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“मैंने लाखों के बोल सहे... वाह,
वाह! क्या बात है! एकताल की बंदिश... राग दरबारी कान्हड़ा...
मालकौस, पलटेदार तान... घरानेदार लोग, ज़बरदस्त मुर्कियाँ...
माशाल्लाह, क्या गला पाया है उस्ताद!”
आवाज़ें लहराती हुई एक-दूसरे को धकेलकर उतराने-डूबने लगीं उनकी
छाती की खोह में। उस्ताद हमीदुल्लाह ख़ान उर्फ़ छुट्टन मियाँ
हड़बड़ाकर मूंज की खाट पर उकड़ूँ बैठ गए। आवाज़ें ही
आवाज़ें—आसमान से बरसतीं, दीवारों-खिड़कियों की संधों से
फूटतीं, दरख़्तों से झड़तीं, अंधेरों से बिखरतीं, कानों में
बिलखतीं—आवाज़ें ही आवाज़ें...
जेठ का सुलगता महीना और अमावस की गाढ़ी, खुश्क रात। ज़र्ज़र
हवेली के मैले, ऊबड़-खाबड़ पटियों वाले आँगन में बीही, अनार और
नीम के ऊँघते हुए दरख़्तों के बीच खरहरी खाट पर खामोश, तनहा
बैठे बुज़ुर्गवार छुट्टन मियाँ। करीबन ढाई-तीन इंच मोटी पत्थर
की दीवारों से बनी दुमंज़िला इमारत और चारों ओर से मोटे
पल्लेदार दरवाज़ों वाले कमरों से घिरा विशाल आँगन हवेली का
इतिहास झाँकता है—दीवारों, मेहराबदार छतों, लंबे-चौड़े दालानों
और कंगूरेदार दुछत्तियों में से।
आँगन के एक कोने में सिमटा-सा बैठा वह खाली, ज़र्ज़र बड़ा हौज़
अब दुनिया भर के कीड़े-मकोड़ों की पनाहगाह है। हवेली के आबाद
दिनों में उस हौज़ को किसी मजलिस या जश्न के मौक़ों पर मश्किये
खुशबूदार पानी से भर दिया जाता था। पानी की सतह पर गुलाब की
ताज़ा पत्तियाँ तैरा करतीं।
यूँ तो हवेली बारहों महीने संगीत की सुर-लहरियों और जलसों से
गुलज़ार रहा करती, पर ईद और ऐसे ही किसी ख़ास मौक़ों पर
शानो-शौकत कुछ जुदा होती। सुबह से मिलने-जुलने वालों की
आवाजाही शुरू हो जाती। हाज़तमंदों को ख़ैरात बख़्शी जाती और
अज़ीज़ों के हक़ में अल्लाह ताला से दुआएँ माँगी जातीं।
छुट्टन मियाँ के वालिद, यानी ऊँचे-पूरे बड़े उस्ताद साहब,
शफ़्फ़ाक शेरवानी पर दुपल्ली लखनवी टोपी पहन, हाथी-दाँत की मूठ
वाली छड़ी लिए, थोड़े झुके हुए कंधों पर पश्मीनी शॉल और पैरों
में लखनवी रेशमी कढ़ाईदार जूतियाँ पहने मेहमानखाने में रुआब और
फ़ख़्र से तख़्त पर तशरीफ़ रखते और मेहमानों की आवभगत करते।
कमरों की चौखटों पर मोटी चिकें (टटियाँ) जिन्हें गर्मियों में
पानी से सींच दिया जाता था, हवा से उनकी सुगंध कमरों से आँगन
तक फैल जाती। छुट्टन मियाँ की बूढ़ी आँखों की कोरें फिर भीग
गईं। क्या शानो-शौकत हुआ करती थी इस हवेली की!
