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हैड नर्स की आवाज़ काफ़ी करारी थी। वह हमेशा मुस्काते चेहरे से आती और सचमुच यह मुस्कान उसके चेहरे, ढलती उम्र, और थुलथुले शरीर में आर्कषण भर देती। उसका राउंड भी किसी वी. आई. पी. राउंड से कम न होता। साथ डयूटी वाली मेल-फीमेल नर्सें रहती और वह उन्हें निर्देंश देती जाती। यह एक जीवंत राउंड होता।

धोबी हल्की डिटोल-सर्फ़ से चादरें निकाल, तहाकर उनकी ऊपरी तहों पर प्रेस लगा प्रेस की फ़ीलिंग दे देता। आउटडोर पेशेंटस के सेल में एक बड़ा रंगीन टी.वी. चुपचाप तस्वीरें बदलता रहता या किसी मरीज़ का केयर टेकर आकर रिमोट बाक्स से रिमोट उठा ज़ी, स्टार, आज तक या एन.डी.टी.वी. चैनल बदलता रहता।
अस्पताल की कैमिस्ट शॉप खचाखच दवाइयों से भरी रहती। वह नित्य हर कमरे में कम्प्यूटराइज़्ड बिल डिलिवर करता। दवा का नाम, मैनुफैक्चरिंग डेट, कंपनी का नाम-सभी यहाँ रहते।

आई.सी.यू. के बाहर भीड़ बनी रहती। ज़्यादातर दूर-दराज के गाँवों-कस्बों से लोग आते और साथ में पूरा कुनबा ही रहता। कभी सलफास खाया, बिगड़े जोंडियस वाला या चाकू-गोली लगवा कर आया कोई रोगी मर जाता तो परिजनों के क्रंदन से हवा में संत्रास घुल जाता।
अस्पताल से घर आकर भी वे टुकुर-टुकुर देखते रहते। फ्रैक्चर की रिकवरी इतनी धीमी होती है, यह तो उन्हें अनुमान था, लेकिन अपने और पराए दर्द का अंतर उन्होंने अब ही पहचाना था।
दिनों तक करवट न ले पाने के कारण अस्पताल में बैड सोर कसकने लगे थे। घर पहुँचते ही देखा कि लॉबी का बड़ा कूलर जनरेटर से कनैक्ट करवा दिया गया है और यहीं उनकी चारपाई बिछा दी गई है। घर के हर कमरे, यहाँ तक कि किचन-बाथ का दरवाज़ा भी लॉबी में खुलता था। सारा परिवार उनके आसपास बना रहता। सूनी आँखों की आसन्न असहायता रिकवरी की उम्मीदों में बदलने लगी थी। घर पहुँच कर वे थोड़ा सामान्य भी महसूस कर रहे थे। बैड सोर अब सूखने लगे थे।

गर्मी के मौसम में न नहाना उन्हें बेचैन कर जाता, लेकिन साबुन और गीले तौलिए का सपंच और प्रिकली हीट पाउडर की फ्रैशनेस से बिखरी ताज़गी और सुवास उन्हें काफ़ी तरोताज़ा कर जाती।
पट्टी करने वाला सप्ताह में दो बार आता। वे धीरे-धीरे उससे बतियाते रहते। लगता इस फ्रैक्चर की रिकवरी के सभी रहस्य वह जानता है। वह जानता है कि कब वे बैठ सकेंगे, कब टाँग ज़मीन पर लगेगी, कब कुर्सी तक जाएँगे। कब वाकर पकड़ेंगे। कब कदम-कदम चलेंगे।

नन्हीं-सी चार वर्षीय पोती उनकी थाली में एक-एक फुल्का रखती, मचलती, लाड़ करती जाती और वे मात्र मंद मुस्कान से उसके सिर पर हाथ रख उसके सारे मनचलेपन का जवाब दे देते।

पत्नी ने सारे नाते-रिश्ते, काम-काज, घरेलू उठा-पटक, बेकार-बेगार, किट्टी-क्लब, कथा-कीर्तन, ख़रीद-फ़रोख़्त, गप्पबाजी वगैरह से संन्यास ले मात्र उनकी ज़िम्मेदारी ओढ़ ली थी। वह उनकी नर्स भी थी, केयर टेकर भी और संरक्षिका भी।

बेटा सुबह-शाम पास बैठ घंटा भर इधर-उधर की बातें करने लगा था। बहू ने घर के सारे कामकाज की ज़िम्मेदारी सँभाल सास को छोटे मोटे झंझटों से मुक्त कर दिया था। बेटी हर शनि-इतवार चक्कर लगा जाती। यह लॉबी घर का लीविंग रूम, ड्राईंग रूम, डाइनिंग रूम सब बन गई थी। कभी-कभी तो उन्हें बीमारी भी वरदान लगने लगती।

आश्चर्य कि इतने स्नेहिल परिवार की आत्मीयता को न पहचान वे जीवन भर अपने में सिमटे रहे।

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9 अप्रैल 2007

 

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