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कहानियाँ

समकालीन हिंदी कहानियों के स्तंभ में इस माह प्रस्तुत है लखनऊ, भारत से
डॉ. शांति देवबाला की कहानी गुलमोहर


हमने बहुत चाहा था कि एक बेटा तो हमारे पास रहता, न सही एक छत के नीचे पर एक शहर के अलग-अलग घरों में रहकर भी एक सामीप्य सुख की भावना तो बनी ही रहती है। करुणा मोहन तो रह सकता था, उसकी अपनी बिज़िनेस थी पर वह तो सबसे पहले ही मस्कट जा बैठा। बड़ा बेटा अरुण वाशिंगटन में डाक्टर है - परिवार समेत वहीं बस गया है, पिछले आठ दस वर्षों से तो उसका आना ही नहीं हुआ, छोटा बेटा वरुण चेन्नई में हैं, कभी-कभार आ जाता है, पर उसकी पत्नी को यहाँ एक दिन बिताना भी छुटि्टयों का अपव्यय लगता है, एक-एक क्षण अपनी माँ के साथ बिताना चाहती है और चाहती है वरुण भी अपनी सासु के साथ ही रहे। मोनिका अपने घर है, जब सब थे कैसा जन संकुल लगता था यह घर! अब तो लगता है गहमागहमी से निकल कर किसी वीराने में आ गए हैं बस मैं और विभा, इतना बड़ा घर।

पर जितनी उष्मा सुरक्षा इस घर की छत ने दी है हमें वह अपना कोई बेटा नहीं दे पाया और यह भी तो है न इसी घर से जुड़ा गुलमोहर। जितनी सुखद छाँह इस गुलमोहर ने दी है वह कोई संबंधी नहीं दे पाया। जिन्हें अपने पास रखना चाहते थे वे सब नीड़ से पंख पसार कर उड़ गए और जो अंगद से पाँव टिकाये घर बनने के पहले दिन से हमारे सारे सुख-दुखों का साक्षी मित्र बंधु-सा खड़ा रहा था उसे हमने ही टिकने नहीं दिया।

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