स्मृतियों का बवंडर उठने लगा था मन में। उन्होंने अंधेरों और
धुंधलाई आँखों से झाँककर ज़र्ज़र हवेली पर एक दफ़े फिर नज़र
फिराई। इस वक़्त कुटुंब का भरा-पूरापन बंद दरवाज़ों के पीछे
कूलरों के आगे सुकून भरी नींद की गिरफ्त में था, अपने वक़्त की
रंगीनियों के ख़्वाब देखता हुआ। छुट्टन मियाँ को फिर लगा कि
पूरी हवेली में ये आवाज़ें रूह की मानिंद झूल-भटक रही हैं और
अंधेरों की दीवारों से टकराकर उनकी आत्मा में काँच की मानिंद
टूट-टूटकर बिखर रही हैं। हर किरच गोया एक आवाज़... जो अंगारों
के गुलबूटों की नाईं बरसती है अक्सर उस उजाड़ मन में, जहाँ कभी
स्वर-लहरियाँ खुशबूदार फूलों की बारिश किया करती थीं।
छुट्टन मियाँ की घरानेदार, पकी हुई आवाज़ जो “हिज़ मास्टर्स
वॉइस” के रिकॉर्ड की सुई को छूते ही तैरने लगती थी पूरी हवेली
में, और वे आँखें मींचे मूढ़े पर टाँग पर टाँग रखे उनमें
ग़लतियाँ बीनते... “उहं-हूँ, यहाँ थोड़ी कसर रह गई मियाँ, ये
मुरकी ज़रा ऐसे होनी थी।” और कभी—“वाह, वाह! क्या बात है! क्या
तीन सप्तक में तान खींची है उस्ताद जी”—कहते, निहाल होते हुए
खुद को ही शाबाशी देते छुट्टन मियाँ उर्फ़ उस्ताद हमीदुल्लाह
ख़ान।
उनके वालिद और गुरु, उस्ताद अमानुल्लाह ख़ान यानी बड़े उस्ताद
साहब, लखनऊ घराने के मशहूर ख़ानदानी गवैये थे। बड़े उस्ताद
साहब कानों को छूकर बड़े अदब व फ़ख़्र से खुद को शिताब ख़ाँ के
ख़ानदान का बताते, जो अकबर के दरबार में बीनकार हुआ करते थे।
हवेली आए दिन शास्त्रीय संगीत की महफ़िलों से गुलज़ार रहती।
जुगलबंदियाँ, ठुमरियाँ, कजरियाँ, चैतियाँ के दौर चलते। सारंगी
पर अब्दुल नज़ीर साहब, तबले पर खुदा बख़्श ओरंगावाले और
हारमोनियम पर मज़ाज़ साहब की संगत खूब मशहूर थी।
अलावा इसके, ठहाकों की आवाज़ें गूँजती
रहतीं—मुलाज़िमों-मेहमानों की आवाजाही, खाना पक रहा है, देगें
चढ़ रही हैं, खुशबुओं से हवेली तो क्या, मोहल्ला-गली सब सराबोर
हो रहे हैं। लाल रंगे होठों वाली रज्जो आपा मुस्कुराते हुए
पानों के बीड़े पे बीड़े लगाए जातीं। मेहंदी-इत्र की खुशबू,
जनानखाने के पर्दे के पीछे से बीवियों की चूड़ियों की आवाज़ें
और खनकदार हँसी के गुच्छे हवा में रह-रहकर उड़ते।
लोग-बाग भी क्या शौक़ीन थे! कहाँ-कहाँ से बैठकों में शामिल
होने आते—अमीनाबाद, रकाबगंज, चौक, मौलवीगंज, इमामबाड़ा,
मक़बूलगंज, केसरबाग... रात और दिन का फ़र्क़ न तब पता चलता था,
न अब!
