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संस्मरण 

अतुल अरोरा


अटलांटा के अलबेले रंग
(पाँचवाँ भाग)

उत्तर दक्षिण समागम

मेरे मित्र अनुपम जी कुछ दिन के लिए मेरे कार ड्राइविंग के द्रोणाचार्य बन गए। एक दिन उनके साथ मंदिर जाना हुआ। अमेरिका में आने के बाद पहली बार मंदिर जाने का सौभाग्य मिला। मंदिर में गणेश, शिव, हनुमान, मुरुगन, भूदेवी, तिरूपति बालाजी, सब की प्रतिमा एक साथ एक हॉल में देख कर सुखद आश्चर्य हुआ।

मैंने अनुपम जी से, जो हिंदू स्वयंसेवक संघ के सक्रिय कार्यकर्ता थे, से हर्षमिश्रित आश्चर्य से कहा कि भारत से भाषावाद–क्षेत्रवाद की समस्या यहाँ नहीं आई। क्या उत्तर क्या दक्षिण सब के देवी देवता एक साथ सुशोभित हैं। अनुपम भाई ने एक ही क्षण में मुझे यथार्थ के धरातल पर ला पटका। वे बोले- मान्यवर ये विशुद्ध अर्थशास्त्र है, राष्ट्रप्रेम जैसा कुछ नहीं है। भाई, जब मंदिर बना तो हैदराबादी बिना बालाजी की मूर्ति लगे चंदा नहीं दे रहे थे, वहीं तामिलनाडु और कर्नाटक वालों को लगता है कि उन्हें सिर्फ़ मुरुगन, भूदेवी या लक्ष्मी का आशीर्वाद ही फलीभूत होगा और बचे उत्तर भारतीय, तो वे अपनी टेंट तभी ढीली करेंगे जब यहाँ हिंदी में की गई प्रार्थना स्वीकारने वाले हनुमान जी विराजें। वह तो अटलांटा में काफ़ी देशी (भारतीय) हैं वरना चंदा पूरा करने के लिए गुरुग्रंथ साहिब और भगवान बुद्ध को भी मंदिर का हॉल शेयर करना पड़ता।

बाद में पता चला कि अटलांटा में जिमखाना क्रिकेट क्लब, तमिल समाज, पंजाबी बिरादरी, जैन सम्मेलन, बंगाली असोसिएशन, सिंधी सभा आदि–आदि सारे मंच अपने–अपने एजेंडे के साथ विद्यमान हैं। मैं सोच रहा था कि हम भारत से अपनी संस्कृति ही साथ नहीं लाते, अपना भाषावाद, जातिवाद और क्षेत्रवाद वगैरह की दीवारें भी साथ ले आते हैं। यह सब हमारी मानसिक बेड़ियाँ हैं जिनसे हमें छुटकारा मिल ही नहीं सकता। वैसे जहाँ एक ओर भाषावाद, जातिवाद और क्षेत्रवाद की बेड़ियाँ दिखीं, वहीं एक सुखद अहसास भी हुआ। अमेरिका में भगवान भी एनआरआई नफ़ासत के साथ रहते हैं। एयरकंडीशंड मंदिर, स्वच्छ वातावरण, अनुशासित भक्त। ताज्जुब है कि दीवार पर दिशा निर्देशों का पूरी सजगता से पालन होता है। न कोई फोटोग्राफ़ी कर रहा है, न कोई शिवलिंग पर मत्था रगड़ कर उसे चमका रहा है न ही प्रसाद के लिए मारामारी। सिर्फ एक कमी खलती है, नये मंदिरों की बात छोड़ दें तो ज़्यादातर पुराने मंदिर डाऊनटाउन में बने हैं, अति सीमित पार्किंग के साथ। मंदिर व्यवस्थापक शुरू में जहाँ आकर बसे वहीं मंदिर ठोक दिया। भविष्य में भक्त संख्यावृद्धि का ख्याल उनके जहन में कभी नहीं आया। अब चाहे शहर कितना बढ़ जाए पर कई मंदिर व्यवस्थापक सुविधाविस्तार के मामले में भारतीय रेल मंत्रालय की तरह सोचते हैं। जहाँ जी चाहे स्टेशन बना दो, पब्लिक को सत्तर बार गरज है तो आएगी ही।

