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१. ११. २०२२

इस माह-

अनुभूति-में--विभिन्न-विधाओं-में देश-विदेश से आभा खरे,-उमा प्रसाद लोधी, पूर्णिमा जोशी, हरजीत सिंह और परमजीत कौर रीत  की रचनाएँ।

कलम गही नहिं हाथ-

दुबई जब बादल या धुंध से ढँक जाता है तब भी उसके कुछ नागरिक खुली धूप का आनंद ले रहे होते हैं। कहना न होगा कि बादल पे पाँव ...आगे पढ़ें

घर-परिवार में

रसोईघर में- हमारी रसोई संपादक शुचि अग्रवाल प्रस्तुत कर रही हैं, हींग जीरे वाली मँगोड़ी-पापड़ की स्वादिष्ट सब्जी

बागबानी में- बारह पौधे जो साल-भर फूलते हैं इस शृंखला के अंतर्गत इस माह प्रस्तुत है- चाँदनी की देखभाल।

स्वाद और स्वास्थ्य में- स्वादिष्ट किंतु स्वास्थ्य के लिये हानिकारक भोजनों की शृंखला में इस माह प्रस्तुत है- डिब्बाबंद अचारों के विषय में।

जानकारी और मनोरंजन में

गौरवशाली भारतीय- क्या आप जानते हैं कि नवंबर महीने में कितने गौरवशाली भारतीय नागरिकों ने जन्म लिया? ...विस्तार से 

वे पुराने धारावाहिक- जिन्हें लोग आज तक नहीं भूले और अभी भी याद करते हैं इस शृंखला में जानें नुक्कड़ के विषय में।

नवगीत संग्रहों और संकलनों से परिचय की शृंखला में- कृष्ण गोपाल शर्मा मृदुल का नवगीत संग्रह- पूछिये मत - डॉ. रंजना गुप्ता की कलम से।

वर्ग पहेली-३५५
गोपालकृष्ण-भट्ट-आकुल और रश्मि आशीष के सहयोग से

हास परिहास
में पाठकों द्वारा भेजे गए चुटकुले

साहित्य-और-संस्कृति-में

समकालीन कहानियों में इस माह प्रस्तुत है- भारत से शुभदा मिश्र की कहानी- वह मददगार

“हाथ रखिये...” पंडितजी ने कहा।
उन्होंने हथेली खोलकर मेज पर रख दी। मेज के एक तरफ वे बैठी थीं, दूसरी तरफ पंडितजी। पंडितजी गौर से हथेली देखते रहें फिर आँखें सिकोड़कर देखने लगे। दूसरी हथेली की तरफ इशारा किया। उन्होंने दूसरी हथेली भी खोलकर रख दी। उसे भी आँखें सिकोड़े देखते रहे। फिर खिन्नता से दोनो हाथ हटा दिये।
“पंडितजी कुछ बताईये”...वे सहमकर बोलीं।
“क्या बताएँ...कुछ बताने लायक नहीं है।” पंडितजी वितृष्णा से बोले। फिर उनकी तरफ देखकर बोले...“कुछ पढ़ी लिखी हो?” उनकी आँख में पानी आने लगा। साथ आई सहेली बोली... “पंडितजी यह एम.ए. पास हैं। कुछ दिन एक कॉलेज में पढ़ाया भी है।”
बोले...“अपने से की होगी। उसमें भी बहुत मुश्किलें आई होंगी। इनके हाथ में तो है नहीं।“ वे सदमे से बैठी रहीं। फिर कातर सी कहने लगीं- "पंडितजी जब मेरे हाथ में कुछ है ही नही, तब क्या मुझे आत्महत्या कर लेनी चाहिये?"
पंडित जी सतर्क हुए। कुछ सोचकर बोले...पहले इस जंजाल से निकलो। प्रयास करती रहो। फिर कोई ऐसा व्यक्ति मिलेगा जो तुम्हारा मददगार होगा।... आगे-

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सुधा भार्गव की लघुकथा-
गोवर्धन आनलाइन
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डॉ. शकुंतला बहादुर का संस्मरण
अमेरिका के इंद्रलोक लास वेगास की ओर
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प्रकृति और पर्यावरण में अशोक स्वैन
के साथ- जलवायु परिवर्तन का अहसास
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कला दीर्घा में प्रो. मजुलता चतुर्वेदी से
जानें- चित्रकार प्रो. उमेश कुमार सक्सेना के विषय में

पिछले अंकों से-

रघुविन्द्र यादव का प्रेरक प्रसंग
उपकार का बदला

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परिचय दास का ललित निबंध
दीपावली ज्योति के बिंबों की लड़ी है
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अनिरुद्ध जोशी का आलेख
राम के वंशज जो आज भी जीवित हैं
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प्रेमपाल शर्मा से पर्व परिचय में जानें
पंच-महोत्सव और लक्ष्मी गणेश पूजन के विषय में
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दीपावली के अवसर पर विशेष रूप से फुलवारी में सुधा भार्गव की बालकथा- अनोखे दीपक
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विज्ञानवार्ता में- दीपावली के अवसर पर विशिष्ट आलेख- पटाखे, प्रदूषण और सावधानी
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समकालीन कहानियों में इस माह प्रस्तुत है- भारत से भारत से कंदर्प की कहानी- वापस आओ रघुवीर

माँ आज बहुत रोई थी। माँ को रोते हुए किसी ने नही देखा लेकिन मुझे पता था कि माँ आज बहुत रोई थी। रोने के बाद माँ के दूध से भी उजले चेहरे पर जैसे सिंदूर मल जाता है। नाक और गाल सामान्य से अधिक लाल हो जाते है। पहले पापा अक्सर माँ को छेड़ते हुए कह देते थे, "अरे …क्या हुआ ...चेहरे की रंगत बढ़ गयी है!... रोई थी क्या सुखु?" लेकिन अब यह वाक्य सुनाई नही देता। बल्कि पिछले दो सालो से सुनाई नही दिया कि... रोइ थी क्या सुखु? दो साल बीत गए। दो साल पहले उस रात माँ ने अचानक झिंझोडकर हम दोनो भाइयो को उठा दिया था , मैं और रघु। "सुन ….लगता है …तेरे पापा को अटैक आया है... हॉस्पिटल जा रही हूँ... आगे-

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