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''सत्य कह रहे हैं आप। तभी देखा था।'' देवकी ने कहा, ''किंतु मैं भी सत्य कह रही हूँ, वह सपना नहीं था। वह आया था। उसने मेरे अश्रु पोंछे। बोला, ''मत रो माँ! मैं आ गया हूँ। अब मैं तुम्‍हारे साथ ही रहूँगा।'' मैंने कहा, ''पुत्र! तू यहाँ से चला जा। कंस को पता लग गया तो वह तुझे जीवित नहीं छोड़ेगा।'' 
''तो क्या कहा उसने?''
उसने कहा, ''मैं उसे जीवित छोडूँगा तब तो।'' कैसी मधुर मुस्कान थी उसकी। मन हो रहा था कि उसका हाथ पकड़ कर यहीं बैठा लूँ उसे। किंतु विवेक कह रहा था कि उसे शीघ्र से शीघ्र विदा कर दूँ। भेज दूँ उसे यशोदा के पास, जहाँ वह आज तक सुरक्षित था।''
''तो फिर क्या किया तुमने? बैठा लिया या विदा कर दिया?''
''मैंने तो कुछ भी नहीं किया।'' देवकी कुछ उद्विग्न हो उठीं, ''उसने कहा, 'माँ! मैं जा नहीं सकता।'' ''क्यों?'' मैंने पूछा, ''क्या कंस ने तुम्हें भी बंदी कर यहाँ कारागार में डाल दिया है?'' वह हँस कर बोला, ''नहीं माँ! चिंता मत करो, कंस तो क्या, मुझे कोई भी बंदी नहीं कर सकता।'' ''तो फिर तुम जा क्यों नहीं सकते?' ''क्यों कि जाता तो वह है, जो आता है। मैं न आता हूँ, न जाता हूँ। मैं तो सदा रहता हूँ।'' ''सदा रहते हो तो दीखते क्यों नहीं?'' मैंने पूछा। ''जो देखना चाहता है, उसे दीखता हूँ माँ! तुमने मुझे देख लिया न!''

वसुदेव मौन बैठे रहे।
थोड़ी प्रतीक्षा कर देवकी ने पूछा, ''आप अब भी इसे स्वप्न मानते हैं?''
''क्या कह सकता हूँ।'' वसुदेव कुछ आत्मलीन से थे। मंद स्वर में बोले, ''रात्रि वाला प्रहरी चुपके से बता गया है कि अक्रूर, कृष्ण-बलराम को वृंदावन से ले आया है। वे मथुरा में हैं। उन्होंने कल संध्या समय मथुरा में पर्याप्त उत्पात किया है। आज जाने क्या होने वाला है। कंस अवश्य ही उनके चारों ओर किसी-न-किसी व्यूह की रचना कर रहा होगा।...''
''आप अपने पुत्रों के लिए भयभीत हैं?''
वसुदेव ने जैसे अपना अवसाद झटक दिया, ''नहीं! भयभीत नहीं हूँ मैं। तनिक भी भयभीत नहीं हूँ। भय का कोई कारण नहीं है। सृष्टि ईश्‍वरीय विधान से चलती है, कंस की इच्‍छा से नहीं।''
''भय का कारण क्यों नहीं है?'' देवकी ने कुछ चकित हो कर पूछा।
''कृष्ण अपनी इच्छा से मथुरा में आया है। वह अपना वध करवाने नहीं, दूसरों को त्राण देने आया है। कल नगर में दोनों भाइयों ने जितना भी उत्पात किया है, वह इसीलिए किया है कि सारी मथुरा को ज्ञात हो जाए कि कृष्ण आ गया है।...''

