे सही करने के चक्कर में बच्चों ने उसकी हालत और भी बुरी कर रखी थी। चूँकि दुपट्टा ललिता की माँ ने उसे अपने जीवन के अंतिम दिनों में दिया था, इसलिए वह उसके लिए कितना कीमती था, यह बात किसी से छिपी नहीं थी। बच्चे सोफ़े पर तैयार बैठे रहे, लेकिन ललिता ने सारा प्रोग्राम कैंसिल कर दिया और चाकू लेकर बालकनी की ओर चली गई। बस, उस घटना के बाद ललिता और शहतूत में जो ठनी, सो ठनी! अब तो वह आते-जाते उसे खूब बुरा-भला सुनाने लगी और मुँह बिचकाने लगी थी।

“अब तो तुझे कटवाकर ही मुझे खुशी मिलेगी। तेरा कुछ तो परमानेंट इलाज करना ही पड़ेगा। बहुत लहराने लगा है न! क्यों, सुन रहा है न तू?" ऐसे वाक्य कहते हुए ललिता उसकी टहनियों को ऐसे झटक देती, जैसे किसी ऊधमी बच्चे के कान खींच दिए गए हों। धीरे-धीरे मौसम ने करवट बदली। बरसात से सर्दी और उसके बाद पतझड़ ने अपना खेल रचाया, तो कॉलोनी के सारे वृक्ष सूने हो गए। ललिता को परेशान करने वाला वह पेड़ भी अब बदसूरत होता चला गया। उसे देख ललिता को एक अलग प्रकार की खुशी का अनुभव हुआ। पत्ते झड़ जाने के कारण बालकनी में काफी जगह निकल आई थी और उसके मन की पीड़ा भी थोड़ी कम हो गई थी।

एक दिन पतझड़ की नीरव संध्या में, वह शहतूत की कंकाल जैसी काया को बहुत देर तक देखती रही। पत्रहीन पेड़ उसे डरावना लगने लगा था, लेकिन उसे देखते हुए ललिता को एक युक्ति सूझ गई। वह जल्दी से अंदर गई और एक पैना चाकू उठा लाई। पेड़ चुपचाप उसे देख रहा था। ललिता ने पहले उसके तने पर 'खच्च-खच्च' चाकू मारा और फिर उसकी पतली-पतली टहनियाँ काट डालीं। पेड़ ने उस बात का बिल्कुल दुःख नहीं मनाया; उसने शायद वैसे ही सोचा जैसे माताएँ अपने बच्चों के बाल कटवा देती हैं ताकि वे सुंदर दिखें। फुनगियों की छँटाई करते-करते ललिता हाँफ गई थी।

“मैं तो चाहती हूँ कि अब इस पर कभी एक भी पत्ता न आए। यह कभी अपनी खुशी में फैले-पसरे नहीं। मेरी चुन्नी और बेड-शीटों के साथ सारे कपड़ों का इसी ने सत्यानाश किया है। मेरा जीना इसी ने दूभर कर रखा है। एक तो सारी जिम्मेदारी अकेले ढोओ और ऊपर से सारी दुनिया मुझे ही दुखी करने पर तुली रहती है।”

खिसियाते हुए ललिता अक्सर उसके नज़दीक खड़ी होकर बड़बड़ाती रहती। पेड़ जब उसकी बातें सुनता, तो सन्नाटे में डूब जाता। वह लाख सोचकर भी अपनी गलती नहीं पकड़ पा रहा था, लेकिन वह परेशान होकर अपने 'कानों' पर हाथ ज़रूर रख लेता। फिर भी उसे ललिता की तीखी आवाज़ें सुनाई पड़ती रहतीं। रात में सोता हुआ पेड़ अचानक चौंकने लगा था। उसकी इस हरकत पर घोंसलों में बैठे पंछी भी काँप उठते। ललिता की बातों का पेड़ के मन पर शायद बहुत बुरा असर होने लगा था। जो बातें चुभनी होती हैं, वे कानों से नहीं, दिल से सुनी जाती हैं। पेड़ जब ज्यादा दुखी होता, तो घंटों ऐसी ही बातें सोचता रहता।

