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कहानियाँ

वरिष्ठ कथाकारों की प्रसिद्ध कहानियों के इस स्तंभ में इस माह
प्रस्तुत है अमृतलाल नागर की कहानी- लखनवी होली


इसमें न तो मेरा ही दोष मानिएगा और न यश। कारण यह है कि 'नव-जीवन' सम्पादक ने होली के दिन सवेरे ही अचानक टेलीफोन से मुझे अपने घर पर बुलाकर बड़े नाटकीय ढँग से डबल गहरी केसरिया भंग पिला दी और जब पहला झन्नाटा आया तो बोले कि पंडित जी, गुसाई जी ने आपा‌काल में चार को परखने के लिए कहा है।

आज आपकी मित्रता कसौटी पर है। होली के कारण हमारे रिपोर्टर आज अचानक गायब हो गए हैं। होली के दिन युवकों को कोई क्या कह सकता है और अखबार का काम, आप जानते हैं कि रुक नहीं सकता। इस संकट से आप ही आज हमें उबारिए। मैं सरदार अहमद का ठेला आपको दिलवाए देता हूँ। ड्राइवर के पास पर्याप्त धन रहेगा, वह बराबर पान-मिष्ठान्न, दूध-मलाई, इत्र-फुलेल, फूल आदि से आपका चित्त प्रफुल्लित रखेगा। आप आज हमारे लिए खबरें लाइए।

मैंने कहा कि आपने मुझे अजब झमेले में डाल दिया। गहरी भाँग बड़ी उचक्की होती है। एक स्तर पर कभी रहने ही नहीं देती! खैर ! जब फँस ही गया तो उसी चाल से मैंने भी गुसाई जी की दुहाई देकर अपने मित्र श्री सर्वदानन्द को फँसाया। सर्वदानन्द ने श्रद्धेय बाबू जी (डा० सम्पूर्णानन्द जी) की सीक्रेट फाइल में से जवाहरलाल जी का वह पत्र चुराकर मुझे नकल करा दिया।

जवाहरलाल जी का यह पत्र कितना महत्त्वपूर्ण है, पाठक पढ़कर खुद ही
अन्दाज लगा लें-
"माई डियर सम्पूर्णानन्द !
तुम्हारी अष्टग्रही की चेतावनी को मैंने कृष्ण मेनन की एलेक्शन मीटिंगों के लिए बम्बई जाने पर खूब अच्छी तरह से महसूस किया। मेरी एक फण्डामेण्टल मजबूरी यह है कि इण्टरनेशनल कारणों से तुम्हारी एस्ट्रालॉजीकल सायंस के मुतल्लिक कोई पब्लिक स्टेटमेण्ट नहीं दे सकता। हाउ-एवर, मैं तुमको तहेदिल से उस चेतावनी के लिए धन्यवाद देता हूँ। तुम्हें इस वक्त खत लिखने का मेरा खास मकसद यह है कि मेरे सामने राष्ट्रीय जलशक्ति अनुसंधानशाला की रिपोर्ट रखी है। उनका कहना है कि होली में हर साल जितना पानी बरबाद किया जाता है उतने पानी से देश के तीन हजार सिनेमाघरों में बिजली सप्लाई की जा सकती है। यह तो बड़े नुकसान और फिक्र और अफसोस की बात है।

अलावा इसके कुछ भी कहो हमारी फिल्में भारत में भावनात्मक एकता लाती हैं कश्मीर से कन्याकुमारी तक हर तरफ एक से गीत गाए जाते हैं। इसलिये यह कला की रक्षा का सवाल भी है। मैं हिंदुस्तानी संगीत को बहुत सुनने के बाद भी उसका कुदरती एडमायरर नहीं बना पाया। मैं नहाते वक्त जब भी गुनगुनाने की जरूरत महसूस करता हूँ तब भी पुरानी अँग्रेजी तर्जें ही गुनगुनाता हूँ, तुम इस फन के माहिर हो लिहाजा मैं चाहता हूँ कि तुम सिनेमाघरों की अहमियत पर जोर देते हुए, होली की दकियानूसी रंगबाजी बंद करने के लिये कानून बनाने की सिफारिश पर अपनी भावनात्मक एकता की रिपोर्ट करो।
तुम्हारा जवाहर