* * *

प्रात: सूर्योदय के साथ ही राजकर्मचारियों ने धनुर्यज्ञ-स्थल का परिशोधन किया। सैनिकों तथा आरक्षियों के शव हटाए गए, स्थल को स्वच्छ किया गया। रक्त और माँस के सारे चिह्न मिटाए गए। उसको अलंकृत करने के लिए पुन: सारा आयोजन किया गया।
कोटपाल ने आकर कंस को सूचना दी, ''महाराज! यज्ञस्थल स्वच्छ एवं परिशोधित हो गया है। उसका अलंकरण भी पूरा कर दिया गया है, किंतु धनुष तो टूट चुका है स्वामी!''
''पुराने धनुष को जोड़ा नहीं जा सकता?''
''मुझे तो ऐसा नहीं लगता स्वामी कि हमारे पास कोई ऐसा चतुर कलाकार है, जो उसे इस प्रकार जोड़ दे कि वह पहले जैसा ही कठोर हो सके।'' कोटपाल ने कहा, ''कोई जोड़ भी दे तो...''
''तो क्या?''
''एक बालक भी उसे तोड़ देगा और वह ग्वाला कृष्ण सारा यश लूट ले जाएगा कि उसने महाराज कंस का कोदंड तोड़ दिया।''
कंस ने प्रद्योत को बुलाया, ''क्या हमारे पास धनुष-यज्ञ के लिए कोई भी ऐसा कठोर धनुष नहीं है, जिसे कृष्ण तोड़ न सके?''
''महाराज! हमारे शस्त्रागार में एक से बढ़ कर एक भारी और कठोर धनुष रखे हैं, किंतु यज्ञ के अनुकूल उनका अलंकरण नहीं हुआ है।''
''कोई बात नहीं।'' कंस बोला, ''वह चाहे सुंदर दिखाई न दे, किंतु...'' कंस ने उसे अपनी तर्जनी के संकेत से समझाया, ''कृष्ण उसे तोड़ न पाए।''
''वह नहीं तोड़ पाएगा महाराज! निश्चिंत रहें।'' प्रद्योत ने कहा, ''किंतु इतना समय तो मुझे मिलना ही चाहिए कि उसे लीप-पोत कर यज्ञ-स्थल तक पहुँचाया जा सके।''
''तुम उसे तैयार करवाओ।'' कंस बोला, ''हम मल्लयुद्ध से समारोह का आरंभ करवाते हैं। धनुष-यज्ञ की बारी बाद में आएगी। मल्लयुद्ध के लिए अखाड़े तो सज्जित हैं न?''
''हमारे कर्मचारी सूर्योदय से पूर्व ही वहाँ पहुँच गए थे। यथास्थान मंच रखवा दिए गए हैं। पुष्पमालाओं और झंडियों से सारा क्षेत्र सुसज्जित कर दिया गया है।'' प्रद्योत ने कहा, ''किंतु महाराज! आपने अभी तक कृष्ण और बलराम को बंदी करने का आदेश नहीं दिया है। उन्होंने कल नगर में पर्याप्त उत्पात किया है। प्रशासन और राजसत्ता की छवि उससे कलुषित हुई है। प्रजा उसे राजा की अक्षमता मानती है।'' उसने कंस की ओर देखा, ''इससे पूर्व कि वे आज भी कोई उत्पात करें, हमें उनको बंदी कर लाने के लिए सैनिक भेजने चाहिए।''
''मुझे नहीं लगता कि उन्हें बंदी कर लाने के लिए एक दो वाहिनियाँ पर्याप्त हैं।'' कंस ने कहा, ''और दो उच्छृंखल छोकरों को पकड़ने के लिए, चतुरंगिणी सेना लेकर जाने से भी राजा का सम्मान नहीं बढ़ेगा, और...''
प्रद्योत ने उसकी ओर देखा। ''तुम जानते ही होंगे, नंद पूरा स्‍कंधावार बनाए, यमुना तट पर पड़ा है।'' ''वह ग्‍वाला क्‍या कर लेगा।''
''मैं व्‍यर्थ ही अपने सैनिक मरवाना नहीं चाहता।''
''तो महाराज!''
''उनके लिए दूसरा प्रबंध किया है मैंने।''
''जैसी महाराज की इच्छा।'' प्रद्योत ने कहा, ''किंतु एक बात कहना चाहता हूँ महाराज!''
''बोलो।''
''यह सारी भूल अक्रूर की है। जब वह उन दोनों को ले ही आया था तो उन्हें अपने साथ अपने घर ले जाना चाहिए था।'' प्रद्योत ने कहा, ''अपने घर में रखता। उनको खिलाता-पिलाता। उनका सत्कार करता। तब वे इस प्रकार मथुरा के पथों-वीथियों में उत्पात करते तो न घूमते। उसने तो एक शत्रु का सा व्यवहार किया है। मथुरा लाकर उन्हें खुला छोड़ दिया कि करो उत्पात।''

