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हास्य व्यंग्य

 

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इस इंटरव्यू को लेकर वह कई दिनों से उधेड़बुन में है। जाए न जाए। पहले तो लगता रहा था कि बुलावा ही नहीं आएगा। वह अपने आप को इस स्थिति के लिए तैयार करती रही। इसके अतिरिक्त और कौन-कौन-सी कंपनियाँ हैं जहाँ वह आवेदन कर सकती है। कितने कम पैसों मे वह गुज़ारा कर सकती है। बड़ी कंपनी यानी बड़ा पैसा यानी बड़ी प्रतियोगिता। उसके लिए कितनी गुंजाइश बचती है, वह हिसाब लगाती रही थी और अब जब इंटर्व्यू में एक सप्ताह रह गया है वह इस जुलूस में अपनी किस्मत जानने आई है। तीन पत्ती मिली तो एयर टिकट बुक करवा लेगी।

सहसा उसकी नज़र अपने दूसरी ओर आकर खड़ी हो गई बारह-तेरह साल की मोटी-सी, जो शायद स्पैनिश थी, बच्ची पर पड़ी। उसके दोनों हाथ बैसाखियों पर टिके थे और चेहरे पर गहरी उदासी थी। पहला ख़याल जो सुषमा के मन में आया वह यह था कि यदि यह बैसाखियों पर न होती तो मोटापे की समस्या का इलाज करवा रही होती। पिज़्ज़ा खा खाकर मोटे हुए माँ बाप बच्चों को असमय ही मोटापे की समस्या का शिकार बना देते हैं। लेकिन उसकी बगल में खड़ी स्त्री मोटी नहीं थी।

सुषमा की कुर्सी की ठीक बगल में उस लड़की ने जगह ली। उसकी आँखें सुषमा से मिलीं लेकिन सुषमा की मुस्कुराहट के प्रत्युत्तर में वह स्त्री मुसकराई। वह लड़की नहीं। सुषमा को एक अजीब-सी बेचैनी महसूस हुई। वह उसकी उदासी को समझ सकती थी। जहाँ आगे की लाइन में खड़े बच्चे उछ्ल-उछलकर मालाएँ लूट रहे थे, खुशी से चिल्ला रहे थे, यह लड़की प्रस्तर-प्रतिमा-सी अपनी बैसाखियों पर बस खड़ी थी। सुषमा को हैरत हुई कि क्यों नहीं इसकी माँ या अभिभाविका, जो भी यह औरत है, आगे बढ़कर कुछ बीड्स, कुछ चॉकलेट इसके लिए बटोर लाती है। वह तो ऐसा कर ही सकती है। या कि इसे पीछे ही रोके रखने के लिए, कि यह भीड़ में अपनी और दुर्गति न कराए, वह पीछे खड़ी है?

जुलूस अपने चरम पर था। सारी चीज़ें अगली पंक्तियों में खड़े लोगों द्वारा लपक ली जातीं। अभी तक सुषमा तक कुछ नहीं पहुँचा था। और कुछ नहीं तो भी उसे एक तीन पत्ती तो चाहिए, सोचती हुई वह अपनी कुर्सी से उठ कर कुछ आगे बढ़ गई।
बस थोड़ा ही बढ़ी थी कि एक चाकलेट कैंडी ठीक उसके पैरों के पास गिरी। वह कोई बच्ची तो नहीं, जो लालीपॉप खाए। उसने वह चाकलेट पीछे मुड़कर उस बच्ची की तरफ़ बढ़ा दी "दिस इज फॉर यू।"

