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मैंने स्वर्णपंखी साड़ी का पल्लू सँवार कलाइयों के कंकण पीछे किए और बौड़म-सी खड़ी हुई को टहोका दिया कि ऐसी खड़ी-खड़ी वह कैसे काम निपटाएगी? ऐं? इधर पूजा की चौकी के पास पोंछा लगा।
वह चौंककर झटपट काम में जुट गई और पूजा वाला सुवासित कोना बड़े यत्न से रगड़-रगड़कर पोंछने लगती है। कभी मुझे, कभी मेरे पूजा-स्थल को देखती हुई उसकी आँखों में अपार श्रद्धाभाव है- मेरे ईश्वर के प्रति नहीं, मेरे प्रति और मेरे पूजा-स्थल के प्रति।

ठीक उसी समय में भी मन पूजा की चौकी की ओर देखकर देवी लक्ष्मी का आभार प्रकट करती हूँ, जो ऐन दीपावली के दो दिन पहले, नई-नई पास के गाँव से कमाने-खाने आई यह औरत मेरे सुपुर्द कर दी, नहीं तो रंग-रंगोली मंडित पूरा त्योहार अक्षत, कुमकुम झाड़-पोंछ के बीच संतुलन बिठाने में ही बीत जाता। न काजू कतली और मलाई-पाक बन पाता, न चूडी-कंकण और स्वर्णपंखी साड़ी से लैस यह पूजा हो पाती। अब सुगंधा बाई मिल गई है न, तो ज़रा चैन से अर्चन-अभिनंदन हो पाएगा, सुख-सौभाग्य श्री की देवी लक्ष्मी का।

दरवाज़े की बेल बजी। वह झटपट मुस्तैदी से दौड़ी। उसे यह काम बड़ा मन भाया है। हर थोड़ी देर पर दरवाज़े की घंटी बजती है। कोई एक आदमी बड़ा-सा रंगीन पैकेट लिए खड़ा होता है। संकेत पाते ही मैं दरवाज़े तक आती हूँ।
''कौन? तनेजा साहब? दीपावली मुबारक आपको भी- अरे इसकी क्या ज़रूरत थी? पर वाकई है बेहद खूबसूरत। कहाँ से मँगवाया? कटक से? हाँ, चाँदी की नक्काशी तो वहीं की अच्छी लगती है अच्छा थैंक्स!''
''अरे खुल्लर भाई'' यों बाहर खड़े दीपावली की मुबारक कैसी? दो मिनट बैठिए तो- देखिए, इस फॉर्मेलिटी की क्या ज़रूरत थी- मिठाइयाँ तो काफी थीं- रिंग, विंग नहीं चलेगी- आप तो ज़िद करते हैं। अच्छा जी थैंक्यू वेरी मच।''
''कहाँ से आए हैं?''
''ए.के. एंटरप्राइज़ेस से?''
''ओ.के, थैंक्यू।''
''हैपी दीपावली टु यू अलसो...।''
''जी? साहब? साहब नहीं हैं दीपावली का गिफ्ट? थैंक्यू, नमस्ते।''

एक पाँव से दौड़ रही हूँ मैं सुबह से, पर थकान का नामो-निशान नहीं। उसकी आँखों में अपार प्रशंसा भाव है मेरे लिए। मैं कितना अच्छा बोलती हूँ, कितनी बार अंदर से दरवाज़े तक आती हूँ और रंगीन चमचमाते पैकेट लेकर अंदर जाती हूँ। वह झाड़-पोंछ करते-करते ही, बीच में जब मौका मिलता है, उन रंगीन पैकेटों पर हाथ फेरकर अपार आनंद का अनुभव कर लेती है, और वापस अक्षत, कुमकुम के थाल सजाने लगती है। उसका उत्साह देखकर दया आ गई। सो चार-पाँच बार मैंने उसे ही पैकेट्स अलमारी में रखने के लिए कह दिया। बस, वह निहाल हो गई। पैकेट्स खूब सहेजकर रखती-रखती मुझसे बड़े गदगद भाव से पूछ बैठी-
''ये लोग पूजा का समान लाता न?''

गूढ़ रहस्य में भरकर मैं शरारत से मुस्करा पड़ी हूँ। लेकिन तभी मैं जैसे अपनी ही मुस्कुराहट से भयभीत हो उठी हूँ। मुझमें एक अनजाना भय-सा समा जाता है। मैं बार-बार इस भय से आतंकित, ईश्वर से मन-ही-मन प्रार्थना करने लगी हूँ कि मुझे किसी भी तरह के दुर्भाग्य से बचाना, सब कुछ हमेशा ऐसा ही भरा-पूरा रखना। इस सरकारी नौकरी को कभी आँच न आए, जिसकी बदौलत दीपावली के दिन एक पूरा बड़ा लॉकर और एक अलमारी खाली करनी पड़ती है। उपहारों के पैकेट्स ठूँस-ठूँसकर भरने के लिए। आह देवी... सुख, सौभाग्य, ऐश्वर्य और समृद्धि की देवी हम पर सदैव ऐसी ही कृपादृष्टि करना।

