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वतन से दूर में
इस माह
प्रस्तुत है सिंगापुर से डॉ. संध्या
सिंह की
कहानी
ऐसा होता है

उस दिन बारिश रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। रुकती भी क्यों?
आखिर, बारिश को भी तो अपना दमख़म दिखाना था। वैसे भी इस शहर पर
बारिश ज़्यादा ही मेहरबान रहती है। धूप की बात तो निराली ही है
पर यहाँ बारिश भी हमेशा दूसरे मौसमों से आगे ही दिखी है।
बस इस मैं बड़ी, मैं बड़ी की लड़ाई में एक चेहरा याद आ जाता है।
विवेक हाल ही में भारत से सिंगापुर आया था। इस देश के लिए नए
सपने, नई उम्मीदें थीं और काम भी जोश भरा। दफ़्तर नया था पर
‘एडजस्ट’ होने की कोशिश कर रहा था। “आज घर की बहुत याद आ रही
है। रास्ते में ही माँ से बात करूँगा।” सोचते हुए उसने अपने घर
के नज़दीक जाने वाली ‘ट्रेन’ पकड़ ली। ट्रेन में भीड़ अधिक थी।
ठीक से खड़े होने की गुंजाइश भी जब कम लगने लगी तो माँ से फोन
पर
...आगे-
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