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एक बार मन में विचार आया कि बड़े मामा के बेटे को अपने गाँव का बता कर किसी अफ़सर के यहाँ लगवा दूँ। खाना-कपड़ा के अलावा हज़ार, डेढ़ हज़ार पा ही जाएगा। गाँव में पड़े-पड़े क्या करेगा? थोड़ी-सी ज़मीन-जायदाद से खाने को लाले पड़े रहते हैं। फिर सोचता कि बात छिपेगी भला? और सबसे बड़ी बात तो यह थी कि मामा इसके लिए तैयार होंगे? हरगिज़ नहीं। मैं उनके स्वभाव से परिचित था। अशिक्षित लोग बेमतलब की बातों को मान-सम्मान से जोड़ लेते हैं। मैं जानता था, वह सुनते ही बिगड़ जाएँगे और कहेंगे, ''यही सब करेगा मेरा बेटा। मैं मर गया हूँ का? जिसका भाई एतना बड़ा अफ़सर, ऊ झाडू लगाएगा? बरतन धोएगा?'' मैं मन ही मन सकपकाता, इस विचार को झटकता और फिर अपने ख़यालों का मज़ाक उड़ाते हुए खुद को चिढ़ाता, ''तो क्या अफ़सर बनेगा?''

छोटे मामा की अलग समस्या थी। उनकी चार बेटियाँ थीं। खेती-बारी से नून-रोटी का जुगाड़ मुश्किल से हो पाता था। वह बड़ी बेटी की शादी करना चाहते थे, परंतु हाथ खाली होने के कारण निर्णय नहीं ले पा रहे थे। पिछली बार मुझसे दस हज़ार रुपए उधार माँगे थे। मैंने मना कर दिया था। क्योंकि पिछला उधार अभी तक चुकाए नहीं थे। तब छोटे मामा सूजा हुआ मुँह लेकर लौट गए थे।

दो साल पहले वह मुझसे दो हज़ार रुपए ले गए थे, साल भर में लौटाने का करार कर के। परंतु अब तक लौटा नहीं पाए थे। कहाँ से लौटाते? कोई आमद तो थी नहीं। नाना ज़िंदा थे तो गाय, भैंसे, बकरियाँ पालते थे। दूध, दही, गाय, भैंस, बछड़ों या बकरियों के बेच कर अपनी गृहस्थी चला लेते थे। नाना के मरते ही दोनों मामियों ने घर में ऐसा महाभारत शुरू किया कि जल्द ही दो चूल्हे जलने लगे। खेत बँटे तो जानवर भी बँटे। नाना की तरह जानवरों को चराने वाला कोई था नहीं। लिहाज़ा एक-एक कर वे बिकते गए। तब नानी, छोटे मामा के हिस्से में आ गई थीं।

मेरी अपनी समस्याएँ थीं। अब बच्चे बड़े बाल बिखरे हुए। देख कर ही घिन्न आती है।''

मेरी बीवी, भौजाई की सेवा, तत्परता से विभोर होने के बजाय, पिंड छुड़ाने के फिराक में ज़्यादा रहती। ख़ासकर रसोई के कामों से। पर भौजाई थीं कि टकसने का नाम न लेतीं। बिना कहे किसी न किसी काम में स्वयं को लगा लेतीं। में जब तक उनके सेवाभाव के पीछे रहस्य को भाँप पाता, वह एक दिन बोल पड़ी, ''बाबू! हाथ खाली चल रहा है। लड़के कहीं लगे नहीं। ज़र-ज़मीन के बारे में आप जानते ही हैं। माया की शादी करनी है। लड़के वाले साठ हज़ार माँग रहे हैं। आपके भाई, बहुत परेशान रहते हैं। रात में उन्हें नींद नहीं आती। शरीर गल गया है। दमा ने ज़ोर पकड़ लिया है। खेती ठीक से नहीं कर पा रहे हैं। कईसे काम चलेगा, समझ नहीं पा रही हूँ?'' बोलते-बोलते सुबकने लगीं थीं भौजाई। मेरी ओर से सहानुभूति के शब्द न निकलते देख, फिर धीरे से बोलीं, ''कुछ मदद कीजिए बाबू! ज़्यादा नहीं, बस दस हज़ार की। धीरे-धीरे लौटा दूँगी।''

मैं भौजाई की बात सुनकर सकपका गया। कहाँ से लौटाएँगी? माँगते-माँगते थक जाना पड़ेगा। संबंधों में ऊँच-नीच होगा सो अलग।

मैं जितने दिन गाँव रहता, अपेक्षाओं के भार से हल्का हो जाता। बाबू जी की अपेक्षाएँ अलग थीं। यद्यपि घर की हर आवश्यकता मैं पूरी कर देता, हर महीने उन्हें दो हज़ार रुपए भेज देता, लेकिन बाबू जी इससे संतुष्ट नहीं होते। उन्हें बटाईदारों से इतना अनाज मिल जाता कि तीस-चालीस हज़ार का बेच लें। फिर भी वह हर बार बखेड़ा खड़ा कर देते। लोगों को सुना-सुना कर मुझे कोसते, ''धान-गेहूँ बेच कर काम चला रहा हूँ। लड़िका लोग के भरोसे गृहस्थी नहीं चल रही है। जो ये लोग देते हैं, तंबाकू भर का होता है। नून, तेल, दवा, खेती-बारी के लिए मुझे इस उमिर में काम करना पड़ता है। कवनो सुख नहीं है बेटा लोग से।''