उस बच्ची के उदास चेहरे पर एक क्षीण मुस्कराहट बिजली की चमक-सी कौंधकर पल भर में विलीन हो गई।
सुषमा ने फिर जुलूस की तरफ़ नज़र दौड़ाई। लगता नहीं कि उसके हिस्से में कुछ आनेवाला है। इस बार गुज़रती गाड़ियों में विज्ञापन ज़्यादा हैं। शैमरॉक के डिज़ाइन ज़्यादा हैं लेकिन कुछ वैसा दर्शकों की तरफ़ नहीं आ रहा। लेकिन शायद यह भी सच नहीं था। छोटी-सी ट्रक पर बैठे दो बच्चों ने शैमराक के आकार के बैलून फुलाए और एक-एक दोनों दिशाओं में दर्शकों की तरफ़ उछाल दिए। एक बच्चे और दूसरी ओर एक लंबे आदमी द्वारा वे हवा में ही लपक लिए गए। सुषमा मायूस हो गई। बस इतना ही तो चाहिए था उसे फिर तो वह वापस हो लेती। क्या पता उसी तरह यह बच्ची भी कुछ ऐसा ही सोचकर यहाँ आई हो। उसने मुड़कर बच्ची की तरफ़ देखा। वह चेहरा भावहीन था। जैसे कोई उम्मीद कहीं बची ही न हो।

सुषमा आगे बढ़कर पहली लाइन में खड़े बच्चों की पंक्ति के ठीक पीछे आ गई। बस एक तीन पत्ती, बाकी सबकुछ वह उस बच्ची को दे देगी। तीन पत्ती मिली तो वह इंटर्व्यू के लिए जाएगी वरना नहीं। इतनी दूर बोस्टन जाओ, जब कि वहाँ बर्फ़ पड़ रही है, और अगर होना ही नहीं है तो क्या ज़रूरत है ज़हमत उठाने की।

एक सुनहली माला उस तक आ कर गिरी। यह भी शुभ शगुन है, उसने सोचा और फिर पीछे जाकर माला उस बच्ची को दे दी। यह उसकी पहली माला थी। उसने गले में डाल ली। अबतक अगली पंक्ति के बच्चे मालाओं से लद चुके थे। हरी, सुनहली , नीली , पीली , लाल, बैगनी - हर रंग की मालाएँ। पालिथीन चाकलेटों से भरे।
विपरीत दिशा में देख रही, उसके पैरों से फिर कुछ टकराया। सफ़ेद मोतियों की माला!
इसे वह अपने लिए रखेगी।
पीछे खड़ी बच्ची के गले में अब दो मालाएँ थीं। एक उसके साथ की स्त्री ने उठाई थी।
अगली दो चाकलेट फिर सुषमा ने बच्ची को दे दी। वह फिर मुस्कराई। लेकिन थैंक्यू जैसा कोई शब्द उसके मुँह से नहीं निकला। शायद वह बाकी बच्चों से अपनी तुलना कर रही थी जो मालाओं, चाकलेटों ,और तरह-तरह के पैकेटों, टी शर्ट आदि से लदे फंदे खुशी से कूद रहे थे।