गोस्वामी जी की आंसरिंग मशीन

आजकल दिल्ली, मुंबई में तो आंसरिंग मशीन आम बात हो गई है। १९९९ में यह मेरे लिए नयी चीज़ थी। प्रहसन तब होता है जब यह अजूबा किसी छोटे शहर में पहुँच जाए। हमारे गोस्वामी जी भारत यात्रा से लौटकर आए तो सुनाने के लिए उनके पास यही प्रहसन था। बेचारे एक अदद आंसरिंग मशीन ले गए अपने मथुरा वाले घर में। उन्होंने आंसरिंग मशीन को फोन कनेक्ट करके रख दिया और बाकी परिवार के साथ छत पर जाकर चाय पीने लगे। तभी नीचे से नौकर चिल्लाया कि "भइया जिज्जाजी ई भोंपू से कईस चिलाय रहे हैं?" सबने नीचे झाँका तो विकट दृश्य था। गोस्वामी जी के पड़ोस के मुहल्ले में रहने वाले जीजाजी ने फोन किया था। फोन चार घंटी बजते ही आंसरिंग मशीन पर ट्रांसफर हो गया। आगे का नज़ारा खुद गोस्वामी जी के शब्दों में–

आंसरिंग मशीन : श्री कुंदन गोस्वामी जी (गोस्वामी जी के पिताश्री) इस समय . . .
जीजाजी : हल्लो, हल्लो
आंसरिंग मशीन : . . .या तो व्यस्त हैं या...
जीजाजी : अरे कौन बोल रहा है बिरजू (गोस्वामी जी का घरेलू नाम)?
आंसरिंग मशीन : ... या घर में नहीं हैं...
जीजाजी : अरे बिरजू ई हम हैं मुरली (खुद जीजाश्री) पहिचाने नहीं का?
आंसरिंग मशीन : ... आप कृपया बीप बजने के . . .
जीजाजी : अरे तुम कहीं संतू (गोस्वामी जी का नटखट भतीजा) तो नहीं हो, ई का शैतानी कर रहे हो छोरा लोग? चाचा की आवाज़ बना के बोलत हौ?
आंसरिंग मशीन : ... बाद अपना संदेश रिकार्ड करें...।
जीजाजी : अरे का रिकार्ड करें, हम कोई गवैया है का? हे संतू, तनिक चाचा (गोस्वामी जी)को बुलाओ।
आंसरिंग मशीन : बीप...
जीजाजी : ए संतू तुम लोग बहुत शरारती हो गए हो, चाचा की आवाज़ बना के बोलते हो, अरे काम की बात करनी है, बुलाओ जल्दी चाचा को, नहीं तो हम आ रहे हैं।
आंसरिंग मशीन :... सन्नाटा...
जीजाजी : अच्छा नाहीं मनिहौ, अभी हम आवत है तुम्हारी कुटम्मस करै की ख़ातिर। धड़ाक से फोन पटकने की आवाज़।
इधर संतू मियाँ जो पास ही खेल रहे थे, जीजाश्री की आवाज़ सुनकर सिहर गए। जीजाजी के खामखा में संभावित आक्रमण की धमकी से उनकी पैंट भी गीली हो गई थी। गोस्वामी जी के पिताजी अलग चिल्ला रहे थे कि यह क्या तमाशा है, यहाँ किसी को इन सब झमेलों का शऊर नहीं है। तभी गोस्वामी जी की मुश्किलों में इज़ाफा करते गुस्से में लाल पीले जीजाश्री का अवतरण हुआ। आते ही भाषण चालू कि तुम लोगों ने लड़कों को बिगाड़ रखा है, फोन तक पर मज़ाक करते हैं, बड़ों की आवाज़ की नकल करके बेवकूफ बनाते हैं वगैरह–वगैरह। जीजाश्री को लस्सी पिला कर ठंडा किया गया और फिर उन्हीं की आवाज़ आंसरिंग मशीन पर सुनाई गई। आशा के विपरीत जीजाश्री का कथन था "लाला ई भोंपू हमरे लिए काहे नहीं लाए। बहुत काम की चीज़ लगत है।" और आशानुसार गोस्वामी जी के पिताजी ने तुरंत बवालेजान यानि की आंसरिंग मशीन को जीजाश्री के सुपुर्द कर दिया।