माँ इस मामले में ज़्यादा समझदारी से काम चलाती। वह इस प्रसंग पर बाबूजी से लड़ जाती, ''पइसा, पइसा किए रहते हैं रात-दिन। का करेंगे? बाँध के ले जाएँगे? सब बेटे करते हैं, पर रात दिन बेटों को कोसते रहते हैं। कभी प्यार से नहीं बोलते। गाँव-जवार में घूम-घूमकर शिकायत करते रहते हैं। कवनों लाज-शरम नहीं है इनको।''

आख़िर बाबू जी करते क्या हैं रुपयों का? मैं अक्सर सोचता रहता। बाद में मुझे जानकारी मिली कि वह सूद पर रुपए चलाते हैं। महाजनी शुरू कर रखी है। जो काम बबुआन लोग करते हैं, वही बाबू जी कर रहे हैं। पर वह हिसाब-किताब कैसे रखते होंगे? बबुआन लोग तो बकायदा रजिस्टर में अँगूठा लगवाते हैं। दबंगाई के कर्ज़ वसूल लेते हैं। बाबू जी किस बल पर यह काम कर रहे हैं? बुढ़ापे में अनपढ़ आदमी को यह काम नहीं करना चाहिए।

एक बार मैंने बाबू जी को समझाने की कोशिश की थी, ''सूदखोरी का काम आप को नहीं करना चाहिए। सूदखोरी गरीबों का खून चूसते हैं और वैसे भी आप की उम्र ज़्यादा हो गई है। कोई रुपए न लौटाए तो?'' पर बाबू जी मानते नहीं। मुझसे लड़-झगड़ कर जो रुपए लेते, वह सूद पर चलाते। यह कार्य मुझे भाता नहीं। स्वयं बाबू जी को मालूम है कि साहूकार के थोड़े से कर्ज़ के सूद से वह पंद्रह साल में मुक्त हुए थे। मैं सोचता, अब बाबू जी को किस चीज़ की कमी है? क्यों पैसों के पीछे भागते रहते हैं? इस उम्र में उन्हें सारी चिंता छोड़ मेरे पास रहना चाहिए। आराम करना चाहिए। लेकिन बाबू जी को समझा पाना आसान न था।

बाद में मैंने बाबू जी को रुपए देने बंद कर दिए और माँ के हाथों में घर-गृहस्थी के वास्ते रुपए पकड़ाने लगा।

धीरे-धीरे मैं गाँव के लोगों की बातों से ऊबने लगा था। मुझे हर किसी की बात चाटुकारिता लगती। गरीबी, भूख और बीमारी की भयावहता तो गाँव में थी। पर इसे मैं दूर नहीं कर सकता था। आगे बढ़ने का यह मतलब तो था नहीं कि अपना सब कुछ लुटा दिया जाए? और ऐसा कर के भी तो समस्या ख़त्म नहीं होने वाली थी।

इस बीच मेरे गाँव के मेधावी लड़के, प्रमोद की बीमारी ने मुझे खुद की आवश्यकताओं, सीमाओं को तोड़ने को बाध्य कर दिया। प्रमोद के बाबू जी, में बस गए, अब बहिन को कइसे याद रखेंगे?'' बड़ी दीदी ने अपनी पीड़ा और ताने को माँ से कह दिया था।

पट्टीदारी की भौजाई बारी-बँसवारी में महिलाओं को सुनाती फिरतीं, ''पट्टीदारी को कौन पूछता है? दुवार लीपते-लीपते बुढ़ा गई, उनकी टहल-टकोरी करती रही पर मेरी ओर निगाह नहीं किए साहब।''

इसी बीच गाँव के पुरोहित, बाबू जी को अलग उकसाने में लगे थे, ''अरे साहब को समझाइए भगत जी। धन कमाया जाता है पुण्य के कामों में लगाने के लिए, इधर-उधर छींटने के लिए नहीं। ऐसा काम किया जाता है जिससे खानदान का नाम रोशन हो, लोग माँ-बाप का नाम आदर से लें।'' फिर कुछ क्षण के लिए रुक गए पुरोहित। माथे पर हथेली को फिराते हुए कुछ सोच कर बोले, ''काहे ना साहब आपके नाम से गाँव में एक मंदिर बनवा देते हैं। ज़िंदगी भर लोग नाम गाएँगे भगत जी। इह लोक और परलोक दोनों सुधर जाएगा।''

बाबू जी को पुरोहित की बात पसंद नहीं आई। वह सोचने लगे, मंदिर से का भला होगा? माना कि बेटे ने पैसा लुटाया है, पर बुरा काम तो नहीं किया है? पुरोहित खामखाह आग लगा रहे हैं।
परंतु इसका यह मतलब नहीं कि बाबू जी का गुस्सा उतर गया था।

बाबू जी की पीड़ा अंदर-अंदर सुलगती रहती। जब कोई कर्ज़ माँगने आता तो भभक पड़ते, ''मेरे पास रुपिया कहाँ है? बेटा लोग कानी-कौड़ी नहीं देते हैं। परमारथ से कुछ बचे तब न।''

दशहरा की छुट्टियाँ यों ही गुज़र गई थीं। बोझिल और उखड़ी हुई। कभी किसी से खुल कर बात नहीं हुई। रिश्ते मुझे तौलना चाहते थे और मैं मेढ़क की तरह उनकी तराजू से छिटक जा रहा था। ऐसे माहौल में पता नहीं बीवी-बच्चों ने कैसा महसूस किया होगा, मैं जान नहीं पाया था।

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16 अक्तूबर 2007

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