धीरे-धीरे सब चले गए—बुज़ुर्ग, रस्म-रिवाज़, मिरासिनें,
महफ़िलें, रौनक, ठाठ-बाट, इज़्ज़त, मेहमाननवाज़ी, किस्से,
बतौले, गम्मतें। अब तो बतौर गवाह फ़क़्त दो निशानियाँ बाकी बची
थीं—एक ज़र्ज़र हवेली और दूसरे छुट्टन मियाँ।
उम्र तो उनकी भी हो गई है। लोग गाहे-बगाहे कह भी देते
हैं—“माशाअल्लाह, लंबी उम्र पाई है उस्ताद जी ने। सब बुज़ुर्ग
चले गए, पर ये उन सबसे आगे निकल गए।” पर न जाने क्यों छुट्टन
मियाँ को अक्सर लगता है कि वे अपने सब बुज़ुर्गों से बहुत पीछे
छूट गए हैं।
जब से ज़माने की रंगत बदली और छुट्टन मियाँ को लकवे का हल्का
दौरा पड़ा है, अक्सर आधी रात में जब सन्नाटे हू-हू करते हुए
पछुवा हवा की नाईं कानों में सरसराते हैं, तो उनके पीछे से ये
आवाज़ें धकमपेल मचाने लगती हैं।
“सदारंग जिन जावो बिदेसवा, सुख नीदरिया सोवन दे रे...” उनका
पसंदीदा ख़याल और वे हड़बड़ा कर उठ बैठते हैं।
आज फिर वही हुआ।
छुट्टन मियाँ की गड्ढे में धँसी पनीली आँखें झुर्रियों की
सिलवटों के बीच से घूर-घूर कर देखने लगीं चारों ओर... जहाँ
सन्नाटों के स्याह जंगलों में मनहूसियत निशाचरी-सी भटक रही थी।
मरियल-सी पालतू कुतिया, जो उनकी ज़रा-सी हरकत पर मूँज की खाट
के नीचे से पूँछ हिलाती हुई निकल आती थी, निकल आई और उन्हें
घूरने लगी।
हमीद मियाँ उर्फ़ छुट्टन मियाँ ने उसके सिर पर हाथ फेरा। वह
कूँ-कूँ करती फिर खटिया के नीचे घुस गई। वही तो बची है अब, जो
सुनने-देखने से करीबन लाचार हो चुके छुट्टन मियाँ को बात-बात
में खीझकर कोसती नहीं। कंपकंपाते हाथों से सुराही पलटकर पीतल
के गिलास में पानी भर, दो घूँट सटक उन्होंने। कहीं से कोई
आवाज़ का कतरा तक नहीं... रात के सन्नाटे खिंचे थे, बस उनके
कानों में महफ़िलें जमी थीं।
“एय हम्मे मियाँ, उठो...” अब्बू यानी बड़े उस्ताद जी नियम से
बेनागा सवेरे चार बजे उठा देते छुट्टन मियाँ को रियाज़ करने,
मौसम के किसी लिहाज़ के बग़ैर। और ख़ासुलख़ास लखनवी अंदाज़ में
बोलते— “संगीत की तालीम कोई गिल्ली-डंडे का खेल नईं है मियाँ।
नईं तो आज हर ऐरा-गैरा, नत्थू-खैरा गवैया बना घूम रहा होता। ये
एक इबादत है। इसके लिए हौसला चाहिए, रियाज़ और जुनून चाहिए। तब
कहीं जाकर खानदानी गवैये का ओहदा हासिल होता है। समझे के नईं?”
हौसला-अफ़ज़ाई सुनते हुए हमीद मियाँ आँखें मीँचते उठ बैठते।
“बेगम, ज़रा लोंग-काली मिर्च का मज़ेदार काढ़ा तो बनाओ हमारे
चश्मेनूर के लिए... और हमारे लिए कड़क चाय।” अब्बू रोबदार
आवाज़ में कहते।
अम्मी को ज़रा देर हो जाती लाने में तो अब्बू नाराज़ हो जाते—
“शुक्रिया, अब रहने दीजिए बेगम, वक़्त निकल चुका।”
अम्मी घबरा जातीं, परेशान हो जातीं, फुसफुसातीं— “अरे, बस
लकड़ियाँ ज़रा गीली थीं...”
वो मनुहार करती रहतीं, दरवाज़े की आड़ में खड़ी। सहमते हुए
कहतीं— “मियाँ, अब ले आबें?”