खैर, पतझड़ का रूखा वक्त बीत चुका था, लेकिन पेड़ अब भी पत्रहीन और उजाड़ खड़ा था। हवा चलती तो उसकी नंगी डालियाँ खड़बड़ा उठतीं। मौसम ने अपनी चाल फिर बदली और वसंत ने अपना बिगुल बजाया, तो बगीचे में हर ओर पेड़ों की डालियों पर कोमल पत्तियाँ छिटक उठीं। छोटे-बड़े पेड़-पौधों की हरे पत्तों और फूलों से 'गोद भराई' हो गई। डालियाँ फूलों से लदकर झुक गईं। वृक्षों की सुकुमारता सबका मन मोहने लगी थी, लेकिन ललिता को दुःख देने वाला पेड़ जस का तस खड़ा था। इस पर पतझड़ का असर देर से हुआ था, इसलिए नव-पल्लवों का आगमन भी विलंब से होना था। लेकिन ललिता अपनी ही रौ में सोच रही थी, सो उसे यह सब अपने मन मुताबिक ही प्रतीत हुआ। उसे महसूस हुआ कि उसकी परेशानी को देखते हुए ईश्वर ने उसके 'दुश्मन' को खड़े-खड़े सूखने का श्राप दे दिया है और ललिता को खुश रहने का वरदान।
“चलो, साँप भी मर गया और लाठी भी नहीं टूटी,” ललिता ने संतोष से सोचा।

फिर एक दिन सुबह-सुबह गीले कपड़ों से भरी बाल्टी लिए वह उसी बालकनी में आई। उसने देखा—जिसे वह महीनों से सूखा समझ रही थी, वह तो डाली-डाली अँखुआने (फूटने) लगा है। ललिता मन ही मन भड़क उठी। उसने सोचा—'अब यह फिर से मुझे दादागीरी दिखाएगा? कपड़ों को दाग-धब्बों से भरेगा?' कपड़े फैलाते हुए उसने अपनी स्मृतियों को खँगालना शुरू किया। बहुत देर सोचने के बाद उसे अपनी अजिया (दादी) की कही एक बात याद आई।

“लाली, मासिक धर्म के दौरान तुम फलदार पौधों और तुलसी को मत छुआ करो। तुम्हारा क्या! तुम तो नहा-धोकर खड़ी हो जाओगी, लेकिन उन बेचारे पेड़-पौधों की आत्मा सूख जाएगी। उनके फल असमय सूखकर झड़ जाएँगे।” ललिता के दिमाग की बत्ती जल उठी थी।

"अगर मैं इसे उस समय छू लूँ तो क्या सचमुच यह सूख जाएगा? क्या सच में अजिया की बात सही होगी? क्या इस वैज्ञानिक युग में भी उन बातों का कुछ अर्थ बचा होगा? क्या माली की पत्नी पति के साथ बाग में उन दिनों काम नहीं करती होगी? क्या उसके मासिक धर्म में वह भी पेड़-पौधों को नहीं छूती होगी? अच्छा चलो! कुछ भी हो, यह भी करके देखती हूँ।" ललिता का जब मासिकी का समय आया, उसने जैसा सोचा था वैसा ही किया। उसके बाद वह प्रतिदिन पेड़ का मुरझाता हुआ चेहरा देखने के लिए लालायित रहने लगी। जब उसे कोई तत्काल परिणाम निकलता समझ नहीं आया, तो बालकनी के दरवाज़े पर ताला डालकर, अजिया की बात को झूठ मानकर वह अपने जीवन में पुनः व्यस्त हो गई।
उस घटना को बीते मुश्किल से तीन-चार महीने ही हुए होंगे कि एक दिन धीरू को "पेड़ों की दुनिया" पाठ पढ़ाते हुए ललिता को शहतूत की याद फिर से आ गई। वह दौड़ते हुए बालकनी में गई। उसने देखा—चारों ओर हरियाली उफ़ान पर थी, लेकिन शहतूत के पेड़ पर सन्नाटा पसर चुका था। जो पत्रांकुर (कलियाँ) उमंग में उगे थे, वे डालियों पर चिपक कर सूख चुके थे। पत्तियों या फुनगियों के बढ़ने का तो सवाल ही नहीं था। ललिता बहुत देर सोचती रही, लेकिन कुछ समझ नहीं आया तो फिर बच्चे को आकर पढ़ाने लगी।

अगले दिन ललिता से रहा नहीं गया। उसने उसकी डाली झुकाकर एक पत्रांकुर को छुआ तो वह उसकी उँगली में चुरमुरा गया। झपट कर उसने दूसरी डाली झुकाई, उस पर लगे पत्रांकुर का भी वही हाल हुआ। हड़बड़ा कर उसने डाली तोड़ी, तो वह भी 'कुट्ट' से टूट गई। लगातार उसने कई डालियों को तोड़ा; सबका हाल एक जैसा था। अचानक उसके मन में भय-सा भरने लगा। ललिता इधर-उधर ऐसे देखने लगी जैसे उससे कोई गुनाह हो गया हो। जैसे सबसे कीमती चीज़ खोने की कौंध मन में होती है, ठीक वैसा ही उसे महसूस हो रहा था। मन का क्रोध उड़न-छू हो गया था।

