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समकालीन कहानियों में
इस माह
प्रस्तुत है मनीष मनहास की
कहानी
वृंदावन

कालियादेह की वह दोपहरी मुझे आज भी याद है। दो पंछियों से वे
किसी डाल-डाल पात-पात पर डोल रहे थे। यों लग रहा था मानो
राधा-कृष्ण ही हों। वह उसे कह रहा था कि यह कालियादेह है,
वृन्दावन का वह पावन स्थल जहाँ आज से ५००० वर्ष पूर्व वासुदेव
श्रीकृष्ण ने कालिया नाग का वध किया था। और यह है ५००० वर्ष
पुराना कदंब का वृक्ष, जिस पर चढ़कर उन्होंने यमुना में छलांग
लगाई थी और जिस दिव्य वृक्ष पर आज भी शोभायमान हैं उनके
पद-चिह्न। "देखो तो, देखो ज़रा, ज्यों का त्यों मिलता है वह
तने के रूप में ढला हुआ कलश, जिसमें गरुड़ देव के अमृत उड़ेलने
के पश्चात् यह वृक्ष कभी मुरझाया नहीं, आज भी हरा-भरा है।"
वह लड़का उस लड़की को कालियादेह के बारे में ये सब
बातें बता रहा था। और मैं सोच रही थी कि यह वृक्ष नहीं अपितु
साक्षात् श्रीकृष्ण हैं।
...आगे-
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