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उसे याद है जब बच्चे छोटे थे तब भी वह इन छुट्टियों का बेसब्री से इंतज़ार करती, बिल्कुल बच्चों की ही तरह। वही नहीं, सागर सुषम और तनुष तक। कितना मज़ा आता था, उन्हीं कुछ दिनो में वह सामान्य दिनचर्या यानी घर की देखभाल, साफ़-सफ़ाई, बच्चों की माँगे पूरी करने का काम, स्कूल तथा कॉलेज की तैयारी करवाने का काम, होमवर्क परीक्षा के समय की तैयारी जाने किस-किस की कौन-सी व्यस्तता से बाहर निकल पाती थी। योजना बन जाने पर वह जाने कितनी नई लेकिन मज़ेदार व्यस्तताओं में जुट जाती। पहले बाज़ार, एक लंबी फ़ेहरिस्त के साथ ताकि हिल स्टेशन जाने की सारी सामग्री एकत्रित की जा सके और वह एक अच्छी गृहस्थिन के साथ एक अच्छी माँ भी साबित हो सके। बच्चों की एक प्रशंसाभरी निगाह उसके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि थी। आरती के मन के काग़ज़ पर इस तरह की बिताई छुट्टियों के अनेक नक्शे थे। उस समय खींची गई तस्वीरें मात्र काग़ज़ के टुकड़े न थे अपितु उसके प्रिय लम्हों की ढेर-सी यादें थीं, उनमें थी बहुत-सी खुशी, उजाले का बुग्गा और था तरल बहता दरिया जो जब तब मन को गीला कर देता।

आज भी आरती पिछले बीते महीनों की घिसी-पिटी दिनचर्या से भाग निकलने की योजना बच्चों के सामने रखना चाह रही थी पर मन था कि झिझक रहा था हालाँकि आज मौका अच्छा था। पिछले बीते तीन वर्ष उसके गले में अटके रहने लगे थे। "पर बच्चे तो मेरे अपने ही हैं न, मैंने ही पैदा किया हैं। मेरे दिए संस्कार हैं उनमें, ज़रा-सी चोट खाते थे तो मुझसे लतर-सा चिपक जाते थे। मैं ही तो उनका सुरक्षा कवच थी, उन से बात करने में झिझक कैसी। आरती ने सोचा, हिम्मत जुटाई फिर झिझकते हुए बात शुरू की। बात! बात भी कौन-सी, आने वाली गर्मी की हवा में फ़ैलते सूखेपन की, झरते पत्तों की। यही बातें करती हुई वह चाय पीती रही थी, बच्चे चाय पीते-पीते हूं-हां करते रहे। अशोक हमेशा की तरह अख़बार में घुसे रहे थे। चाय ख़त्म हो चुकी थी। दूसरे कप की तलब होने लगी थी। आरती यों तो सवेरे-सवेरे चाय का दूसरा कप पीना नहीं चाहती थी पर एक तो ठंड, दूसरे, बात शुरू करने के लिए गला तर करना चाह रही थी। चाय का दूसरा कप शायद कुछ हिम्मत दे दे।

अजीब था पर सच यही था कि आजकल उन्हे अपने बच्चों से बात करने के लिए ही हिम्मत जुटानी पड़ती थी, ख़ासतौर पर उन बातों के लिए जिन्हें वह अपने तरीके से मनवाना चाहती थी। रसोई की ओर जाते हुए आरती मन ही मन अपनी विवशता पर उबलने लगी थी। चाय का पानी उबलने तक तो उसके भीतर का उबाल पूरे जोश पर था। बच्चे बड़े हो गए हैं, खुद वह उम्र में उनसे काफ़ी दूर निकल चुकी है। पिछले पचीस वर्ष बहुत खुशनुमा चाहे न हों पर बुरे भी तो नहीं कहे जा सकते हैं। वह एक सुघड़ पत्नी गृहिणी माँ बन कर जीती रही है, पर अब पिछले तीन वर्ष से असंतोष गिलोय की लतर-सा उसके तन मन में फ़ैलता जा रहा था।

'आख़िर बच्चे क्यों नहीं समझते। कुछ भी, कोई भी फ़ैसला करते हुए मेरी पसंद नापसंद का ध्यान ही नहीं रखते। हमेशा मुझे, मेरे नज़रिए को नज़रअंदाज़ क्यों कर देते हैं। अब वे छोटे तो नहीं हैं, जब छोटे थे तब सोचती थी जब बड़े हो जाएँगे, समझ बड़ी हो जाएगी, मानसिकता परिपक्व हो जाएगी तब समझ लेंगे। पर कहाँ! ये तो उसी प्रकार कल्पना रही जैसे मैं सोचती रही कि बच्चों के बड़े होने पर कुछ वक्त अपने लिए बच पाएगा, नहीं, बच्चों की बढ़ती उम्र के साथ, उनकी बढ़ती माँगो के साथ उसका वक्त हमेशा रहट-सा चलता रहा। और वह एक अच्छी माँ की शर्तो पर पूरी उतरने की कोशिश में हर पल जुटी रहती है, बनी रहती है एक अच्छी माँ!' चाय का पानी उबलने लगा था। उसमें दूध चाय की पत्ती, चीनी घोलती हुई वह अपने मन में उमड़ते घुमड़ते विचारों को भी उसमें मिलाती रही।