“नहीं-नहीं, खुदा के लिए बख़्शिए बेगम।” बड़े उस्ताद जी खीझ
जाते। “अब आप यहाँ से तशरीफ़ ले जाइए, अब तालीम का वक़्त हो
रहा है।” फिर चिढ़कर कहते— “वक़्त कोई आपकी बकरी नहीं है बेगम,
जब चाहे जहाँ चाहे बाँध दिया।”
बिस्मिल्लाह करते और फिर रियाज़ शुरू। अब्बू तांड पर से कनेर
की हरी संटी निकालकर अपनी बगल में रख लेते। रखते तो इस गरज़ से
कि ज़रा गलती की और सटाक... दरअसल संटी रखना भी तालीम के
पुश्तैनी रिवाज़ में शरीक था, तालीम का ही एक हिस्सा। अब्बू के
अब्बू भी उनको संटी बगल में रखकर संगीत की तालीम दिया करते थे,
पर न उन्होंने कभी उसका इस्तेमाल किया, न ही अब्बू ने। बस वह
एक संकेत होती थी खानदानी कवायद की।
और फिर तालीम शुरू... बड़े उस्ताद साहब यानी अब्बू हारमोनियम
संभाल लेते और हमीद मियाँ पालथी मारकर खरज के स्वर जमाते। फिर
अलंकार, आलाप, छोटा ख़याल, बड़ा ख़याल... बोल आलाप, कूट तान।
किसी अच्छी “चीज़” पर अब्बू “वाह-वाह” कहकर दाद दे उठते तो
छुट्टन मियाँ की आँखों में हौसले तिरने लगते। वे और ज़ोरदार
गमक की तान लगाते। बड़े उस्ताद जी की आँखों में एक पारदर्शी
छलछलाहट चमकने लगती, उँगलियाँ और तेज़ी से हारमोनियम पर फिसलने
लगतीं।
यूँ तो बड़े उस्ताद साहब पाँचों बख़्त के नमाज़ी मुसलमान होना
उनके लिए फ़ख़्र और इज़्ज़त की बात थी, लेकिन वे कहते— “संगीत
का खुदा, ईश्वर—सब एक है।”
और फिर जब से अब्बू मैहर जाकर ख़ान साहब से गंडा बंधवा आए थे,
सो देवी-भक्त भी हो गए थे। इतना ही नहीं, गोश्त और निरामिष
भोजन से तौबा भी कर ली थी। उन्होंने ताजिंदगी इन नियमों को
निभाया।
अपने साथ कभी-कभी बड़े उस्ताद जी उर्फ़ अब्बू मियाँ महफ़िलों
में कहते— “मियाँ, रोज़गार तलाशना पड़े, उससे पहले तो मौत ही आ
जाए खुदा कसम। यक़ीन मानिए जनाब, भूखों मर जाएँगे पर अपना
खानदानी हुनर छोड़कर पचास रुपये की भी नौकरी मिलेगी, तो भी
रुख़ नहीं करेंगे। मुसलमान ज़बान का पक्का होता है।”
वे फ़ख़्र और रोब से कहते।
सचमुच ज़बान के पक्के निकले बड़े उस्ताद जी। देह सींक हो गई
थी। खाँसते-खाँसते आँखें बाहर निकल आतीं, दम फूल जाता, पलटियाँ
खाने लगते बिस्तर पर... पर मजाल जो किसी का अहसान ले लें! कोई
अज़ीज़ मदद की बात करता तो टाल जाते। यहाँ तक कि राज्य सरकार
ने आर्थिक मदद देने की गुज़ारिश भी की, पर अब्बू ने साफ़ इनकार
कर दिया— “बरख़ुरदार, हम गवैये हैं, कोई भिखमंगे नहीं।”
और पड़े रहे बिना दवाई के, वही रूखा-सूखा खाकर।
अब न वह खानदानी हुनर बचा, न पेशा। वह भी उनके साथ उनकी ही तरह
