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गौरव गाथा में
इस माह
प्रस्तुत है सुशील कुमार शर्मा की
कहानी
धूप प्यास और
वैदिक जलजीरा

जेठ की सुबहें दरअसल सुबह नहीं
होतीं, वे रात की शेष बची हुई थकान का विस्तार होती हैं। सूरज
उगते ही नहीं, जैसे आकाश पर अधिकार कर लेते हैं। उस दिन भी ऐसा
ही था। क्षितिज पर लालिमा की एक पतली रेखा उभरी ही थी कि उसकी
तपिश ने हवा को बदलना शुरू कर दिया।
गाडरवारा शहर के उस पुराने घर का आँगन अभी-अभी धोया गया था।
मिट्टी में पानी के छींटे पड़ते ही जो सोंधी गंध उठती है, वह
किसी भी इत्र से अधिक गहरी होती है। तुलसी चौरे के पास
धूपबत्ती जल रही थी और भीतर रसोई में जीवन अपनी सबसे सच्ची लय
में चल रहा था।
दादी चौकी पर बैठी थीं। सामने कच्चे आमों का ढेर—हरे, ताजे,
भीतर खटास का पूरा संसार समेटे हुए। पास ही पुदीने की
पत्तियां, भुना हुआ जीरा, काला नमक, हींग की डिबिया, सब जैसे
किसी अनुष्ठान की तैयारी में हों।
...आगे-
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