पीजी भाई

जिंदगी में कुछ लोग ऐसे भी मिलते हैं जो बिन माँगे हमेशा सबकी मदद को तत्पर रहते हैं। हमारे पीजी भाई ऐसे ही जिंदादिल शख्स हैं। मैं पहली मुलाकात में उनका कायल हो गया था। न जाने कैसे उन्होंने मेरे मुँह से सिर्फ़ एक वाक्य सुन कर ताड़ लिया कि मैं कानपुर से हूँ। अमेरिका में रहने लायक जुझारूपन पीजी भाई की शागिर्दी में सीखा है। १५ अगस्त को मजेदार वाक्या हुआ। सिविक सेंटर पर १५ अगस्त का मेला लगा था। खाने पीने से लेकर हर तरह की धार्मिक–सामाजिक धंधेबाजी के स्टाल लगे थे। कुछ देशप्रेमी कारगिल में पाकिस्तानी ज़्यादतियों के विरोध में हस्ताक्षर अभियान छेड़े हुए थे। मैं और पीजी भाई कुछ अति उत्साहियों की ज़बानी पतंगबाजी का मज़ा ले रहे थे। पाकिस्तानी पर ज़बानी गोलीबारी में कोई सूरमा भोपाली पीछे नहीं रहना चाह रहा था। ऐसे तनावपूर्ण वातावरण में पीजी भाई को मसखरी सूझी। वे बोले यदि आप सब साथ दें तो हम पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवाद को मुँहतोड़ जवाब दे सकते हैं। सभी को लगा कि पीजी के दिमाग़ में कोफी अन्नान या बिल क्लिंटन को चिठ्ठी लिख मारने सरीखा कोई धाँसू आइडिया खदबदा रहा होगा। सारे भारत माँ के सपूत समवेत स्वर में बोले, पीजी भाई आप बस हुक्म करो हम सबका तो खून खौल रहा है। पीजी भाई बोले तो निकालो सब दस–बीस डालर। इस अप्रत्याशित पहल पर सबका 'क्यों' कहना प्रत्याशित था। पीजी भाई ने प्रस्ताव रखा कि जब पाकिस्तान आतंकवाद प्रायोजित कर सकता है तो हम क्यों नहीं। रकम खर्च कर के क्या हम भी किसी बंबई दुबई के पप्पू पेजर, मुन्ना भाई या मदन ढोलकिया को कराची या लाहौर में एकाध बम फोड़ने की सुपारी नहीं दे सकते। अगर आप हज़ार डालर भी इकठ्ठा कर लो तो मैं सुपारी का इंतज़ाम करता हूँ। मैंने देखा कि भारत माँ के सारे सपूत जिनका कुछ देर पहले खून खौल रहा था अपने–अपने दस डालर लेकर छोले भटूरे का स्टॉल तलाशने में लग गए। पीजी भाई का फ़लसफ़ा कुछ अलग ही है। उन्होंने न्यूयार्क के भिख़ारियों की बदहाली की वीडियो फ़िल्म बना रखी है, जिसे वह हिंदुस्तान में अमेरिका–पूजकों को खासकर दिखाते हैं।

हिंदू स्वयंसेवक संघ

यह भारत वाले आरएसएस का अंतर्राष्ट्रीय संस्करण है। शुरू के महीनों में सप्ताहांत पर करने को कुछ विशेष न होने के कारण शाखा में भी भाग लिया। इसकी गतिविधियों में भाग लेकर पता चला कि हिंदू स्वयंसेवक संघ की उपयोगिता कितनी है और साथ ही लोगों, खासकर बुद्धिजीवियों के इससे बिदकने के कारण है। स्वयंसेवक संघ का अमेरिकी संस्करण एचएसएस क्रीमी लेयर समाज से आने वाले लोगों की वजह से कुछ 'हटके' है। इसके पुराने सदस्य पहली बार अमेरिका आने वालों की यथासंभव मदद करते हैं, किसी भी सामाजिक कर्तव्य को निबाहने में, चाहे गुजरात का भूकंप राहत कोष एकत्र करना हो या कारगिल युद्ध में पाकिस्तान विरोध मार्च, आगे रहते हैं। सबसे अच्छा प्रयास तो बालगोकुलम का है। छोटे बच्चों के लिए भारतीय संस्कृति एवं महाकाव्यों पर आधारित लघुकथा, नाटक, मातृभाषा सिखाने हेतु सप्ताहांत पर कक्षाओं का आयोजन होता है। अभिभावक ही सामूहिक रूप से कक्षा संचालन की ज़िम्मेदारी लेते हैं। संघ की भूमिका पाठ्य सामग्री एवं आवश्यक प्रशिक्षण तक सीमित रहती है। भारत के बाकी हिस्सों का तो पता नहीं पर अपने उत्तर प्रदेश में लफंगातत्व धर्म का तथाकथित ठेकेदार बनकर ऐसे संघटन में स्वार्थवश घुस जाता है और बुद्धिजीवी ऐसे तत्वों की वजह से बिदकते हैं।

