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१. ६. २०२२

इस माह-

अनुभूति-में--गीतों-में-मनोज जैन मधुर,-अंजुमन-में-परमजीत-कौर रीत,-छंदमुक्त में मधु शुक्ला दिशांतर-में-शशि-पाधा-और-दोहों में सुरेश-कुमार-पांडा-की-रचनाएँ।

कलम गही नहिं हाथ-

तारों को देखते रहें छत पर पड़े हुए... वाले पुराने दिन तो अब नहीं रहे। देश छूटता है तो परिवेश भी बदल जाता है। बहुमंजिली इमारतों में ...आगे पढ़ें

घर-परिवार में

रसोईघर में- हमारी रसोई संपादक शुचि अग्रवाल प्रस्तुत कर रही हैं, हर मौसम में लाजवाब स्वाद वाली- थाईलैंड वाली लाल करी

बागबानी में- बारह पौधे जो साल-भर फूलते हैं इस शृंखला के अंतर्गत इस माह प्रस्तुत है- अपराजिता की देखभाल।

स्वाद और स्वास्थ्य में- स्वादिष्ट किंतु स्वास्थ्य के लिये हानिकारक भोजनों की शृंखला में इस माह प्रस्तुत है- मार्जरीन के विषय में

जानकारी और मनोरंजन में

गौरवशाली भारतीय- क्या आप जानते हैं कि जून महीने में कितने गौरवशाली भारतीय नागरिकों ने जन्म लिया? ...विस्तार से 

वे पुराने धारावाहिक- जिन्हें लोग आज तक नहीं भूले और अभी भी याद करते हैं इस शृंखला में जानें मालगुडी डेज के विषय में।

नवगीत से सम्बंधित संग्रहों और संकलनों से परिचय की शृंखला में इस माह प्रस्तुत है- गिरिजा कुलश्रेष्ठ का संग्रह - कुछ ठहर ले और मेरी जिंदगी

वर्ग पहेली-३५०
गोपालकृष्ण-भट्ट-आकुल और रश्मि आशीष के सहयोग से

हास परिहास
में पाठकों द्वारा भेजे गए चुटकुले

साहित्य-और-संस्कृति-में

गौरवगाथा में इस माह प्रस्तुत है
कमलेश्वर की कहानी- गर्मियों के दिन

चुंगी-दफ्तर खूब रँगा-चुँगा है। उसके फाटक पर इन्द्रधनुषी आकार के बोर्ड लगे हुए हैं। सैयदअली पेण्टर ने बड़े सधे हाथ से उन बोर्डों को बनाया है। देखते-देखते शहर में बहुत-सी दुकानें हो गई हैं, जिन पर साइनबोर्ड लटक गए हैं। साइनबोर्ड लगाना यानि औकात का बढ़ाना। बहुत दिन पहले जब दीनानाथ हलवाई की दुकान पर पहला साइनबोर्ड लगा था, तो वहाँ दूध पीनेवालों की संख्या एकाएक बढ़ गई थी। फिर बाढ़ आ गई, और नये-नये तरीके और बेलबूटे ईजाद किए गए। ‘ऊँ’ या ‘जयहिन्द’ से शुरू करके ‘एक बार अवश्य परीक्षा कीजिए’ या ‘मिलावट साबित करने वाले को सौ रुपए नकद इनाम’ की मनुहारों या ललकारों पर लिखावट समाप्त होने लगी। चुंगी-दफ्तर का नाम तीन भाषाओं में लिखा है। चेयरमैन साहब बड़े अक्किल के आदमी है।, उनकी सूझ-बूझ का डंका बजता है, इसलिए हर साइनबोर्ड हिन्दी, उर्दू और अंग्रेजी में लिखा जाता है। दूर-दूर के नेता लोग भाषण देने आते हैं, देश-विदेश के लोग आगरा का ताजमहल देखकर यहाँ से गुजरते है।
आगे-

 

अनूप कुमार शुक्ल का व्यंग्य
आदमी रिपेयर सेंटर
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सत्यवान सौरभ का आलेख-
पक्षी और पर्यावरण
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कला दीर्घा में- कवि और कलाकार
अमृतलाल वेगड़ से परिचय

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आज-सिरहाने-में-प्रेरणा-गुप्ता-के-लघुकथा-संग्रह-
सूरज डूबने से पहले पर नमिता सचान सुंदर
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पिछले अंकों से-

स्वामी अड़गकड़ानंद का प्रेरक प्रसंग
राजा भर्तृहरि और जलेबी
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प्रकृति-और-पर्यावरण-में-जानें
बढ़ती गर्मी और इसे रोकने के प्रयत्

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मृदुला गर्ग की कलम से
मंच पर तिलिस्म है बुनराकु

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डॉ. निशांत कुमार का दृष्टिकोण-
ये लाल रंग
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समकालीन कहानियों में इस माह प्रस्तुत है
भारत से तरुण भटनागर की कहानी- ढँकी हुई बातें

उस रोज जब बीजू आया, मैं पहले पहल उसे पहचान नहीं पाया। मैं उसके इस तरह आने के लिये तैयार नहीं था। ऐसा कोई कारण भी नहीं था कि वह दुबारा आता। वह भी पूरे बारह सालों के बाद एक दिन अचानक। पर ऐसा भी नहीं सोचा था कि वह इतना विस्मृत हो जाएगा कि वह मेरे सामने खड़ा हो और मैं कुछ क्षणों को उलझ जाऊं कि वह कौन है? उस दिन तेज गर्मी पड़ रही थी। वह शायद देर तक बाहर खड़ा रहा था। कॉलबेल खराब हो गई थी और कुंडी खड़खड़ाने की आवाज़ कूलर की आवाज़ में गुम हो गई थी।
"क्यों डाल दिया न चक्कर में ...।"

मैं उसे पहचानने के असमंजस में था। पर उसकी सहजता ने मुझे सतर्क कर दिया। मैं उसे पहचाने बिना मुस्कुरा दिया।
"क्यों भूल गए।"
"तुम, अरे ...।"
"मुझे बीजू कहते हैं।"
"अरे यार तुम भी ...।" आगे...

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