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१. १. २०२३

अनुभूति-में-
केतन यादव, श्रीधर आचार्य शील, दर्पण चंडालिया, आशीष मिश्रा, शशिकांत गीते और भोलानाथ की रचनाएँ।

इस माह- स्थायी स्तंभ-

कलम गही नहिं हाथ- संक्रान्ति और पतंग का घनिष्ठ सम्बंध है। दुबई में जनवरी से मार्च के बीच पतंग उड़ाने-के-कार्यक्रम-प्रति-वर्ष-आयोजित-होते-हैं।...आगे पढ़ें

रसोईघर में- हमारी रसोई संपादक शुचि अग्रवाल प्रस्तुत कर रही हैं- एक पारंपरिक व्यंजन विधि-  मँगोड़ी की तहरी

बागबानी में- नन्हीं पत्तियाँ प्यारे पौधे जो घर का रूप सँवारें और पर्यावरण निखारें- इस शृंखला में प्रस्तुत है- स्पाइडर प्लांट

स्वस्थ भोजन स्वस्थ शरीर में- दीर्घायु प्रदान करने वाले १२ पौष्टिक-तत्व जिन्हें प्रतिदिन खाना चाहिये। इस शृंखला में प्रस्तुत है- अंकुरित दालें

डाक टिकटों पर पौराणिक पात्र- देश विदेश के वे टिकट जिन पर देवी-देवताओं के चित्र प्रकाशित किये गए हैं इस अंक में प्रस्तुत है- जर्मनी के डाक टिकट

बतरस से लिखवट तक - रतन मूलचंदानी के फोटो निबंधों की शृंखला में इस माह- खिड़की में सागर

गौरवशाली भारतीय- क्या आप जानते हैं कि जनवरी महीने में कितने गौरवशाली भारतीय नागरिकों ने जन्म लिया? ...विस्तार से 

नवगीत संग्रहों और संकलनों से परिचय की शृंखला में- ओम प्रकाश सिंह का नवगीत संग्रह- बनजारे गीतों के गाँव - डॉ. मंजु सिंह की कलम से।

वर्ग पहेली-३५७
गोपालकृष्ण-भट्ट-आकुल और रश्मि आशीष के सहयोग से

हास परिहास
में
पाठकों द्वारा भेजे गए चुटकुले

साहित्य-और-संस्कृति-में

समकालीन कहानियों में इस माह प्रस्तुत है- भारत से राजवंत राज की कहानी- जूड़े वाला क्लिप

किसी ने बड़े भाई की तरह घुड़का नहीं, मेरा फोन चेक नहीं किया, पीठ पर धप्प से धौल नहीं जमाई, झूठा रुआब भी नहीं झाड़ा, माँ पापा से छुपा कर लड़कियों से की गई दोस्ती की तमाम सच्ची झूठी कहानी सुनाई ही नहीँ क्योंकि मेरा कोई भाई था ही नहीं। पेन के लिये, क्लिप के लिये, कंघी, कपड़ों, जूते, चप्पलों की खातिर, या फिर मैगजीन पहले पढ़ने के लिये कभी किसी से झगड़ा कर ही नहीं पाई क्योंकि मेरी कोई बहन भी थी ही नहीँ। ये दोनों रिश्ते मेरे नजदीक सिर्फ रिसालों तक ही महफूज रहे। इन रिश्तों के दरम्यान होने वाली नोक - झोंक मेरे हिस्से कभी आई ही नहीं थी। माँ पापा के एक्सीडेंट के बाद मेरे इर्द गिर्द पसरा सन्नाटा घर शब्द के एहसास को मानो निगल ही चुका था कि तभी अनु ने मेरी जिंदगी में दस्तक दी। एक मर्द जिसने कब अपनी जिंदादिली से मेरी लगभग मर चुकी तमाम ख्वाहिशों में आहिस्ता आहिस्ता रंग भरने शुरू कर दिये मुझे पता ही नहीँ चला और एक दिन अचानक तमाम चमकीले रंगों से लबरेज अपने आप को अनु के फ्रेम में जड़ा पाया। परसों शाहदरा से आते वक्त मेट्रो में शिखा मिली। हास्टल में मेरी रूममेट थी। मारे खुशी के उसने मुझे गले से लगाते लगाते एकदम से... आगे-
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डॉ. सुरेश अवस्थी का व्यंग्य
चौराहे पर ठंड पेट में अलाव
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पद्मसम्भव श्रीवास्तव का ललित निबंध
डोर से बँधी पतंग चली आसमा की ओर
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डॉ० शिबन कृष्ण रैणा से जाने
जाडू परिवार का देश प्रेम
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पुनर्पाठ में श्रीराम परिहार का
ललित निबंध- पतंग का अनुशासन

पिछले अंकों से-

विमल सहगल का व्यंग्य
बीत चले त्योहारों के दिन
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डा. मधु संधु का शोध निबंध
२१वीं शती का प्रवासी उपन्यास: प्रेम के विविध रूप
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संस्कृति में जाने
जप-माला के अनोखे तथ्य
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जयप्रकाश चौकसे का दृष्टिकोण-
वर्ष का अंतिम दिन- आनंद और अवसाद के बीच

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समकालीन कहानियों में इस माह प्रस्तुत है- अमेरिका से इला प्रसाद की कहानी- सांताक्लाज हँसता है

हो, हो हो! सांताक्लाज हँसता है।
उसके साथ हँसते हैं वेरा, बेन और जेनी। उसे घेर कर नाचते हैं।
वेरा उसकी दाढी छूकर देखती है- कितनी मुलायम और ठंढी… बर्फ के फाहे लगे हुए… उत्तरी ध्रुव से आता है सांता… चिमनी से घर में घुसता है और बैठके में क्रिसमस ट्री पर छुपाकर रखे उनके पत्र पढ़ता है। फिर उनकी माँगी चीजें रख जाता है। उसे सब पता है अब। आज पकड़ा गया। वेरा ने सब देख लिया है। वह बाहर झाँक कर देखना चाहती है – सांता की स्लेज बाहर होगी। सुनहले सीगोंवाले हरिण जुते होंगे। क्या उनके सींगों पर भी बर्फ है, उजले हो गये हैं वे भी यहाँ तक आते –आते… वह सांता से बात करना चाहती है, पूछना चाहती है- पिछले तीन सालों से आया क्यों नहीं। लेकिन सांता के फोन की घंटी बजने लगी है। सांता यह जा, वह जा…। बाय-बाय सांता। कम अगेन.. नेक्स्ट ईयर... सांता हँसा – हो, हो…वेरा चौंक कर जागी। सांता आया था।
मॉम रसोई में है। बेन और जेनी सो रहे हैं। वह माँ को बताना चाहती है।
‘गुड मार्निंग मॉम।“
“गुड मार्निंग बेबी।“ ... आगे-

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यह पत्रिका प्रत्येक माह के पहले सप्ताह मे प्रकाशित होती है।

प्रकाशन : प्रवीण सक्सेना -|- परियोजना निदेशन : अश्विन गांधी
संपादन, कलाशिल्प एवं परिवर्धन : पूर्णिमा वर्मन
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सहयोग : रतन मूलचंदानी

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