|
गौरव गाथा में
इस माह
प्रस्तुत है
अमृतलाल नागर की
कहानी
लखनवी होली

इसमें न तो मेरा ही दोष मानिएगा और न यश। कारण यह है कि
'नव-जीवन' सम्पादक ने होली के दिन सवेरे ही अचानक टेलीफोन से
मुझे अपने घर पर बुलाकर बड़े नाटकीय ढँग से डबल गहरी केसरिया
भंग पिला दी और जब पहला झन्नाटा आया तो बोले कि पंडित जी,
गुसाई जी ने आपाकाल में चार को परखने के लिए कहा है। आज आपकी
मित्रता कसौटी पर है। होली के कारण हमारे रिपोर्टर आज अचानक
गायब हो गए हैं। होली के दिन युवकों को कोई क्या कह सकता है और
अखबार का काम, आप जानते हैं कि रुक नहीं सकता। इस संकट से आप
ही आज हमें उबारिए। मैं सरदार अहमद का ठेला आपको दिलवाए देता
हूँ। ड्राइवर के पास पर्याप्त धन रहेगा, वह बराबर
पान-मिष्ठान्न, दूध-मलाई, इत्र-फुलेल, फूल आदि से आपका चित्त
प्रफुल्लित रखेगा।...आगे-
*** |