दिव्यराज जी और उनका गृह प्रवेश समारोह

दिव्यराज सिंह जी अटलांटा में संघ के सक्रिय कार्यकर्ता हैं। एक दिन मणिका जी (दिव्यराज सिंह की धर्मपत्नी) ने सकुचाते हुए अनुरोध किया कि मैं उनके पुराने घर से नये घर में सामान पहुँचाने में सहयोग कर दूँ। दिव्यराज जी कुछ संकोची स्वभाव के हैं। उनके संकोच का एक अन्य कारण भी था। एक अति उत्साही स्वयंसेवक एक दिन पहले उनके घर से पुराना सामान फिंकवाते समय उनके खालिस नये महँगे जूते का डिब्बा कचरा समझ कर फेंकने की नादानी कर चुका था। दिव्यराज सिंह जी अब किसी नौसिखिए स्वयंसेवक से सेवा लेने का साहस नहीं जुटा पा रहे थे। मैंने उनका संकोच 'मैं कुली नं. वन हूँ' कह कर दूर कर दिया।

अगले दिन पूरे विधि विधान से एक पंडित जी ने नये घर में हवन संस्कार कराया। बाद में पीजी भाई आदतन पंडित जी से शास्त्रार्थ में उलझ गए। यह संवेदनशील मुद्दा था मदिरापान के तथाकथित रूप से धर्मविरुद्ध होने का। पीजी भाई का तर्क जायज था, आख़िर जब देवताओं द्वारा खुद सुरापान कर सकते हैं तो भक्तों के शौक पर शास्त्रों के बहाने क्यों अड़ंगा लगा रखा है। पीजी भाई पूरी तरह से हावी थे जबकि पंडित जी पतली गली से भागने का मार्ग तलाश रहे थे ताकि अगले यजमान के यहाँ विलंब न हो।

पंडित जी सवेरे–सवेरे एक और हादसे से दो चार हो चुके थे। दिव्यराज जी के घर का पता था ७१२५ ब्रुकवुड रिवर। बुकप्लेस कम्युनिटी, ब्रुकवुड रिवर नाम की कम्युनिटी से कुछ ही पहले था। पंडित जी सवेरे पाँच बजे गफ़लत में ७१२५ ब्रुकप्लेस में जा धमके और चार पाँच बार दरवाज़े की घंटी दे मारी। मकान मालिक कोई गोरा अमेरिकन था। बेचारे ने उनींदी आँखों से दरवाजा खोला। पंडित जी दरवाज़ा खुलते ही बोले "व्हेअर इज़ देवराज"। गोरे अमेरिकन जिसकी अभी ठीक से नींद भी नहीं खुली थी उसके लिए गेरुआ वस्त्रधारी एवं पूर्ण मस्तक चंदन तिलकधारी, अजीब सा नाम पूछते पंडित जी किसी मंगल ग्रह के निवासी से कम साबित नहीं हुए। गोरा अमेरिकन पंडित जी को हेलोवीन कास्टयूमधारी समझ रहा था। हेलोवीन नवंबर के महीने में मनाया जाने वाला पर्व है जिसमें बच्चे भूत-प्रेत या अन्य विचित्र किस्म के कपड़े पहनकर टोली बनाकर घर–घर टाफियाँ माँगने निकलते हैं। वह गोरा पलटा और कुड़कुड़ाते हुए पंडित जी को एक मुठ्ठी टॉफी टिकाने लगा। जबकि पंडित जी जो यह समझ रहे थे कि दिव्यराज जी ने शायद यह घर जिस किसी से खरीदा है वह पुराना मकान मालिक अभी भी वहाँ डटा है। पाँच मिनट बाद पंडित जी को पता चला कि वे गलत घर में आ गए हैं और ७१२५ ब्रुकवुड रिवर में उनका इंतज़ार करते हुए देशी जनता सूख कर काँटा हो रही है।

