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कहानियाँ

समकालीन हिंदी कहानियों के स्तंभ में इस सप्ताह प्रस्तुत है यू.के. से
गौतम सचदेव की कहानी— 'जीरेवाला गुड़'


हैरिस ने बताया था कि वे ज़रा पुराने ख़याल के हैं। उसकी इच्छा थी कि जब वे आएँ, तो मैं उनके पैर छूकर प्रणाम करूँ। मैं सोच रही थी कि हवाई अड्डे पर हैरिस ने तो यह काम बखूबी कर लिया होगा, लेकिन मैं कैसे करूँगी। जब वे आए, तो मैं उनके पैरों की ओर हाथ बढ़ाकर झुक गई, लेकिन एक तो मुझे पैर छूना नहीं आता और दूसरे प्रसव के बाद अभी मेरे टाँकें नहीं खुले थे, इसलिए मुझे पूरा झुकने में कष्ट हुआ। उन्होंने पंजाबी में जाने क्या कहा, जिसका हैरिस ने अनुवाद करके बताया कि वे तुम्हें सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद दे रहे हैं। मैं 'थैंक यू' कहकर कृतज्ञता से मुस्कुराने लगी।

शायद उन्हें अहसास हुआ कि मैं पंजाबी नहीं समझती, इसलिए डैडी ने पंजाबीनुमा लहजे में दुबारा आशीर्वाद दिया, 'गौड ब्लेस यू।' उन्हें सोफे पर बैठने के लिए कहकर आँखें नीची किए हुए मैं भी उनके सामने बैठ गई। हैरिस मेरे साथ बैठ गया। ज्योंही मैंने नज़र उठाई, तो पाया कि वे मुझे देख रहे थे। वे मुझसे पहली बार मिल रही थे। मैं भी उनसे पहली बार मिल रही थी। मैं उनके चेहरों से यह देखने की कोशिश कर रही थी कि क्या हैरिस अपनी माँ से मिलता है या बाप से, लेकिन वे मेरे अंग-अंग को तौल रहे थे। मेरे नाक-नक्शे, क़द, रंग, बोलने के ढंग, यहाँ तक कि मेरे चलकर आने और बैठने के तरीके को वे आँखों से ऐसे काट-काटकर देख रहे थे, जैसे प्रयोगशाला में मेंढक को काटकर देखा जाता है।

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