“हाय! यह क्या हुआ तुझे? तू तो बिल्कुल सूख गया! मैंने तो बस यूँ ही तेरे साथ मज़ाक किया था। हे ईश्वर! यह क्या कर डाला मैंने! और तू! तूने तो मेरी बातों को दिल पर ही ले लिया? मैंने ऐसा कतई नहीं चाहा था। आखिर तो तू मुझसे बड़ा था; थोड़ा तो मेरे बारे में सोचा होता। 'क्षमा बड़ेन को चाहिए, छोटेन को उत्पाद'...” ललिता ने शहतूत की ओर मुखातिब होकर गिड़गिड़ाते हुए स्वर में कहा।

“ललिता देवी! दुनिया में कुछ भी यूँ ही नहीं होता। सबका अपना कुछ न कुछ ध्येय होता है। जितनी तुम्हारी कविताओं ने मुझे रिझा-रिझाकर बढ़ने में मदद की थी, उससे ज्यादा तुम्हारी गालियों ने मेरे हृदय की हर एक परत को छील कर रख दिया है। वैसे सच कहूँ तो मैंने हरे-भरे बने रहने की बहुत कोशिश की थी, लेकिन मैं अपने मन को बड़ा न रख सका। मेरा मन एक बार कुंठित होना शुरू हुआ तो होता ही चला गया। अब तो तुम देख ही सकती हो कि मैं मरने की कगार पर हूँ। बस एक बार आँधी आने की देरी है कि मैं समूल नष्ट हो जाऊँगा।”

हवा के झकोरे से पेड़ की सूखी टहनियाँ झटके से झनझना उठीं। ललिता को लगा जैसे शहतूत के पेड़ ने ही उसके कान में फुसफुसा कर अपना तमाम दुःख उड़ेल दिया था, जो पिघले हुए शीशे-सा उसके कानों से होते हुए आत्मा को कचोटने लगा था।

“अरे! क्या बात कहता है तू! तुझसे ज्यादा बुरा-भला तो मैं अपने बच्चों को लगातार सुनाती रहती हूँ, बल्कि उनकी तो मैं कभी भी किसी के सामने पिटाई भी लगा देती हूँ। रूपाली और धीरू की कोमल भावनाओं का मैंने कभी भी आदर नहीं किया। मेरा जो मन होता है, वही काम मेरे बच्चों को करना होता है। उन्हें तो मेरी बातों का कभी बुरा नहीं लगता, जबकि लोग कहते हैं कि पेड़ भी बच्चों की तरह होते हैं।”

ललिता ने बनावटी फीकी-सी हँसी हँसते हुए हमदर्दी से उसकी डाली को छुआ, तो पेड़ की डाली बूढ़े आदमी की तरह थरथरा उठी।

“बिल्कुल सही कहा तुमने! अपने किए कृत्यों पर कुछ भी सोचकर मन को तसल्ली देना मानवीय फ़ितरत जो ठहरी, लेकिन मैं अच्छी तरह से जानता हूँ कि किसी के द्वारा कहा गया एक भी शब्द अनसुना नहीं जाता। शब्द की अपनी प्रामाणिकता होती है, वे कभी मरते नहीं हैं। वक्त आने पर शब्द अपनी तासीर के अनुसार पूरा असर दिखाते हैं। जो तुम कहती हो, तो अपने बच्चों के प्रति किए गए बर्ताव के 'प्रतिफल' का इंतज़ार करो और फिर देखना...।” पेड़ हवा में खड़बड़ाया और अचानक मौन हो गया।

जोगिया रंग में रँगा सूरज पश्चिम की ओर लुढ़कने को आतुर हो रहा था। साँझ होने में अभी वक्त था, लेकिन ललिता को महसूस हुआ कि रात की कालिमा उसकी आँखों में एक अबूझा खौफ़ बनकर असमय उतरने लगी है। उसे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था। आवाज़ देकर उसने अपने बच्चों को पास बुला लिया। असमंजस की स्थिति में ललिता ने बालकनी से झुककर शहतूत के तने के सहारे ज़मीन पर देखा।

वहाँ उसे शहतूत के पास दो हरे-भरे पत्तेदार किल्ले (नन्हे पौधे) लहराते हुए दिखाई दिए। उन्हें देखते ही उसके अंतर में एक ठंडी लहर दौड़ गई और बाहों के रोएँ काँटे की तरह खड़े हो गए। उसने अपने बेटे धीरू को कसकर गोद में उठा लिया।

“अब कुछ भी हो जाए, मैं इन्हें बड़ा होने में मदद करूँगी। इन नन्हे कल्लों को विशाल शहतूत बनने में सहयोग दूँगी। अब से कभी भी किसी से हँसी-मज़ाक में भी कोई कड़वी बात नहीं कहूँगी।”

ललिता अपने कीमती कपड़ों पर लगे सारे दागों और रेशमी दुपट्टे के चीरों को भूलकर, पश्चाताप और संकल्प के साथ बुदबुदाई।

१ फरवरी २०२६

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