'क्या विडंबना है, बच्चे मुझमें एक अच्छी माँ खोजते हैं, अशोक एक सुघड़ पत्नी और गृहिणी और मैं अपने लिए कुछ क्षण कभी बच्चों से प्यार के कुछ बोल, कभी अशोक की एक निगाह जिसमें मेरी पसंद अहमियत रखती हो, पर कहाँ। चाय प्यालों में डाल कर ट्रे में रख आरती डाइनिंग टेबल की ओर आ गईं। अपने प्याले को उठाया और घूँट-घूँट पीने लगी मानो चाय चाय नहीं मन में आए कड़वे मीठे भाव पी रही हो। मन ही न किया अत: किसी से नहीं पूछा। असल में मन पर ढेर-सी बदली घिरी थी।

अशोक अब तक चाय के साथ अख़बार पी चुके थे। वे मध्यम व्यक्तित्व के इंसान थे जिनकी मानसिकता भी आम आदमी की थी। सामान्य जीवन पद्धति, सामान्य आकांक्षाएँ, साधारण पहनावा, सरल सीधी दिनचर्या यानि सब कुछ सीधा सामान्य। उन्हें कभी कुछ सनसनीखेज़ करने की इच्छा न होती, न उन्होंने कोई इच्छा प्रकट की न कोई सुझाव दिया। अशोक ने अख़बार रख दिया था। उन्हें खाली व रिलेक्स देख कर ही वह बोली, "सुनिए! अशोक, जनवरी में ही हमें गर्मी की छुट्टियों का प्रोग्राम तय कर लेना चाहिए वरना बुकिंग वगैरह नहीं मिलेगी। आख़िरी वक्त पर भागदौड़ मच जाएगी।" अशोक ने अपने बाइफोकल चश्में को साफ़ किया, कुछ सोचा और बोले, "हूं! उं-उं! सोच लो, प्लान कर लो फिर देख लेंगे।"

अशोक का उत्तर हमेशा कुछ ऐसा ही या यही होता। आरती का प्रश्न कैसा भी हो उत्तर में वही ढीलापन। सालों साल बातचीत का यही स्तर था, कुछ भी तो न बदला था। हालाँकि बदला तो था दोनों पति पत्नी के शरीर स्थूल हो आए थे, चेहरे पर झुर्रिया पड़ गई थीं। चश्में के नंबर बदल गए थे, वे बाइफोकल हो गए थे वगैरह-वगैरह। बच्चों से संबंध के तंतु भी तो बदले थे, पहले बच्चे उनकी उँगली पकड़कर चलते थे। अब अपने पैरों पर नहीं परों पर आज़ाद पंछी-सा उड़ने लगे थे। आज तो यह कहना भी अतिशयोक्ति न होगा कि अब बच्चे उनके द्वारा किए प्रश्नों का उत्तर देने में कतराते बल्कि बुरा भी मान जाते। अपने पैरों पर खड़ा होकर अपने फ़ैसले खुद करने का अधिकार माँगते जिसके कारण घर में प्राय: तनाव हो जाता। अशोक आरती की बनाई गई योजनाओं को चुपचाप तब तक मान लेते जब तक वे उसकी दिनचर्या या उनकी मानसिकता के विरोध में न आतीं।

आज सुबह आरती की निगाह जब अशोक पर पड़ी उसके मन में हमेशा की तरह उनका अनाकर्षक तथा साधारण चेहरा खटका। 'कल नववर्ष की पार्टी पर ही तो मिले थे, अशोक के बॉस। अशोक से पाँच वर्ष बड़े पर क्या स्मार्ट! कितना यंग लगते हैं। चाल ढाल में तेज़ी और ताज़गी, माथे पर गिरती बालों की लटें उन्हें कितना आकर्षक और यंग बना देती हैं। सलीकेदार कपड़े पहने जब वह किसी प्रोजेक्ट पर बात करते हैं तो उनके द्वारा इस्तेमाल वाक्यों पर तालियाँ बजाने को मन करता।' आरती न चाहते हुए भी मन ही मन अशोक की तुलना उसके बॉस से कर लेती पर फिर मन ही मन जनमते 'गिल्ट' के भाव से दुखी भी होती।

अशोक बदल भी ख़ासा ही गया था। उसकी आँखों का नीलापन जो शादी के समय उसका आकर्षण और वैशिष्ट्य था अब पीला हो गया था। अब उसकी आँखे बुझी-बुझी-सी रहने लगीं थी। वैसे वह नीलापन सुषम की आँखों में उतर आया था। आरती अशोक की ओर सीधी निगाह से कभी न देखती। देखकर जो निराशा जन्म लेती उससे वह डर जाती। यह सोच तो और भी उदासीन करती कि यह व्यक्ति उसका पति है जिसके साथ वह जीवन के पचीस वर्ष बिता चुकी है जो उसके तीन खूबसूरत बच्चों का पिता है। इतने वर्षो बाद की यह सोच उसके सामने ढेर से प्रश्न लगाता पर उत्तर कहाँ और कैसे मिलता।

वह प्राय: सोचती कि इस व्यक्ति के साथ उसने इतने अंतरंग क्षण कैसे बिताए। अशोक साथ होते पर एक दस्तक भी दिल पर न पड़ती, एक पत्ता भी न खड़कता, दिल के तार से एक हल्की-सी धुन भी न निकलती, थाप पड़ती पर आवाज़ न होती। फिर भी वह उसका पति है और आरती उसकी पत्नी। एक अजीब सच यह भी था कि महफ़िलों में वे सफल दांपत्य जीवन की मिसाल बनते।

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