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कहानियाँ

समकालीन हिंदी कहानियों के स्तंभ में इस सप्ताह प्रस्तुत है भारत से संतोष गोयल की कहानी- कोना झरी केतली


आज सुबह नाश्ते की मेज़ पर ही वह बात करना चाहती थी हालाँकि उसके मन में रातभर सैंकड़ों छोटे कंटीले झाड़ चुभते रहे थे। अनेक लंबे बड़े-बड़े कैक्टस सरसराते रहे थे। वह करवटें बदलती रही थी।

असल में कल सारा दिन बेहद थका देने वाला साबित हुआ था। कल नववर्ष की पूर्व संध्या थी। कितनी भी कोशिश करे अपना रोज़मर्रा का रूटीन छोड़ देने का मोह वह त्याग नहीं पाती हालाँकि हमेशा थक चूर कर अहद करती कि अगली बार पार्टी अपने घर नहीं रखेगी पर अक्तूबर में दिवाली का हंगामा ख़त्म होने के बोरियत भरे दिनों को बिताते-बिताते वह नववर्ष पर पुन: कमर कसकर तैयार हो गई थी। नतीजा वही बच्चे अपनी दुनिया में व्यस्त रहे और किचन, घर की सजावट सभी काम उसे स्वयं करने पड़े। अशोक ने मदद की तो थी पर वही जो उसने कह दिया, बस! यों तो कल की पार्टी उसने बहुत एंज्याय की थी क्योंकि बच्चे बहुत खुश थे।

रातभर वह बात करने की योजनाएँ बनाती रही थी जिसके लिए बहुत-सी हिम्मत जुटाने की आवश्यकता तो थी ही, साथ एक अच्छे मौके की भी ज़रूरत थी जो उस दिन ही संभव था। जनवरी का प्रारंभ हो रहा था। बस सर्दी ख़त्म हुई नहीं कि पतझड़ शुरू और फिर से बोरियत के लंबे सफ़र की शुरुआत। गर्मी के लंबे दिन काटे न कटें। लंबी ढाई महीने की छुट्टियाँ, ये लंबा समय उसे हमेशा सिर पर लटकी तलवार-सा लगता और मन कुलबुलाने लगता, कहीं बाहर जाकर अपने रुटिन से हटकर कुछ करने के लिए।

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