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समकालीन कहानियों में
इस माह
प्रस्तुत है- भारत से वंदना शुक्ला की कहानी
आवाजें
“मैंने
लाखों के बोल सहे... वाह, वाह! क्या बात है! एकताल की बंदिश...
राग दरबारी कान्हड़ा... मालकौस, पलटेदार तान... घरानेदार लोग,
ज़बरदस्त मुर्कियाँ... माशाल्लाह, क्या गला पाया है उस्ताद!”
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आवाज़ें लहराती हुई एक-दूसरे को धकेलकर उतराने-डूबने
लगीं उनकी छाती की खोह में। उस्ताद हमीदुल्लाह ख़ान उर्फ़
छुट्टन मियाँ हड़बड़ाकर मूंज की खाट पर उकड़ूँ बैठ गए। आवाज़ें
ही आवाज़ें—आसमान से बरसतीं, दीवारों-खिड़कियों की संधों से
फूटतीं, दरख़्तों से झड़तीं, अंधेरों से बिखरतीं, कानों में
बिलखतीं—आवाज़ें ही आवाज़ें... जेठ का सुलगता महीना और अमावस की गाढ़ी, खुश्क रात। ज़र्ज़र
हवेली के मैले, ऊबड़-खाबड़ पटियों वाले आँगन में बीही, अनार और
नीम के ऊँघते हुए दरख़्तों के बीच खरहरी खाट पर खामोश, तनहा
बैठे बुज़ुर्गवार छुट्टन मियाँ।
...आगे-
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