सर्वदानंद के घर से ही मैंने मद्रास में अपने पुराने मित्र और तमिल कल्कि तथा अंग्रेजी स्वाराज्य के डायरेक्टर श्री सदाशिवम से ट्रंककाल मिलवाई। गोसांईं जी की धीरज धर्म मित्र अरु नारी वाली उक्ति को जोड़कर ही कोई उक्ति तमिल भाषा में महाकवि कम्बन की रामायण से पढ़कर भाव समझने की प्रार्थना मैंने सदाशिवम से की। वे चक्रवर्ती राजा जी के खास आदमी हैं। उन्होने मुझे इस प्रकार समाचार दिया। हाल ही में अमेरिका ने सूर्य का अनुसंधान करने के लिये शून्य में एक अनुसंधानशाला खोली है। उससे उपलब्ध कुछ तथ्य और आँकड़े आज ही अमेरिकम एम्बेसी ने आज ही राजा जी के पास भेजे हैं। उनसे यह पता चला है कि सूरज के सात रंगों में से साढ़े तीन दशमलव जीरो जीरो सात अंगों का स्टाक अकेले भारतवर्ष की होली में प्रतिवर्ष खर्च हो जाता है। इसलिये रंगों के असंतुलन से सूरज दिनों दिन लाल होता जा रहा है। इसके बाद सदाशिवम जी ने मुझसे कहा कि अवर राजा जी टेरेबली एंगर ओवर दिस। वे एक वक्तव्य देने वाले हैं। वक्तव्य मैंने फोन पर ही लिख लिया है, जो कि इस प्रकार है-

सारी दुनिया को इस बात से जबरदस्त धक्का लगेगा कि भगवान सूर्य नारायण क्रमशः कम्युनिस्ट होते जा रहे हैं। जवाहरलाल हर साल होली खेलकर कम्युनिज्म को बढ़ावा दे रहा है, दिस इज अधर्मा, लाइक बकासुर द कांग्रेस इस डिवाल्विंग भगवान सूर्यनारायण। मुझे यह भी बतलाया गया कि राजा जी रानी गायत्री देवी पर इस बात का दबाव डाल रहे हैं कि वे अपनी जीती हुई सीट से हारे हुए प्रोफेसर रंगा को उपचुनाव कर के जिता दें। जिससे कि लोकसभा में रंग आंदोलन जोर पकड़ सके। इसके बाद एक टिप मुझे उपेन्द्र बाजपेयी से मुझे मिली। खबर यह है कि विभिन्न पाटियों के हारे हुए कुछ लीडरों ने मिलकर अपनी पराजय के कारण ढूँढ़ने के लिए एक सर्वदलीय जाँच समिति बनाई है।

सर्वश्री आचार्य कृपलानी, राममनोहर लोहिया, अटलबिहारी वाजपेयी, अशोक मेहता, हरगोविन्द सिंह, त्रिलोकी सिंह और राजनारायण सिंह आदि ने एक स्वर से पराजय के कारणों में प्रमुखतम कारण गालियों का स्टाक समाप्त हो जाना बतलाया है। प्रायः सभी पाटियों और वर्गों के हरैलों से इण्टरव्यू करने के बाद इन लीडरों का कहना है कि होली के भड़वे प्रति वर्ष गालियों के कोष का अपव्यय कर डालते हैं। यदि एक पंचवर्षीय योजना बनाकर होली के दिनों में उन्हें रोका जाए तो अगले चुनाव तक ब्र पार्टी के पास गालियों की इतनी प्रचंड शक्ति होगी कि हर पार्टी एक-दूसरे को खुलकर माँ-बहन तक की सनातन लोक-सांस्कृतिक गालियाँ देने में समर्थ हो जाएगी।"

इस समाचार के लिए उपेन्द्र को बेनबो के रसगुल्ले खिलाकर और स्वयं छककर खाने के बाद नशे के आखिरी झन्नाटे में जो आगे चले तो हमारी कार शिवसिंह सरोज के रिक्शे से भिड़ गई। खैर! रिक्शा-कार दोनों ही बालबाल सही-सलामत बच गए। इस अचानक मिलने को सरोज जी ने तीन खबरें मुझे देकर सार्थक बना दिया। सरोज ने एक तो चलती हुई साहित्यिक खबर यह दी कि श्री निर्मलचन्द्र चतुर्वेदी ने श्री चन्द्रभान गुप्ता जी ने कहकर हमारे श्रद्धेय भैया साहब राय बहादुर पण्डित श्री नारायण जी चौबे को भाँग की ठेकी खोलने का लाइसेन्स दिला दिया है। सरोज ने बतलाया कि पं० इलाचन्द्र जोशी इस समाचार को सुनकर भैया साहब से साझा करने की योजना लिए मन ही मन में घट रहे हैं, किन्तु उनके मन का एक भी विस्फोटक तत्त्व उनके स्वभावगत संकोच को तोड़कर मैया साहब से स्पष्ट रूप से कह नहीं पाता।
दूसरे यह बतलाया कि श्री बेढब बनारसी अपने नाश्ते के लिए काशी से एक हण्डिया में पाँच सेर मगदल लाए थे। बेधड़क, भ्रमर और योगीन्द्रपति त्रिपाठी ने वह हण्डिया उड़ाई तो साथ-साथ, पर बाद में बँटवारे पर झगड़ा हो गया।
इसी बीच में पड़ोसी अधिकार प्रेस वाला कोई कम्युनिस्ट हण्डिया लेकर चम्पत हो गया।