कोरोला की शहादत

करीब छः सात महीने बाद जब कार, अपार्टमेंट इत्यादि का इंतज़ाम हो गया तो अपने परिवार (दादा, प्रीति व चारु) को कानपुर से बुला लिया। चार महीने रहने के बाद दादा वापस कानपुर चले गए। उनको अटलांटा एअरपोर्ट से विदा कर वापस आ रहा था। प्रीति (मेरी धर्मपत्नी) व चारु कार की पिछली सीट पर बैठी थीं। पेरीमीटर फ्री वे की सबसे दाईं लेन से चार लेन बाईं तरफ चेंज की। तभी देखा कुछ दूर एक कार मेरी लेन में खड़ी है। सारी लेन का ट्रैफिक भाग रहा है और यह कार बीचों-बीच खड़ी थी। पूरी ताकत से ब्रेक लगाए। मेरी कार रुकते–रुकते आगे वाली कार से हौले से जा लड़ी। तभी दो ज़बरदस्त झटके लगे। पीछे की खिड़की का काँच टूटकर हम सब पर आ गिरा। परमात्मा की कृपा से किसी को चोट नहीं लगी। बाहर निकल कर देखा, मेरी कार के आगे व पीछे दो–दो कार और दुर्घटना में शामिल थीं।

तेज़ रफ़्तार ट्रैफिक के साथ यही मुश्किल है। अगर एक कार किसी वजह से रुक गई तो पीछे की कईं कारें मरखनी भेड़ों की तरह बिना आगा पीछा सोचे एक दूसरे के पीछे पिल पड़ेंगी। कार का ट्रंक पिचक गया था। पुलिस व एंबुलेंस वाले दो मिनट में आ गए। कोई घायल नहीं था इसलिए सारी कार्यवाही आधे घंटे में निपट गई। यह विदेश में दुर्घटना का पहला अनुभव था। इंश्योरंस कंपनी ने कार को शहीद (अमेरिकी भाषा में टोटल) घोषित करार देकर कार की पूरी कीमत के बराबर क्षतिपूर्ति कर दी। यहाँ कल्लू मिस्त्री छाप मरम्मत बहुत महँगी पड़ती है। शायद इसीलिए यूस एंड थ्रो का चलन है। शुरू में भारत में किसी को दुर्घटना के बारे में नहीं बताया, सब नाहक परेशान होते। पर एक दिन चारु पटाखा अपने दादा जी से फोन पर बोल पड़ी कि दादा मैं बच गई। अब यह रहस्योद्घाटन ज़रूरी था कि चारु किस चीज़ से बची।

दो दिन बाद नयी कोरोला ली। इस बार मोलभाव के लिए पीजी भाई साथ थे। ठोंकबजा कर कार दिला दी। ज्ञानी मित्रों ने कदम–कदम पर मार्गदर्शन किया वर्ना वही होता जो अब छः साल बाद मेरे मित्र के साथ हुआ। हम दोनों साथ कहीं जा रहे थे, ड्राइविंग सीट पर बैठे मेरे मित्र बता रहे थे कि उन्होंने इंश्योरंस से कोलीजन डेमेज वेव कर दिया किसी की गलत सलाह के चलते। तभी उनका ज़बरदस्त कोलीजन दूसरी कार से हुआ और हमारी कार के सेफ्टी बैग तक बाहर आ गए। हम दोनों तो बच गए पर कार शहीद हो गई। आज जब यह कहानी लिखने बैठा तो छः साल पहले के सत्यनारायण स्वामी याद आते हैं। सुरक्षा से कभी समझौता न करने के उनके दृष्टिकोण के चलते उन्होंने न सिर्फ़ खुद, बल्कि मुझे भी महँगा इंश्योरंस दिला दिया था। हालाँकि बहुत से लोग पैसे को दाँतों से पकड़ कर चलने की आदत के चलते इंश्योरंस में कटौती कर देते हैं और बाद में खामियाज़ा भुगतते हैं।

९ मई २००५

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