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लघु-कथा

लघुकथाओं के क्रम में इस माह प्रस्तुत है
भारत से
्रेरणा गुप्ता की लघुकथा- मेरे देश का तिरंगा


ग्यारह वर्ष का विराट बहुत उत्साहित था, उसके स्कूल में आज चित्रकला-प्रतियोगिता जो थी। पापा ने उसे पेंसिल-रबर, रंग-ब्रश सब कुछ तो नया लाकर दिया था।

क्लास में पहुँचते ही टीचर ने जब उसे आर्ट-शीट दी। मिलते ही वह उस पर दिए गये विषय गणतंत्र-दिवस पर अपनी पेंसिल से आकृतियाँ उभारने लगा। उसे अपने आस-पास का जरा भी होश नहीं था। वह अपनी कल्पना को साकार करने में लगा हुआ था। उसके चेहरे पर आत्मविश्वास से भरपूर एक अनोखा जज़्बा झलक रहा था। उसके हाथ का ब्रश रंगों में सराबोर हो उसके इशारों पर कागज पर लहरा रहा था।

अब आर्ट शीट पर एक तिरंगा झंडा, अपने देश भारत को सलामी देता हुआ धरती माँ पर फूलों की वर्षा करता दिखाई पड़ रहा था। विराट की मासूम आँखों में भी श्रद्धा और विश्वास के दीपक जल उठे थे।

अचानक उसके तिरंगें झंडे पर उसकी बगल वाले बच्चे ने पानी डाल दिया। बस फिर क्या था, दूसरे ही क्षण हमेशा शान्त रहने वाला विराट उस बच्चे पर चढ़ा हुआ नजर आया। देखते ही क्लास-टीचर ने उन्हें तुरन्त एक-दूसरे से अलग तो कर किया, किन्तु विराट रोते हुए अब बस यही कहता जा रहा था, “तुम क्या जानो, मेरे पापा बताते हैं, मेरे दादाजी के पिता जी जब देश की स्वतंत्रता के लिए जेल गये थे, तब घर में खाने को भी नहीं था और उनकी माँ उनकी उँगली पकड़कर जगह-जगह भटकती थीं कि वह किस जेल में हैं। उन्होंने अपने खून से सींचकर मेरे देश को आजाद कराया था। मैं तुम्हें कभी माफ़ नहीं करूँगा। ये मेरे देश का तिरंगा था... मेरे देश का तिरंगा था...।”

१ जनवरी २०२५

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