रोम-रोम भक्ति भाव से भर जाता है। तब भी संतोष नहीं होता तो अचानक ही कह पड़ती हूँ-
''सुगंधा! यह तेल नहीं, जाकर देशी घी लाकर डाल दीयों में...'' और बड़ी एकाग्रता से सुगंधा से रूई लेकर एक-दो बत्तियाँ खुद पूरने लगती हूँ। देशी घी से लबालब दीये और भक्ति भाव से लबालब ह्रदय मुझे सुगंधा के प्रति अतिरिक्त दया भाव से भर देते हैं।

सो अतिरिक्त कृपा भाव से पूछा-
''तू पूजा करती है दीपावली पर?''
''न!''
''अरे, फिर क्या करती है?''
''मैं सब बाई लोगों का झाडू-पोंछा करती।''

अजीब ऊटपटांग-सा उत्तर था। प्रश्न से कोई तालमेल ही नहीं। मैं अंदर तक चिड़चिड़ा उठी। भक्ति-दर्शन पर बात करने का सारा मज़ा ही बदमज़ा हो गया। लेकिन तभी ध्यान आया- नहीं मेरा इस तरह सोचना अनुचित है। इस मूढ़, अविवेकी में इतना ज्ञान, विवेक होता था तो यह झाडू-फटका करती अपनी ज़िंदगी गुज़ारती होती? ''अरे झाडू-पोंछा तो रोज़ ही करती है- उसकी कोई बात नहीं, पर दीपावली भी तो मनाती होगी, मनाती है कि नहीं?'' उसने कुछ सोचा और सहमे भाव से हाँ में सिर हिलाया।

''अच्छा तो कैसे मनाती है दीपावली?''
''मेरा छोटा लड़का है न, वह एक पैकेट फुलझड़ी और दो अनार लाता''
फिर जैसे सूत्र उसकी पकड़ में आ गया हो, इस तरह खुश होकर बोली-
''उसके साथ मई भी अनार छोड़ती- वो छोटा हइ न!''
''हाँ, लेकिन पूजा? पूजा भी करनी चाहिए भगवान की अच्छा, दीपावली को किसकी पूजा की जाती है, तुझे मालूम है?''
वह पहले अचकचाई, फिर थोड़े आत्मविश्वास के साथ बोली, ''भगवान की...।''
''हाँ हाँ, लेकिन किस भगवान की?''
उसने फिर मेरी तरफ़ हैरानी से देखा, मेरे अंतस्तल से दया का स्रोत फूट पड़ा। हे ईश्वर! ये अनपढ़, नादान, कुछ भी तो नहीं जानते! एकाएक ही वह मेरी पूजा की चौकी पर रखी लक्ष्मी की चाँदी की प्रतिमा की ओर इशारा करके बोली-
''तुम्हारा भगवान काए का है? चाँदी का?''
''हाँ, ये देवी लक्ष्मी की मूर्ति है न, इन्हीं की पूजा आज होती है। तुझे मालूम है, लक्ष्मी की मूर्ति है न, इन्हीं की पूजा आज होती है। तुझे मालूम है, लक्ष्मी काहे की देवी हैं, धन-संपत्ति, सुख-सौभाग्य की, समझी?''
उसने 'हाँ' में सिर हिलाया और जैसे यह सोचकर खुश हुई, पूरी पाठ समझ में आए चाहे नहीं, लेकिन हाँ में सिर हिला देने से मास्टर छुट्टी ज़रूर दे देंगे।
सब कुछ रख-रखाकर वह जाने लगी तो मैंने कहा,
''रात में एक बार आ जाना... यहीं पास में ही रहती है न तू?''

उसने सोत्साह हाँ कहकर सामने फैली दस-बारह मैली-कुचैली चीथड़ों से ढाँपी, झोंपड़ियों की तरफ़ इशारा कर दिया, जैसे अपना पता-ठिकाना नहीं, शहर का कोई दर्शनीय स्थल दिखा रही हो। अपना घर दिखाने का गर्व उसके चेहरे से छलका जाता था।
''सुन! तू भी अपने मरद से कहकर रात में भगवान की पूजा करना।'' मन में सोचा- मैं भी अपनी पूजा के समय अपने भगवान से थोड़ी पैरवी कर दूँगी, इनके सुख-चैन के लिए।
''मेरा मरद नई...'' उसने एक तटस्थ-सी सूचना देने के लहजे में बताया।
''क्या?'' एक झटका-सा लगा। मैं जैसे सन्न से नीचे आ गिरी।
''क्या हुआ तेरे मरद को...।''
उसने उसी सूचना देने के से लहजे में अपनी टूटी-फूटी भाषा में समझाया कि उसका मरद गाँव से काफी दूर नहर खुदाई का काम करते-करते वहीं गहरे गढ्ढे में गिरकर मर गया।
''अरे...कैसे...?'' मेरे मुँह से अनायास ही निकला।
''क्या मालूम...।'' उसने उसी तटस्थ और शांत भाव से धीमे से कुछ बुदबुदाया।

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