तीसरा एक छपा हुआ साहित्यिक वक्तब्य सरोज ने मुझे दिखलाया जोकि होली के मेले में वितरित किया जाएगा। वक्तव्य श्री भगवती चरण वर्मा, श्रीरामधारी सिंह दिनकर और श्री यशपाल ने सम्मिलित रूप से दिया है। वक्तव्य का शीर्षक है, 'होली में आग का दुरुपयोग, एक अनन्त मार्मिक समस्या ।' वक्तव्य इस प्रकार है:
"हम भारत के साहित्यकार होली के अवसर पर अपने समाज द्वारा मनों-टनों लकड़ी फूँककर मूल्यवान राष्ट्रीय सम्पति का नाश करने की सनातन प्रवृत्ति को महती चिन्ता और महद् चिन्तन की दृष्टि से निरन्तर देखते ही चले जा रहे हैं। इससे मानुव्रता का साहित्यिक, सांस्कृतिक आर्थिक, नैतिक एवं सैद्धान्तिक अकल्याण हो रहा है। होली ऐसे मौसम में आती है जबकि आग तापने का मजा खत्म हो जाता है। होली की आग में चाय या खाना भी नहीं पकाया जा सकता क्योंकि यह अधर्म है। होली युगों-युगों से धू-धू कर जलती हुई मानो अपनी मौन लपटों में आहे भर-भरकर कहती है कि 'मैं बिरहिन ऐसी जली कोयला भई न राख।"

"होली में आग चूँकि जलाई जाती है इस कारण से आग 'लगाने' के सुन्दर सुरुचिपूर्ण मुहावरे को नाजुक ठेस पर ठेस निरन्तर लगती ही चली जा रही है। इससे साहित्य के प्रति घोर अन्याय हो रहा है। लोगों को यह सोचना चाहिए कि आखिर भूस में आग लगाकर दूर खड़ी होनेवाली बी जमालो क्या किया करेंगी। यदि होली ही जलेगी तो फिर एक-दूसरे का वैभव देख-देखकर जलनेवाली मानवीय प्रवृत्ति का आखिर क्या होगा? शुद्ध साहित्यिक दृष्टि से विरह की आग में जलना ही श्रेष्ठ है। अतः होली के दिन सबको अपने-अपने अन्तर में प्रचण्ड विरहाग्नि प्रज्वलित करनी चाहिए। जो जिसके विरह में जलना चाहे जले, होली में इसकी पूरी स्वतन्त्रता है।

इस प्रकार होली मानव के मौलिक अधिकार का पावन दिवस बन जाएगा जो युग की धर्म-निरपेक्षता की माँग के सर्वथा अनुकूल होगा। इससे होली के प्रगतिशील समाजवादी तत्त्वों का पोषण होगा। आर्थिक दृष्टि से देश को यह लाभ होगा कि विरही राष्ट्र खाना कम खा पाएगा। अन्न की समस्या हल होगी। दूसरे, राष्ट्रीय बेकारी की समस्या भी सुलझ जाएगी क्योंकि विरही जनों को अर्जी लगाने का अवकाश ही न मिलेगा। बची हुई लकड़ी के छोटे-बड़े कठघरे बनवाकर शेर-बन्दर, साँप-अजगर आदि भारत के विचित्र जानवरों को विदेशों में बेचने और सांस्कृतिक आदान-प्रदान करने से राष्ट्र को एक नया लघु उद्योग मिलेगा। इसके बाद भी जो लकड़ी बच रहेगी वह शहीद हो जाने वाले विरही और विरहिणियों को पंचत्व में मिलाने के काम आएगी।"

"हम अपनी अनुभवी दूरदृष्टि से यह सहज ही देख रहे हैं कि इस महान राष्ट्र में अब भी ऐसे गैरतदार मौजूद हैं जो किसी न किसी के विरह में अपना प्राणोत्सर्ग कर सकते हैं। आर्थिक तंगी से त्रस्त राष्ट्र ऐसी महान आत्माओं के उस महाक्षण की बड़ी उत्सुकता से बाट देखेगा। हम भारत के साहित्यकार कविकुल- गुरु कालिदास के नवविरही यक्ष-यक्षिणियों की आगामी अमर शहादत के प्रति अभी से ही अपनी शाश्वत श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं और यह आशा करते हैं कि अपने अन्तिम महान क्षणों में वे महाकवि पन्त का यही गीत गाते रहेंगे 'बाँध दिए क्यों प्राण प्राणों से; तुमने चिर अनजान प्राणों से'।"

इस साहित्यिक वक्तव्य के नीचे शिवसिंह सरोज के व्यक्तिगत प्रभाव से प्राप्त डिप्टी मेयर कैप्टन वेदरत्न मोहन की डाय मेकिंग कंपनी का कलात्मक विज्ञापन भी छपा है। विरहियों की चिरसंगिनी और उसके आगे व्हिस्की बियर की बोतलों के चित्र हैं। बोतलों के चित्र देखते ही हमारा भंग का नशा उतर गया। इच्छा रहते हुए भी हम आगे कहीं न जा सके।

१ मार्च २०२६

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