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समकालीन कहानियों में
इस माह
प्रस्तुत है- जापान से हरजेन्द्र चौधरी
की
कहानी
मायालोक
मैं अपने वर्क-रूम में जाने के लिए प्रोटीन रिसर्च इंस्टीट्यूट
की लिफ़्ट में ही था कि मोबाइल टनटना उठा। जब से जापान आया
हूँ, मन में अंदेशा रहता है या शायद नहीं रहता कि भारत से बुरी
ख़बर कभी भी आ सकती है। स्क्रीन देखकर तसल्ली हुई कि कॊल
प्रोफ़ेसर कियोशिमा की है। आदतन बोले गए शुरुआती 'मुशि-मुशि'
के बाद उन्हें 'हैलो-हैलो' बोलने का ध्यान आया।
“आइ हैव फ़िक्स्द द वीक-एँद प्रोग्राम। कीप योरसेल्फ फ़्री ओन
फ़्राइदे इवनिंग।" वह शायद जल्दी में थे, इसलिए उन्होंने मेरी
अधसीखी-अधभूली जापानी को देखते हुए सीधे अंग्रेज़ी में बोलने से
परहेज़ नहीं किया।
मेरे 'ओके सेंसेई। आरिगातो गोज़ाइमसु!' कहते ही फ़ोन कट गया।
मेरे भीतर कई दिनों से आशा और आशंका परस्पर लट्ठम-लट्ठा हो रही
हैं। दिन भर तो जापानी वर्क-कल्चर के अनुसार, कभी लैब में तो
कभी अपने कमरे में कंप्यूटर पर, काम में जुटा रहता हूँ। शाम तक
थक जाता हूँ।
...आगे-
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