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कहानियाँ

वरिष्ठ कथाकारों की प्रसिद्ध कहानियों के इस स्तंभ में इस सप्ताह
प्रस्तुत है कमलेश्वर की कहानी- गर्मियों के दिन


चुंगी-दफ्तर खूब रँगा-चुँगा है। उसके फाटक पर इन्द्रधनुषी आकार के बोर्ड लगे हुए हैं। सैयदअली पेण्टर ने बड़े सधे हाथ से उन बोर्डों को बनाया है। देखते-देखते शहर में बहुत-सी दुकानें हो गई हैं, जिन पर साइनबोर्ड लटक गए हैं। साइनबोर्ड लगाना यानि औकात का बढ़ाना। बहुत दिन पहले जब दीनानाथ हलवाई की दुकान पर पहला साइनबोर्ड लगा था, तो वहाँ दूध पीनेवालों की संख्या एकाएक बढ़ गई थी। फिर बाढ़ आ गई, और नये-नये तरीके और बेलबूटे
ईजाद किए गए। ‘ऊँ’ या ‘जयहिन्द’ से शुरू करके ‘एक बार अवश्य परीक्षा कीजिये’ या ‘मिलावट साबित करने वाले को सौ रुपए नकद इनाम’ की मनुहारों या ललकारों पर लिखावट समाप्त होने लगी।

चुंगी-दफ्तर का नाम तीन भाषाओं में लिखा है। चेयरमैन साहब बड़े अक्किल के आदमी है।, उनकी सूझ-बूझ का डंका बजता है, इसलिये हर साइनबोर्ड हिन्दी, उर्दू और अंग्रेजी में लिखा जाता है। दूर-दूर के नेता लोग भाषण देने आते हैं, देश-विदेश के लोग आगरा का ताजमहल देखकर पूरब की ओर आते हुए यहाँ से गुजरते है।... उन पर असर पड़ता है भाई। और फिर मौसम की बात: मेले-तमाशे के दिनों में हलवाई, जुलाई-अगस्त में किताब-कागजवालों, सहालग में कपड़ेवालों और खराब मौसम में वैद्य-हकीमों के साइनबोर्डों पर नया रोगन चढ़ता हैं शुद्ध देशी घी वाले सबसे अच्छे, जो छप्परा के भीतर दीवार पर गेरू या हिरमिजी से लिखकर काम चला देते हैं। इसके बगैर काम नहीं चलता। अहमियत बताते हुए वैद्य जी ने कहा, ”बगैर पोस्टर चिपकाए सिनेमावालों का भी काम नहीं चलता। बड़े-बड़े शहरों में जाइए, मिट्टी का तेल बेचनेवाले की दुकान पर साइनबोट मिल जाएगा। बड़ी जरूरी चीज है। बाल-बच्चों के नाम पर साइनबोट हैं, नहीं तो नाम रखने की जरूरत क्या है? साइनबोट लगाके सुखदेव बाबू कम्पौण्डर से डॉक्टर हो गए, बैग लेके चलने लगे।“

पास बैठे रामचरन ने एक और नये चमत्कार की खबर दी, ”कल उन्होंने बुधईवाला इक्का-घोड़ा खरीद लिया...“
”हाँकेगा कौन?“ टीन की कुर्सी पर प्राणायाम की मुद्रा में बैठे पंडित ने पूछा।
”ये सब जेब कतरने का तरीका है,“ वैद्यजी का ध्यान इक्के की तरफ अधिक था, ”मरीज से किराया वसूल करेंगे। सईस को बख्शीश दिलाएँगे, बड़े शहरों के डॉक्टरों की तरह। इसी से पेशे की बदनामी होती है। पूछो, मरीज का इलाज करना है कि रोब-दाब दिखाना है। अंग्रेजी आले लगाकर मरीज की आधी जान पहले सुखा डालते हैं। आयुर्वेदी नब्ज देखना तो दूर, चेहरा देखके रोग बता दे। इक्का-घोड़ा इसमें क्या करेगा? थोड़े दिन बाद देखना, उनका सईस कम्पौण्डर हो जाएगा...“ कहते-कहते वैद्यजी बड़ी घिसी हुई हँसी में हँस पड़े। फिर बोले, ”कौन क्या कहे भाई! डॉक्टरी तो तमाशा बन गई है। वकील-मुख्तार के लड़के डॉक्टर होने लगे! खून और संस्कार से बात बनती है... हाथ में जस आता है। वैद्य का लड़का वैद्य होता है। आधी विद्या लड़कपन में जड़ी-बूटियाँ कूटते-पीसते आ जाती है। तोला, माशा, रत्ती का ऐसा अंदाज हो जाता है कि औषधि अशुद्ध हो ही नहीं सकती, औषधि का चमत्कार उसके बनाने की विधि में है...धन्वन्तरि...“ वैद्यजी आगे कहने जा ही रहे थे कि एक आदमी को दुकान की ओर आते देख चुप हो गए और बैठे हुए लोगों की ओर कुछ इस तरह देखने-सुनने लगे कि वे गप्प लड़ानेवाले फालतू आदमी न होकर उनके रोगी हों।