आख़िरी साँसें गिन रहा था। औलादें सब अपनी नौकरियों,
बीवी-बच्चों की ख़िदमतदारी में लग गए। यूँ भी उनके नए-नए
व्यवसाय थे, सो ज़्यादा बरक्कत भी नहीं थी। और फिर ख़ैरख़्वाह
का ताल्लुक तो जेहनी इज़्ज़त और आँखों की शर्म से होता है। जब
वह अहसास ही नहीं तो कैसा सुख? बुज़ुर्गों की तीमारदारी के लिए
न वक़्त था किसी के पास और न पैसा।
“ग़ालिबन, इलाज ढंग का हो गया होता तो कुछ बरस और जी जाते
अब्बू।” छुट्टन मियाँ अफ़सोस मनाते। “पर क्या करते जीकर? हम जी
तो रहे हैं—न जीने में, न मरने में। खुदा का शुक्र है कि अब्बू
बुज़ुर्गियत और इस खानदानी हुनर की फ़जीहत देखने से पहले अल्ला
मियाँ को प्यारे हो गए।”
छुट्टन मियाँ की आँखें जल्दी-जल्दी झपकने लगीं। उनके भीतर फिर
कुछ उलटने-पुलटने या पिघलने-सा लगा। छुट्टन मियाँ ने एक और बार
उठकर गला तर किया। अफ़सोस और नींद की कम्बख़्त ज़नम की दुश्मनी
है। जैसे ही अफ़सोस आते हैं ज़ेहन में, नींद एक गुस्सैल
पंछी-सी जाकर रात के पहाड़ पर बैठ जाती है। यादों ने फिर
घेराबंदी शुरू कर दी। वे जकड़ते गए उसमें। छुट्टन उस्ताद फिर
बैठ गए उकड़ूँ पलंग पर।
यूँ तो अब्बू के साथ वे देश भर में बड़े शास्त्रीय संगीत के
प्रोग्रामों में जाते थे, लेकिन ग्वालियर का तानसेन संगीत
समारोह—जो उस दौर का सबसे बड़ा संगीत का प्रोग्राम माना जाता
था—में अब्बू के साथ दो दफ़े जाना कुछ अलग था।
अब्बू की बगल में बैठकर सुरमंडल के तारों को छेड़ते हुए
उन्होंने भी राग दरबारी कान्हड़ा गाने में साथ दिया था बड़े
उस्ताद साहब का। तालियों की गड़गड़ाहट अभी तक दिमाग़ में
ज्यों-की-त्यों हिलोरती है। छुट्टन मियाँ की फीकी आँखों में
चमक आ गई। दूसरे दिन ग्वालियर के अख़बार में उनकी और अब्बू की
तस्वीर छपी थी गाते हुए। ख़बर भी थी— “देश के सुप्रसिद्ध
शास्त्रीय संगीत के गायक लखनऊ घराने के उस्ताद अमानुल्ला ख़ान
का तानसेन संगीत समारोह में बेहतरीन प्रदर्शन। उनके बेटे
उस्ताद हमीदुल्ला ख़ान की शानदार शिरकत।”
छुट्टन मियाँ के इकहरे शरीर में फुरफुरी-सी दौड़ गई। उनके
खंडहर जैसे चेहरे पर फिर पुरानी यादों की मोमबत्ती टिमटिमाने
लगी।
वे पैर लटकाकर बैठ गए चारपाई पर। कुतिया फिर निकल आई खाट के
नीचे से और उनके पैरों पर लोटने लगी। छुट्टन मियाँ मुस्कुराने
लगे। लटपटाते शब्दों और काँपती आवाज़ में बोले— “मोहतरमा, देखा
होता वो जश्न आपने भी, मज़ा आ जाता। बस, लोग-बाग खड़े हो-होकर
तालियाँ पीट रहे थे जब हमने दो सप्तक की ज़ोरदार गमक की तान
खींची। जानती हो, अब्बू ने पलटकर वहीं शाबाशी दी थी हमें...”
