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अस्पताल में मोबाइल की लाइफ़-लाइन के सहारे
उन्होंने डेढ़ सप्ताह काट लिया। कभी यह लाइफ़-लाईन कैंटीन से
जुड़ती, कभी मेडिकल स्टोर से, कभी रिश्तेदारों-परिचितों से,
कभी अड़ौसी-पड़ौसियों से। दोपहर को लोग सारे काम निपटाकर एक
औपचारिकता का बोझ उतारने आ जाते और फिर घर जाकर अस्पताल जाने
की थकावट उतारने में जुट जाते। नहाते-धोते, लेटते-सोते, फ्रेश
होते, अंग-अंग से अंगड़ाइयाँ लेते। चारपाई से जुड़ा मरीज़ हर
दोपहर आने वालों की प्रतीक्षा में दीवार पर टकटकी लगाए रहता।
दुनिया-जहान घूमने वालों का संसार भी यहाँ आकर ऐसे ही सीमित हो
जाता है। पत्नी उनके साथ छाया की तरह
बनी रहती। हमेशा की तरह उनकी हर ज़रूरत को उनसे भी पहले महसूस
कर डॉक्टर, नर्स या अटेंडेंट को बुला लाती, उनका हर लिहाज से
पूरा ख़याल रखती, पर यह फ्रैक्चर मानो चुपके से उनके भीतर तक
उतर गया था। आँखों के आगे बाजू रखकर वे दर्द को पीते और छिपाते
रहते।
कभी उन्हें लगता कि दुनिया कितनी संवेदनशील
है। जिसने भी सुना, सुनकर सुन्न हो गया। भागा चला आया और कभी
लगता कि दोस्त कितने पत्थर दिल होते हैं चार-चार कालेज पर एक
बार औपचारिकता निभाकर चलते बनते हैं। |