आदमी के दुकान पर चढ़ते ही वैद्यजी ने भाँप लिया! कुंठित होकर उन्होंने उसे देखा और उदासीन हो गए। लेकिन दुनिया-दिखवा भी कुछ होता है! हो सकता है, कल यही आदमी बीमार पड़ जाए या इसके घर में किसी को रोग घेर ले! इसलिये अपना व्यवहार और पेशे की गरिमा चौकस रहनी चाहिए! अपने को बटोरते हुए उन्होंने कहा, ”कहो भाई, राजी-खुशी!“ उस आदमी ने जवाब देते हुए सीरे की एक कनस्टरिया सामने कर दी, ”यह ठाकुर साहब ने रखवाई है। मंडी से लौटते हुए लेते जाएँगे। एक-डेढ़ बजे के करीब।“

”उस वक्त दुकान बन्द रहेगी,“ वैद्यजी ने व्यर्थ के काम से ऊबते हुए कहा, ”हकीमों-वैद्यों की दुकानें दिन-भर नहीं खुली रहतीं। व्यापारी थोड़े ही हैं भाई!“ पर फिर किसी अन्य दिन और अवसर की आशा ने जैसे जबरदस्ती कहलवाया, ”खैर,“ उन्हें दिक्कत नहीं होगी, हम नहीं होंगे तो बगलवाली दुकान से उठा लें।
मैं रखता जाऊँगा।“
आदमी के जाते ही वैद्यजी बोले, ”शराब-बन्दी से क्या होता है? जब से हुई तब से कच्ची शराब की भट्ठियाँ घर-घर चालू हो गईं। सीरा घी के भाव बिकने लगा। और इन डॉक्टरों को क्या कहिए...इनकी दुकानें हौली बन गई है। लैसन्स मिलता है दवा की तरह इस्तेमाल करने का, पर खुलेआम जिंजर बिकता है। कहीं कुछ नहीं होता। हम भंग-अफीम की एक पुड़िया चाहें तो तफसील देनी
पड़ती है।“
”जिम्मेदारी की बात है,“ पंडितजी ने कहा।
”अब जिम्मेदार वैद्य ही रह गए हैं। सबकी रजिस्टरी हो चुकी, भाई! ऐरे-गैरे पचकल्यानी जितने घुस आए थे, उनकी सफाई हो गई। अब जिनके पास रजिस्टरी होगी वह वैद्यक कर सकता है। चूरनवाले वैद्य बन बैठे थे... सब खतम हो गए। लखनऊ में सरकारी जांच-पड़ताल के बाद सही मिली है...“ वैद्यजी की बात में रस न लेते हुए पंडित उठ गए। वैद्यजी ने भीतर की तरफ कदम बढ़ाए और औषधालय का बोर्ड लिखते हुए चन्दर से बोले, ”सफेदा गाढ़ा है बाबू, तारपीन मिला लो।“ और वे एक बोतल उठा लाए, जिस पर अशोकारिष्ट का लेबल था।

इसी तरह न जाने किन-किन औषधियों की शरीर-रूपी बोतलों में किस-किस पदार्थ की आत्मा भरी है। सामने की अकेली अलमारी में बड़ी-बड़ी बोतलें रखी हैं जिन पर तरह-तरह के अरिष्टों और आसवों के नाम चिपके हैं। सिर्फ पहली कतार में वे शीशियाँ खड़ी हैं.... उनके पीछे जरूरत का और सामान है। सामने की मेज पर सफेद शीशियों की एक पंक्ति है, जिसमें कुछ स्वादिष्ट चूरन...लवणभास्कर आदि हैं, बाकी में जो कुछ भरा है उसे केवल वैद्यजी जानते हैं।