कंस ने स्पष्ट सहमति प्रकट नहीं की, किंतु विरोध भी नहीं किया, ''एक बार यह धनुष-यज्ञ निबट जाए, उसके पश्चात मैं इस अक्रूर को भी समझ लूँगा। जहाँ तक मैं समझता हूँ, ये दोनों लड़के इस यज्ञ की अवधि में ही निबटा दिए जाएँगे।''
''महाराज की कामना पूरी हो।'' प्रद्योत ने हाथ जोड़ कर प्रणाम किया।

* * *

''आज के लिए क्या विचार किया है कान्हा!'' नंद चिंतित थे, ''पता नहीं यशोदा क्यों हमारे साथ नहीं आई, नहीं तो मुझे तुम्हारी इतनी चिंता नहीं करनी पड़ती।''
''मैया नहीं हैं तो क्या हुआ।'' कृष्ण हँसे, ''बड़ी माँ तो हैं न! मैया के भाग की भी चिंता बड़ी माँ कर लेंगी।''
''चिंता तो मुझे है ही - तेरी भी और राम की भी। अपने भाग की भी, यशोदा के भाग की भी और देवकी के भाग की भी।'' रोहिणी ने कहा, ''तुम लोग उन्हें भूल जाते हो, जो कारागार में बँधे बैठे हैं। हथकड़ी-बेड़ी खोल नहीं सकते, कारागार की शलाकाएँ तोड़ नहीं सकते। तुम लोगों की चिंता उन्हें नहीं है क्या? रक्त के अश्रु बहा रही होगी देवकी!''
''अरे अब तो आप भी मैया के समान बोलने लगीं बड़ी माँ! मथुरा में आते ही आपकी तेजस्विता को ग्रहण लग गया क्या?'' कृष्ण मुस्कराए, ''किसी को नहीं भूला हूँ मैं। किसी को भूलता भी नहीं हूँ। उनके अश्रु भी पोंछ आया हूँ।''
''पवन बनकर गया था क्या? न किसी ने जाते देखा, न आते। न किसी ने कारागार में घुसने से रोका, न निकलने से।'' रोहिणी ने कुछ प्रसन्न दीखने का प्रयत्न किया।
''इस गपोड़ी को रहने दें माँ!'' बलराम बोले, ''पर आप चिंता न करें। आज हम निपटारा कर ही देंगे, इस पार अथवा उस पार।''
रोहिणी काँप उठीं, ''इस पार या उस पार का क्या अर्थ हुआ रे?''
''ओह, बड़ी माँ!'' कृष्ण बोले, ''दाऊ के शब्दों पर मत जाइए। बस यह समझिए कि कंस का बेड़ा पार कर ही देंगे।''
''कान्हा!'' नंद कुछ अवरुद्ध कंठ से बोले, ''मुझे न तुम्हारे अथवा बलराम के बल पर संदेह है, न तुम लोगों के कौशल पर, किंतु पुत्र! यह कंस की नगरी है। चारों ओर प्राचीर है, जिसे तुम्हारे जनक, वसुदेव कब से पार नहीं कर पाए। सैनिक चौकियाँ हैं, व्यूह हैं, चतुरंगिणी सेना है और तुम्हारे पास कोई शस्त्र भी नहीं है। यह कोई बराबरी का जोड़ तो है नहीं पुत्र! मेरा मन बहुत आशंकित है।''
''बाबा! मैं स्वयं नहीं जानता कि कंस की क्या योजना है...।''
बलराम ने कृष्ण को रोक दिया, ''क्या करना है, उसकी योजनाओं को जान कर। हमारी अपनी योजना है कि जो कोई भी शत्रु भाव से आए, उसकी ग्रीवा में एक गाँठ लगा देंगे। इस काम से न मुझे कंस रोक सकता है, न उसकी चतुरंगिणी सेना। आए हैं तो पिता जी और छोटी माँ को कारागार से छुड़ा कर ही दम लेंगे और ऐसा प्रबंध कर देंगे कि फिर उनके जीवन में कभी कारागार जाने का अवसर न आए।''
