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पढ़ाई का पूरा हो जाना अगर मात्र प्रक्रिया ही है, तो इस प्रक्रिया को पूरा हुए ज़्यादा समय नहीं हुआ। इसी अगस्त में रिज़ल्ट निकले हैं। बेरोज़गारी मे सालों गुज़र जाना कोई बड़ी बात नहीं आजकल, फिर महीने का क्या ? लेकिन महीने भर की घुटन ही पल्लव का दम घोंटे दे रही है। खामोशी है कि ओठों पर कुंडली मारकर बैठ गयी है। यही खामोशी घुटन बन जाती है, जब बाबूजी इर्द-गिर्द होते है।

कोई कहे कि पिता का इर्द—गिर्द होना बुरा होता है क्या ? नहीं—बिल्कुल नहीं --- बाबू जी का इर्द-गिर्द होना बुरी कैसे हो सकता है ? वह अलग बात है कि चंपत की चौपाल पर, बीसों छोटे -बड़ों के बीच भी बाबूजी यह कहने से नहीं चूकते कि --" देखो चौस्साब (चौधरी साहब) ! कैसा सिगरेट छाप बना फिर रहा है लौंडा ?"
पल्लव की ही बात कर रहे होते हैं बाबू जी।
सिगरेट छाप माने छोटी मोहरी की पेंट। छोटी मोहरी की पेंट --बाबू जी के लिहाज़ से परम परस्ती, सबसे आधुनिक।
बाबू जी की सीधी ज़ुबान में हाथ से निकली औलाद।
पल्लव को कोफ़्त हो जाती है।
या फिर –क्या क्या भूले पल्लव ?
या फिर --पेंट की पिछली जेब से निकली कंघे की ठुड्डी देखकर उनका कहना—
"हमारे दिलीप कुमार को तो देखो, सिंगार -पट्टी का सामान चूतड़ों मे दबाए फिरता है।"
उफ़्फ़्फ़--पल्लव पर मानसिक दबाव बढ़ने लगता है।

उबलते छींटे मारना बाबू जी का स्वभाव है। कुछ ना कुछ कहेंगे ज़रूर।
पीढ़ियों की दूरियाँ ?
ठीक है लेकिन भरी भीड़ में -- लोगों के बीच -- इस तरह ?
बहुत बड़ा मसला तो नहीं है। दूरी हो तो भी कहने सुनने मे सहजता लाई जा सकती है।
पेंट की मोहरी को भी पल्लव इंच भर बढ़ा ही सकता है।

लेकिन नतीजा शून्य। उनका टोकना और टहोके मारना कभी कभी कम भी नहीं हो पाया, छूटना तो दूर का मसला है।
नतीज़ा यह कि पल्लव बाबूजी के साथ लुका छिपी मे लग गया।
जहाँ तक हो सके, उनके सामने ना जाय।
ना कोई डर है ना चोर है मन मे, तो भी इसी लुका-छिपी के तंग दायरे मे बँध कर रह गया है पल्लव।
अपनों के बीच संवादहीनता के पलों से भारी शायद कोई भार नहीं।

इतना ही दारा है पल्लव का।-----------

असल मे, बाबू जी ठसकेबाज़ आदमी हैं,मस्तमौला। कल कैसा होता है, जाना नहीं। कल क्या होना है, सोचा नहीं।
इतनी खूबियाँ कहाँ मिलती हैं आदमी में ?
सफ़ेद झक्क, चुन्नटदार बाहों वाला कड़क कलफ़ लगा कुर्ता और चूड़ीदार पायज़ामा। सलीमशाही जूतियाँ। बढ़िया मालिश के बाद संवरे हुए सर के चिकने चुपड़े बाल।
ऊपर से छः फ़ीट का भारी भरकम शरीर- भारी आवाज़।
चंपत की चौपाल पर बोलते तो पौन मील दूर अतरु का अहाता जान जाता कि बाबू जी यानि ठसका बाबू बोल रहे हैं। पता नहीं, उम्र के किस दौर मे बाबू जी ठसका बाबू बने। लेकिन पल्लव की उन्नीस साल की उम्र मे से क़तई ना-समझी के पहले चार साल निकाल भी दिये जाँय, तो पिछले पंद्रह साल से वो बाबू जी को ठसका बाबू के नाम से ही पहचानता आया है।
शायद उनका यह नाम जीने के उनके ठसकेदार स्टाइल से पड़ गया है।