तारपीन का तेल मिलाकर चन्दर आगे लिखने लगा - ‘प्रो.कविराज नित्यानन्द तिवारी’ ऊपर की पंक्ति ‘श्री धन्वन्तरि औषधालय’ स्वयं वैद्यजी लिख चुके थे। सफेदे के वे अच्छर ऐसे लग रहे थे जैसे रुई के फाहे चिपका दिए हों। ऊपर जगह खाली देखकर वैद्यजी बोले, ”बाबू ऊपर जयहिन्द लिख देना... और यह जो जगह बच रही है, इसमें एक ओर द्राक्षासव की बोतल, दूसरी ओर खरल की तसवीर... आर्ट हमारे पास मिडिल तक था लेकिन यह तो हाथ सधने की बात है।“
चन्दर कुछ ऊब सा रहा था। खामख्वाह पकड़ा गया। लिखावट अच्छी होने का यह पुरस्कार उसकी समझ में नहीं आ रहा था। बोला,
”किसी पेण्टर से बनवाते...अच्छा-खासा लिख देता, वो बात नहीं आएगी...“ अपना पसीना पोंछते हुए उसने कूची नीचे रख दी।
”पाँच रुपये माँगता था बाबू... दो लाइनों के पाँच रुपये! अब अपनी मेहनत के साथ यह साइनबोट दस-बारह आने का पड़ा, ये रंग एक मरीज दे गया। बिजली कम्पनी का पेण्टर बदहजमी से परेशान था। दो खुराकें बनाकर दे दीं, पैसे नहीं लिये। सो वह दो-तीन रंग और थोड़ी-सी वार्निश दे गया। दो बक्से रंग गए... यह बोट बन गया और एकाध कुर्सी रंग जाएगी...तुम बस इतना लिख दो, लाल रंग का शेड हम देते रहेंगे... हाशिया तिरंगा खिलेगा?“ वैद्यजी ने पूछा और स्वयं स्वीकृति भी दे दी।

चन्दर गर्मी से परेशान था। जैसे-जैसे दोपहरी नजदीक आती जा रही थी, सड़क पर धूल और लू का जोर बढ़ता जा रहा था, मुलाहिजे में चन्दर मना नहीं कर पाया। पंखे से अपनी पीठ खुजलाते हुए वैद्यजी ने उजरत के कामवाले पटवारियों के बड़े-बड़े रजिस्टर निकालकर फैलाने शुरू किए। सूरज की तपिश से बचने के लिये दुकान का एक किवाड़ भेड़कर वैद्यजी खाली रजिस्टरों पर खसरा-खतौनियों से नकल करने लगे। चन्दर ने अपना पिंड छुड़ाने के लिये पूछा, ”ये सब क्या है वैद्यजी?“

वैद्यजी का चेहरा उतर गया, बोले, ”खाली बैठने से अच्छा है कुछ काम किया जाए, नये लेखपालों को काम-धाम आता नहीं, रोज कानूनगो या नायब साहब से झाड़ें पड़ती हैं...झक मार के उन लोगों को यह काम उजरत पर कराना पड़ता है। अब पुराने घाघ पटवारी कहाँ रहे जिनके पेट में गँवई कानून बसता था। रोटियाँ छिन गई बेचारों की, लेकिन सही पूछो तो अब भी सारा काम पुराने पटवारी ही ढो रहे हैं। नये लेखपालों की तनख्वाह का सारा रुपया इसी उजरत में निकल जाता है। पेट उनका भी है... तिया-पाँचा करके किसानों से निकाल लाते हैं। लाएँ न तो खाएँ क्या? दो-तीन लेखपाल अपने हैं, उन्हीं से कभी-कभार हलका-भारी काम मिल जाता है। नकल का काम, रजिस्टर भरने हैं!“

बाहर सड़क वीरान होती जा रही थी। दफ्तर के बाबू लोग जा चुके थे। सामने चुंगी में खस की टट्टियों पर छिड़काव शुरू हो गया। दूर हर-हराते पीपल का शोर लू के साथ आ रहा था। तभी एक आदमी ने किवाड़ से भीतर झांका।
वैद्यजी की बात, शायद जो क्षण-दो-क्षण बाद दर्द से बोझिल हो जाती, होती गई। उनकी निगाह ने आदमी पहचाना और वे सतर्क हो गए। फौरन बोले, ”एक बोट आगरा से बनवाया है, जब तक नहीं आता, इसी से काम चलेगा, फुर्सत कहाँ मिलती है, जो इस सबमें सर खपाएँ...“ और एकदम व्यस्त होते हुए उन्होंने उस आदमी से प्रश्न किया, ”कहो भई, क्या बात है?“
”डाकदरी सरटीफिकेट चाहिए... कोसमा टेशन पर खलासी हैंगे साब।“
रेलवे की नीली वर्दी पहने वह खलासी बोला।
उसकी जरूरत का पूरा अन्दाज करते हुए वैद्यजी बोले, ”हाँ, किस तारीख से कब तक का चाहिए?“
”पन्द्रह दिन पहले आए थे साब, सात दिन को और चाहिए।“
कुछ हिसाब जोड़कर वैद्यजी बोले, ”देखो भाई सर्टीफिकेट पक्का करके देंगे, सरकार का रजिस्टर नम्बर देंगे, रुपैया चार लगेंगे।“ वैद्यजी ने जैसे खुद चार रुपये पर उसके भड़क जाने का अहसास करते हुए कहा, ”अगर पिछला न लो तो दो रुपये में काम चल जाएगा...“