गाडियाँ गुज़रती रहीं। अब वे पीछे खड़े लोगों को लक्ष्य कर रहे थे। बहुत कुछ पीछे भी पहुँच रहा था। सुषमा फिर से पीछे ह्ट आई थी। और एक-एक कर कई मालाएँ वह बटोर चुकी थी। हर गाड़ी के गुज़रने के साथ उसकी मायूसी बढ़ती जा रही थी। कोई तीन पत्ती उसे नहीं मिलनेवाली। हालाँकि ऐसी मालाएँ भी फेंकी गई थीं जिनमें तीन पत्ती यानी शैमरॉक गुँथे हुए थे। उसमें से कुछ भी सुषमा तक नहीं पहुँचा था। एक घंटे के जुलूस का तीन चौथाई पार हो चुका था।
सुषमा को लौटना था।
सहसा बारिश शुरू हो गई। लोग भागने लगे। सुषमा ने अपनी मालाएँ गिनीं। एक में सिक्स फ्लैग का कूपन था। दूसरे से फ़ूलों के आकार की सुगंधित मोमबत्तियाँ लटक रही थीं एक कूपन के साथ कि वह अपनी मोमबत्ती इस दूकान पर आकर ले जाए। यानि कि जो उसे चाहिए था उसके सिवा बहुत कुछ मिल गया था उसे लेकिन उसके अंदर का विश्वास जगाने के लिए कुछ नहीं। एक-एक कर सारी मालाएँ उसने गले में डाल लीं। उसने पीछे लौटते हुए देखा, उस बच्ची के गले में भी तक़रीबन इतनी ही मालाएँ थीं, हालाँकि वह अपनी जगह से हिली भी नहीं थी, सिवाय एक बार के, जब एक पीली माला उन दोनों के बीच आ कर गिरी थी और सुषमा ने उससे कहा था "टेक इट।" तब उसने झुक कर माला उठा ली थी।
चमकती हुई, शीशे की मोतियों की मालाओं की तरह उस लड़की का चेहरा प्रसन्न्नता से चमक रहा था। मालाओं की चमक शायद अब उसके अंदर भरने लगी थी। चेहरे पर शांति थी। वह मुस्करा रही थी।
सुषमा ने अपनी बाकी चाकलेट्स भी उसे दे दीं। इतने चाकलेटों का वह करेगी क्या। किसी पर शैमरॉक का चिन्ह भी नहीं!. . .
बच्ची ने पहली बार उसे "थैंक यू" कहा।
शायद उसे उसका इच्छित सबकुछ मिल गया था!
भागते हुए लोगों में वह वृद्धा भी थी जिसने हरा चश्मा पहना था - शैमराक की डिज़ाइन का। " यह क्या बारिश होने लगी।" वह सुषमा से अंग्रेज़ी में बोली।
"मैं भारतीय हूँ। हमारे यहाँ ऐसी हल्की बारिश को लोग शुभ मानते हैं।" सुष ने कहा।
"अच्छा।" वह वृद्धा प्रसन्नता से मुस्कराई।
"हाँ। आपको मानना चाहिए कि यह सेंट पैट्रिक्स डे हैप्पी होने वाला है।"
"हैप्पी सेंट पैट्रिक्स डे।" वह हँसी।
कुछ हो न हो, सुषमा ने सोचा, उस वृद्धा का विश्वास उसने दुबारा जगा दिया है। अपनी मान्यताओं से जोड़कर। जबकि वह खुद इस बात में यकीन नहीं करती !

आकाश काले बादलों से भरता जा रहा था। वसंत का स्वागत करते पेड़ों में नई पत्तियाँ थीं लेकिन उनका घने छायादार स्वरूप में ढलना बाकी था कि कोई उनके नीचे खड़ा होकर खुद को बारिश से अंशत: ही सही, बचा सके। सुषमा और वह वृद्धा कुछ दूर तक साथ-साथ पार्किंग लॉट में चलते रहे। काले आसमान के नीचे ,सुषमा को उसकी दूधिया हँसी बहुत पवित्र-सी लगी। उसे घर जाना था। बाकी बचे काम निबटाने थे। वह वृद्धा शायद कुछ और कहना चाहती थी लेकिन सुषमा आगे बढ़ ली। नीचे हरा रंग अब भी सब तरफ़ फैला था। भागते हुए लोग एक हरी दीवार की मानिंद नज़र आ रहे थे। बैसाखियों पर खड़ी लड़की अब भी गले में मालाएँ पहने शांत भाव से खड़ी मुसकुरा रही थी। शायद उन लोगों की कार आस-पास ही कहीं थी। सुषमा ने सोचा, जाने दो। इंटरव्यू वह दे देगी। घर लौटकर पहला काम एयर टिकट बुक करना। फिर इंटरव्यू की तैयारी। आज का दिन तो बीत गया। एक दिन यात्रा का। तो बस पाँच दिन बचे हैं। ठीक से तैयारी करेगी। चयन हो न हो ! जाने का खर्च तो कंपनी दे ही रही है। और उसे क्या करना है। कड़ी प्रतियोगिता है इसीलिए साहस मरा हुआ है लेकिन यदि सफल हुई तो बॉस्टन अच्छी जगह है। बड़ा पैसा भी है। चलो, छोड़ो, वह भी क्या अंधविश्वास पाल रही है!

सहसा उसने महसूस किया कि बैसाखियों पर सिर्फ़ वह लड़की नहीं वह खुद भी खड़ी थी और कई सारे अन्य लोग। फ़र्क इतना है कि आज उसकी बैसाखियाँ उतर गईं। वह मुक्त है -अपने पाँवों से चलने को स्वतंत्र!

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24 मार्च 2007

 

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