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समकालीन कहानियों में
इस माह
प्रस्तुत है-
गुलज़ार की
कहानी
धुआँ

बात
सुलगी तो बहुत धीरे से थी, लेकिन देखते ही देखते पूरे कस्बे
में 'धुआँ' भर गया। चौधरी की मौत सुबह चार बजे हुई थी। सात बजे
तक चौधराइन ने रो-धो कर होश सम्भाले और सबसे पहले मुल्ला
खैरूद्दीन को बुलाया और नौकर को सख़्त ताकीद की कि कोई ज़िक्र
न करे। नौकर जब मुल्ला को आँगन में छोड़ कर चला गया तो चौधराइन
मुल्ला को ऊपर ख़्वाबगाह में ले गई, जहाँ चौधरी की लाश बिस्तर
से उतार कर ज़मीन पर बिछा दी गई थी। दो सफेद चादरों के बीच
लेटा एक ज़रदी माइल सफ़ेद चेहरा, सफेद भौंवें, दाढ़ी और लम्बे
सफेद बाल। चौधरी का चेहरा बड़ा नूरानी लग रहा था।
मुल्ला ने देखते ही 'एन्नल्लाहे
व इना अलेहे राजेउन' पढ़ा, कुछ रसमी से जुमले कहे। अभी ठीक से
बैठा भी ना था कि चौधराइन अलमारी से वसीयतनामा निकाल लाई,
मुल्ला को दिखाया और पढ़ाया भी। चौधरी की आख़िरी खुवाहिश थी कि
उन्हें दफ़न के बजाय चिता पर रख के जलाया जाय
...आगे-
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