''दाऊ का कहा हम अक्षरश: पूरा करेंगे। इसमें तो आप कोई संशय करें नहीं।'' कृष्ण बोले, ''अब कुछ बातें मेरी भी सुन लीजिए। मेरे मन में बहुत स्पष्ट है कि हमारा एक ही परिवार है। मैं नंद बाबा और यशोदा मैया का पुत्र कान्हा हूँ। किंतु कंस के लिए, मैं वसुदेव और देवकी का आठवाँ पुत्र हूँ। इसीलिए वह आपके और मेरे साथ एक-सा व्यवहार नहीं करेगा। वह आपको पृथक रूप से बुलाएगा। आप उसकी प्रजा के एक प्रतिनिधि के रूप में जाकर उसे भेंट उपहार देंगे। वह चाहेगा कि आपको वह अपने दर्शकों के मध्‍य सम्मान से बैठाए और मुझसे दूर कर दे। मुझ पर संकट आए तो आप वहाँ बैठे हों, जहाँ से आप मेरी सहायता न कर सकें। आपके साथ आए गोप अपने सत्कार से प्रसन्न होकर पृथक हो जाएँ और मैं और दाऊ उसकी नगरी में एकदम अकेले और असहाय हो जाएँ। यह वह कैसे करेगा, यह अभी मुझे ज्ञात नहीं है किंतु सूचनाएँ आ रहीं हैं। हमारे मित्र लोग सूचनाओं से हमारी सहायता करेंगे और कर रहे हैं। इसीलिए एक बात निश्चित है कि आप कंस के बुलावे पर उसकी प्रजा के प्रतिनिधि के रूप में जाएँ और जो उपहार इत्यादि देने हों दे दें। जहाँ वह बैठाए, वहाँ बैठें और उसके समारोह का आनंद लें।...''
''और तुम कान्हा?''
''मैं और दाऊ एक साथ रहेंगे।'' कृष्ण ने कहा, ''न उसके निमंत्रण की प्रतीक्षा करेंगे, न उसके बताए हुए समय और मार्ग से जाएँगे। हमारे सारे गोपाल हमारे साथ नहीं होंगे किंतु ऐसे स्थानों पर रहेंगे, जहाँ से वे हमारी सहायता के लिए कूद सकें। विशेषकर यदि कंस के पक्ष से बड़ी संख्या में योद्धा आएँ तो हमारे मल्ल उन्हें रोके रह सकें और हम तक पहुँचने न दें।''
नंद की आँखों में अश्रु आ गए, ''पुत्र! हम तुम्हारे साथ नहीं होंगे, तो तुम्हारी सहायता कैसे करेंगे?''
''कंस हमें भ्रम में रखना चाहता है। हम उसे भ्रम में रखेंगे।'' कृष्ण बोले, ''आप उसकी दृष्टि में रहेंगे, किंतु हमारी गोप सेना अदृश्य रहेगी। फिर जैसा अवसर आएगा, वैसा ही करेंगे।''
''इस समय क्या करना है?''
''आप जाने की तैयारी करें। अपने उपहारों के साथ उसके बुलावे की प्रतीक्षा करें।'' कृष्ण बोले, ''गोप सेना को मैं अज्ञात स्थान पर भेज रहा हूँ, जहाँ से वह हमारी सहायता के लिए कूद पड़ेगी। मैं और दाऊ कहाँ जा रहे हैं, यह गोपनीय है।''
''मेरा मन नहीं मानता पुत्र!'' नंद की आँखें अश्रुपूर्ण थीं।
''नंद महर!'' रोहिणी ने पहली बार उनके वार्तालाप में हस्तक्षेप किया, ''कान्हा को वही करने दीजिए, जो वह करना चाहता है। मैं इधर वर्षों से अपने पति से दूर हूँ, किंतु मैं उन्हें भली प्रकार जानती हूँ। आज कान्हा एकदम उनके ही स्वर में बोल रहा है। इसे अपना युद्ध अपने ढंग से लड़ने दीजिए। बस बलराम उसके साथ रहे। दोनों भाई साथ होंगे तो मुझे तनिक भी चिंता नहीं होगी।''
नंद ने अपने अश्रु पोंछ लिए, ''आप कह रही हैं भाभी! तो मैं कान्हा को नहीं रोकूँगा।''
''यह हुई आप लोगों की योजना।'' रोहिणी ने कहा, ''अब मैं भी जा रही हूँ, मथुरा में। मैं अकेली ही जाऊँगी।'' ''आप कहाँ जाएँगी और वह भी अकेली?'' ''मुझे आर्यपुत्र और देवकी के अपने घर आने से पहले घर को साफ़-सुथरा करना है। बहुत दिनों से बंद पड़ा है। उसे रहने योग्‍य तो बना लूँ।''
''वहाँ तो कोई सेवक भी नहीं होगा, तो फिर आप...?'' ''उसका प्रबंध हो जाएगा, आप मेरी चिंता न करें नंद महर!''