खलासी निराश हो गया। लेकिन उसकी निराशा से अधिक गहन हताशा वैद्यजी के पसीने से नम मुख पर व्याप गई। बड़े निरपेक्ष भाव से खलासी बोला, ”सोबरन सिंह ने आपके पास भेजा था।“ उसके कहने से कुछ ऐसा लगा जैसे यह उसका काम न होकर सोबरन सिंह का काम हो। पर वैद्यजी के हाथ नब्ज आ गई, बोले, ”वो हम पहले ही समझ गये थे। बगैर जान-पहचान के हम देते भी नहीं, इज्जत का सवाल है। हमें क्या मालूम तुम कहाँ रहे, क्या करते हो? अब सोचने की बात है... विश्वास पर जोखिम उठा लेंगे.... पन्द्रह दिन पहले से तुम्हारा नाम रजिस्टर में चढ़ाएँगे, रोग लिखेंगे... हर तारीख पर नाम चढ़ाएँगे, तब कहीं काम बनेगा! ऐसे घर की खेती नहीं है...“ कहते-कहते उन्होंने चन्दर की ओर मदद के लिये ताका। चन्दर ने साथ दिया, ”अब इन्हें क्या पता कि तुम बीमार रहे कि डाका डालते रहे...सरकारी मामला है...“

बगलवाले दूकानदार बच्चनलाल ने दुकान बन्द करके, घर जाते हुए वैद्य जी की दुकान खुली देखकर पूछा, ”आज खाना खाने नहीं गए...“
”हाँ, ऐसे ही एक जरूरी काम है। अभी थोड़ी देर में चले जाएँगे।“ वैद्यजी ने कहा और जमीन पर चटाई बिछाई, कागज रजिस्टर मेज से उठाकर नीचे फैला लिया। लेकिन गर्मी तो गर्मी पसीना थमता ही न था। रह-रहकर पंखा झेलते, फिर नकल करने लगते। कुछ देर मन मारकर काम किया, पर हिम्मत छूट गई। उठकर पुरानी धूल पड़ी शीशियाँ झाड़ने लगे। उन्हें लाइन से लगाया। लेकिन गर्मी की दोपहर...समय स्थिर लगता था। एक बार उन्होंने किवाड़ों के बीच से मुँह निकालकर सड़क की ओर निहारा। एकाध लोग नजर आये। उन आते-जाते लोगों की उपस्थिति से बड़ा सहारा मिल गया। भीतर आए, बोर्ड का तार सीधा किया और उसे दुकान के सामने लटका दिया। धन्वन्तरि औषधालय का बोर्ड दुकान की गर्दन में तावीज की तरह लटक गया। कुछ समय और बीता। आखिर उन्होंने हिम्मत की। एक लोटा पानी पिया और जाँघों तक धोती सरकाकर मुस्तैदी से काम में जुट गए। बाहर कुछ आहट हुई। चिन्ता से उन्होंने देखा।

”आज आराम करने नहीं गए वैद्यजी“ घर जाते हुए जान-पहचान के दुकानदार ने पूछा। ”बस जाने की सोच रहा हूँ... कुछ काम पसर गया था, सोचा, करता चलूँ...“ कहकर वैद्यजी दीवार से पीठ टिकाकर बैठ गए। कुरता उतारकर एक ओर रख दिया। इकहरी छत की दुकान आँच-सी तप रही थी। वैद्यजी की आँखें बुरी तरह नींद से बोझिल हो रही थीं। एक झपकी आ गई...कुछ
समय जरूर बीत गया था। नहीं रहा गया तो रजिस्टरों का तकिया बनाकर उन्होंने पीठ सीधी की। पर नींद...आती और चली जाती, न जाने क्या हो गया था!
सहसा एक आहट ने उन्हें चौंका दिया। आंखे खोलते हुए वे उठकर बैठ गए।
बच्चनलाल दोपहर बिताकर वापस आ गया था।
”अरे, आज आप अभी तक गए ही नहीं...“ उसने कहा।
वैद्यजी जोर-जोर से पंखा झलने लगे। बच्चनलाल ने दुकान से उतरते हुए पूछा, ”किसी का इन्तजार है क्या?“
हाँ, एक मरीज आने को कह गया है... अभी तक आया नहीं। वैद्यजी ने बच्चनलाल को जाते देखा तो बात बीच में तोड़कर चुप हो गए और अपना पसीना पोंछने लगे।

१ जुलाई २०१९

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