अभी अभी, बाहर से बाबू जी के मठारने की आवाज़ ने माँ की खामोशी ढ़ाई घर बढ़ा दी। माँ ओठों पर तो पट्टी बाँध भी लेती, किंतु कानों मे रूई कैसे दे ?
बाहर से आवाज़ आ रही थी -
"देख तो सही-अमरो की लौंडिया कैसी हवा बनी फिर रही है। समझा दे कि सिर पर दुपट्टा रख कर चला करे, नहीं तो खोपड़ी मे कील ठुकवानी पड़ जाएगी किसी दिन।"
माँ निर्विकार देखती सुनती रहती है,खामोश इमारत सी।
पर खामोश इमारतों के अहसास कौन महसूस करता फिरता है?

वैसे ऐसा नहीं है कि बाबूजी घर की इस खामोशी से परिचित न हों। पर उस खामोशी को महसूस भी किया जाय, ज़रूरी है क्या ? कोई खास बात नहीं है। वैसे भी कोई उनके सामने ज़रा भी बोले, जवाब दूर की बात है -- --उन्हे पसंद नहीं।
उनके कारण दूसरे को क्या कष्ट है, इसकी परवाह करने का वक़्त ठसका बाबु के पास है कहाँ ?
वैसे परवाह करने के लिये समय की उतनी ज़रूरत नहीं, जितनी अनुभूति की है, एहसास की की है।
क्या ऊलजलूल सोचने लगता है पल्लव। अलग थलग सा हो गया है तो क्या करें बाबु जी ? शराब का ख़ुमार शाम को उन्हे कुछ सोचने का मौक़ा नहीं देता और फ़ालतु भावनात्मक बातों मे वो सुबह ख़राब नहीं करना चाहते। बिसात बिछाने की जल्दी मे वक़्त वैसे ही नहीं होता।

खामोशी भरे माहौल मे खाना खाने के बाद थाली सरका कर कब सो जाते बाबु जी, पता ही नहीं चलता।
बाबू जी का दायरा--यों तो हदों से बाहर है लेकिन है तो दायरा ही।

दरवाज़ा खुलने की आवाज़ होती है। ठसका बाबू के सोने के बाद ही तो आता है वो घर में।
माँ समझ लेती है कि पल्लव होगा। उनकी आँखों मे नमी डोलने लगती है, माथे का तनाव घुलने लगता है। पल्लव को खिलाकर ख़ुद भी खाती है और सोने की तैय्यारी में लग जाती है।

शब्द नहीं है, माध्यम नहीं है लेकिन क्या इच्छा भी नहीं है। पता नहीं, कैसे और क्यूं हो जाता है ऐसा ? छोटे छोटे मसले बड़े बड़े दायरों मे कैसे तब्दील हो जाते हैं ? कि
दायरों की परिधियाँ तक हाथ भी नहीं पहुँचते और अहसास भी।
इतने बड़े ख़लों को पार करते हुए सहज ज़िंदगियाँ हिचकोले तो खाएँगी ही।
एक दूसरे को सुनने समझने के लिए एक दूसरे को महसूस करना ज़्यादा ज़रूरी है।
ये कैसे डायरे हैं –अपने अपने ?दो क़दम भी एक दूसरे की तरफ़ नहीं बढ़ाए जा सकते क्या ?।

दिन भर की थकन और अनचाही खामोशी को ढ़ासना दे देती है रात।
रात में आए सपनों के दायरे तो होते ही कहाँ हैं ? सपने तो ज़िंदगी का हिस्सा होते ही कहाँ हैं ?
पता नहीं ज़िंदगी के ही अपने अपने दायरे क्यों बन गये हैं ?

सुबह फिर अलसाई सी उठेगी।
पीपल फिर अंगड़ाई लेगा।
फिर गली-कूंचे कुलबुलाएँगे।
सूरज का नरम गुलाबी गोला फिर बरसाती की मुंडेर पर लटक जाएगा और--
और गुरजी घोसी फिर गुहार लगाएगा--

"दो
SSSSSध "

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७ फरवरी २०११

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