* * *

कृष्ण और बलराम अपना मुँह-सिर लपेटे, स्वयं को पूर्णत: छिपाए और कुरूप वेश अपनाए हुए, त्रिवक्रा के घर में प्रविष्ट हुए।
त्रिवक्रा दस्यु जैसे दो लोगों को इस प्रकार अपने घर में प्रविष्ट होते देख, डर गई।
''कौन हो तुम लोग?''
''तुम्हारे शत्रु नहीं हैं।'' कृष्ण ने कहा।
''पर मित्र भी नहीं लगते।'' त्रिवक्रा बोली, ''मित्र होते तो इस प्रकार क्यों आते?''
''अपने मित्रों को पहचानो सखि!'' कृष्ण ने मुख पर लपेटा वस्त्र हटा दिया।
''ओह तुम प्रियदर्शन!'' त्रिवक्रा चकित थी, ''इस प्रकार क्यों आए?''
''ताकि कोई जान न सके कि हम तुम्हारे घर आए हैं। हमें तुम तक पहुँचने से कोई रोक न सके, किंतु जब निकलेंगे तो सब देखेंगे कि हम तुम्हारे घर से गए हैं।''
''मैं इतना ही जान पाई हूँ कृष्ण कि कंस तुम्हें किसी शस्‍त्र से नहीं, पशुओं से मरवाने की योजना बनाए बैठा है।'' त्रिवक्रा ने कहा, ''मैंने बहुत हाव-भाव दिखाए, हेला का भी सहारा लिया, किंतु उसके मुख से इससे अधिक और कुछ नहीं निकलवा पाई।''
''इतना ही पर्याप्त है।'' कृष्ण मुस्करा रहे थे, ''अब हमें अच्छे वस्त्र दो। चंदन और अंगराग दो। हमें महाराज कंस के धनुर्यज्ञ में जाना है। राजाओं, राजकुमारों, मंडलेश्वरों तथा राजपुरुषों की सभा में जाना है। हमारा वेश भी राजसी होना चाहिए।''
''मेरा सौभाग्य।'' त्रिवक्रा अत्यधिक प्रसन्न थी, ''ऐसा सौभाग्यशाली दिन तो मेरे जीवन में आज तक आया ही नहीं। तुम मुझसे मेरे प्राण भी माँग लो, तो आज्ञापालन में एक क्षण नहीं लगाऊँगी।''

कृष्ण तथा बलराम ने स्नान किया। नए वस्त्र धारण किए। चंदन और अंगराग लगाया।
''तुम धनुर्यज्ञ देखने नहीं चलोगी?''
''तुम्हें संकटों से जूझते नहीं देख सकूँगी। प्राण निकल जाएँगे मेरे।'' त्रिवक्रा ने कहा, ''मैं अपने घर पर ही तुम्हारी प्रतीक्षा करूँगी।''

* * *

कृष्ण और बलराम निर्विघ्न यज्ञस्थल तक पहुँच गए। धनुर्यज्ञ वाला स्थल इस समय जन-शून्य जैसा ही था। कुछ थोड़े से राजकर्मचारी स्थान और धनुष का परिशोधन इत्यादि कर रहे थे। वे जानते थे कि राजा को वहाँ नहीं आना है, अत: उनमें किसी प्रकार का कोई उत्साह नहीं था। बँधे-बँधे से वहाँ बैठे समय के व्यतीत होने की प्रतीक्षा कर रहे थे।
''आपके महाराज कहाँ हैं?'' कृष्ण ने पूछ ही लिया।
''महाराज मल्लयुद्ध देखेंगे।'' मुखिया बोला, ''जब उन गँवार गोपों ने धनुष ही तोड़ दिया तो यहाँ की शोभा ही क्या रही।''
उसने सिर उठा कर देखा। कुछ क्षण उनको निहारता रहा और फिर उसके चेहरे का वर्ण पीला पड़ गया, ''तुम वही तो नहीं हो...।''
''वही हैं।'' बलराम बोले, ''और तूने हमें गँवार कहा...।''
कृष्ण आकर मुखिया के सामने खड़े हो गए, ''नहीं दाऊ! इसे क्षमा कर दो। यह एक अहंकारी राजा का मूर्ख कर्मचारी है।''
मुखिया काँप रहा था।
''डरो नहीं।'' कृष्ण बोले, ''हमें बता दो कि कंस कहाँ होगा।''

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