कुतिया यूँ ही देखती रही उनकी तरफ़ कुछ देर, फिर पूँछ को
अकड़ाकर उसने जम्हाई ली और धीरे-धीरे आँगन के दूसरे कोने में
जाकर पैरों में मुँह देकर बैठ गई। छुट्टन मियाँ दुबारा लेट गए
पलंग पर। थकान-सी हो गई थी उन्हें।
“चलना-फिरना तो दूर की बात, कम्बख़्त ज़रा ख़्वाब भर देख लें
तो साँस फूल जाती है।” वे भीतर ही भीतर बड़बड़ाए। उन्होंने
आँखें मीँच लीं। यादों का हुजूम फिर बह निकला। तहख़ाने का सहन
तालीम का कमरा हुआ करता था, जिसमें अब घर में इस्तेमाल न होने
वाली बेकार चीज़ें भरी हुई हैं।
यादें ताज़ा करने की मंशा से उस दिन सालों बाद छुट्टन मियाँ जब
बेटे सलीम का हाथ पकड़कर सहन में जा रहे थे, तहख़ाने की पाँच
सीढ़ियाँ उतरते हुए तो लग रहा था जैसे सैकड़ों वर्षों से
सीढ़ियाँ उतर रहे हैं—ख़त्म ही नहीं हो रहीं!
छुट्टन मियाँ जब पहले-पहल बाप बने और बड़े उस्ताद जी दादा
मियाँ, तो हवेली मानो जश्न में डूब गई। मिरासिनें आईं लखनऊ के
अमीनाबाद के ज़नाना पार्क के क़रीब से। खूब नाच-गाना,
इनाम-इकराम हुआ।
दूसरे दिन संगीत की महफ़िल जमी। अख़्तरी बाई फैज़ाबादी (बेगम
अख़्तर) की ठुमरी— “मैंने लाखों के बोल सहे सितमगर तेरे
लिए...” और बड़े उस्ताद साहब के जिगरी दोस्त उस्ताद
बिस्मिल्लाह ख़ान की शहनाई के राग पूरिया धनाश्री ने समा बाँध
दिया।
मेहमानों की फ़रमाइश पर “दिल का खिलौना हाय टूट गया” जब ख़ान
साहब ने अपनी जादुई उँगलियों से बजाया तो महफ़िल वाह-वाह से
गूँज उठी। शानदार जश्न था... पूरा शहर माशाल्लाह जमा हो गया था
जैसे। खाना-पीना, संगीत की महफ़िल, हँसी-ठिठोली,
किस्से-बतौले... छुट्टन मियाँ की आँखें फिर सपनों से भरने
लगीं। हालाँकि बड़े उस्ताद साहब उस जश्न के वक़्त तक काफ़ी
कमज़ोर हो गए थे, दिखना-सुनना भी कम हो गया था, पर उन्होंने
मेहमानों से खुश होकर कहा था— “ख़ानदान का एक और फ़नकार पैदा
हो गया है।”
अचानक छुट्टन मियाँ की देह में फुर्ती-सी आ गई। छुट्टन मियाँ
गुनगुनाने लगे। होठों पर बिलखते गीत यादों की बाड़ तोड़कर बह
निकले— “फूलना की सेज करो सखी, सब काज धरो...”
“अरे, आधा दिन गुज़र गया, आप अभी तक धूप में ही पड़े हैं?”
अचानक जैसे हरहराती नदी के ऊपर बना पुल टूट गया हो और राहगीर
डुब्ब से... यह सलीम था—छुट्टन मियाँ का जवान बेटा।
“अब इस क़दर दीवाने न होइए अब्बू कि धूप-छाँव का मतलब ही भूल
जाइएगा। बड़बड़ाते अलग रहते हो।” उसने उलाहना
देते
हुए कहा। छुट्टन उस्ताद हड़बड़ाकर उठ बैठे।
सलीम ने खाट को धूप में से सरकाते हुए नीम के पेड़ की छाँह में
किया और खीझते हुए कहा— “कहाँ खो जाते हो आजकल अब्बू? ये नई
बीमारी हो गई है आपको या किसी रूह का साया है बदन पे?”
“नहीं, खोए नहीं थे।” छुट्टन मियाँ ने अस्पष्ट आवाज़ में कहा।
“बस ज़रा दूर तलक निकल गए थे।”
सलीम ने सुना नहीं, वह चला गया। छुट्टन मियाँ खाट पर लेटे-लेटे
नीम के झुरमुट में से चमकीले आसमान की परतों को खोद-खोदकर फिर
आवाज़ें ढूँढने लगे, जो अभी-अभी वक़्त के शोर में गुम हो गई
थीं। |