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 १. ९. २०१५

इस सप्ताह-

अनुभूति में-1
हिंदी दिवस के अवसर पर अपनी भाषा को समर्पित विविध विधाओं में अनेक रचनाकारों की रचनाएँ।

- घर परिवार में

रसोईघर में- लगभग ३०० कैलोरी के व्यंजनों की शृंखला- स्वस्थ कलेवा में, हमारी रसोई-संपादक शुचि द्वारा प्रस्तुत है- नमकीन सेवई

बागबानी में- आसान सुझाव जो बागबानी को उपयोगी और रोचक बनाने में उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं-
२९- लॉन के लिये घास का चुनाव

कला और कलाकार- निशांत द्वारा भारतीय चित्रकारों से परिचय के क्रम में वासुदेव एस. गायतोंडे की कला और जीवन से परिचय।

सुंदर घर- घर को सजाने के कुछ उपयोगी सुझाव जो घर के रूप रंग को आकर्षक बनाने में काम आएँगे- २९- सामान्य चीजें सुंदर सजावट

- रचना व मनोरंजन में

क्या आप जानते हैं- इस सोमवार- (३१ अगस्त को) अमृता प्रीतम, नंदकिशोर आचार्य, ऋतुपर्णो घोष, जवगल श्रीनाथ, राजकुमार यादव... विस्तार से

नवगीत संग्रह- में प्रस्तुत है- डॉ. ओमप्रकाश सिंह की कलम से कमलकान्त सक्सेना द्वारा संपादित नवगीत संकलन- गीत अष्टक (प्रथम पुष्प) का परिचय।

वर्ग पहेली- २५१
गोपालकृष्ण-भट्ट-आकुल और
रश्मि-आशीष के सहयोग से


हास परिहास
में पाठकों द्वारा भेजे गए चुटकुले

साहित्य एवं संस्कृति में-  हिंदी दिवस के अवसर पर

समकालीन कहानियों में प्रस्तुत है भारत से
विजय कुमार सापत्ति की कहानी साहित्य का अखाड़ा

बहुत समय पहले की बात है। मुझे एक पागल कुत्ते ने काटा और मैंने हिंदी साहित्यकार बनने का फैसला कर लिया। ये दूसरी बार था कि मुझे किसी पागल कुत्ते ने काटा था और मैं अपनी ज़िन्दगी से जुड़ा हुआ कोई महत्वपूर्ण फैसला कर रहा था। पहली बार जब एक महादुष्ट पागल कुत्ते ने काटा था तो मैंने शादी करने का फैसला किया था, उस फैसले पर आज भी अफ़सोस है, खैर वो कहानी फिर कभी!
तो हुआ यों कि उस कुत्ते ने मुझे काटा और जब मुझे हॉस्पिटल में इंजेक्शन लगाए जा रहे थे तो मैंने सोचा कि इस घटना पर कुछ लिखना चाहिए। दर्द दूर हुआ तो मैं अपने दफ्तर के लिये निकल पड़ा। रास्ते में मेरे दोस्त बाबू से मुलाकात हुई, मैंने उसे कुत्ते के काटने की कहानी बतायी, वो जोर जोर से हँसने लगा, “साले! तुझे काटने के कारण वो कुत्ता जरुर पागल हो गया होगा"।
मैंने कहा, “यार बाबू, दिल बहुत दुखी है, सोचता हूँ अपने दुःख पर एक कविता लिखूँ।”
उसने कहा, “अबे तो लिख न, कौन रोक रहा है। हम दोनों ने फिर ठहाका लगाया। आगे-
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कल्पना रामानी की लघुकथा
गुलामी की गाँठ
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हनुमान सरावगी का
दृष्टिकोण- लॉर्ड मैकाले का सपना

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वेद प्रकाश वैदिक का
आलेख- उच्च न्यायालय में हिंदी
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सुबोधकुमार नंदन के साथ पर्यटन
अजगैबीनाथ मंदिर और बैद्यनाथ यात्रा

पिछले सप्ताह-

चीनी लोक कथा
सफेद नागिन
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डॉ. पवन विजय का संस्मरण
बँसिया बाज रही वृंदावन

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प्रेम चड्ढा से जानें
साँप- कुछ रोचक तथ्य
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पुनर्पाठ में डॉ सरस्वती माथुर का आलेख
नागों के सम्मान का पर्व- नागपंचमी

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वरिष्ठ रचनाकारों की प्रसिद्ध कहानियों के स्तंभ गौरवगाथा में प्रस्तुत है प्रेमचंद की कहानी अन्धेर

नागपंचमी आई। साठे के जिन्दादिल नौजवानों ने रंग-बिरंगे जाँघिये बनवाये। अखाड़े में ढोल की मर्दाना सदायें गूँजने लगीं। आसपास के पहलवान इकट्ठे हुए और अखाड़े पर तम्बोलियों ने अपनी दुकानें सजायीं क्योंकि आज कुश्ती और दोस्ताना मुकाबले का दिन है। औरतों ने गोबर से अपने आँगन लीपे और गाती-बजाती कटोरों में दूध-चावल लिए नाग पूजने चलीं। साठे और पाठे दो लगे हुए मौजे थे। दोनों गंगा के किनारे। खेती में ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ती थी इसीलिए आपस में फौजदारियाँ खूब होती थीं। आदिकाल से उनके बीच होड़ चली आती थी। साठेवालों को यह घमण्ड था कि उन्होंने पाठेवालों को कभी सिर न उठाने दिया। उसी तरह पाठेवाले अपने प्रतिद्वंद्वियों को नीचा दिखलाना ही जिन्दगी का सबसे बड़ा काम समझते थे। उनका इतिहास विजय की कहानियों से भरा हुआ था। पाठे के चरवाहे यह गीत गाते हुए चलते थे- साठेवाले कायर सगरे पाठेवाले हैं सरदार..... और साठे के धोबी गाते-
आगे-

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यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को प्रकाशित होती है।


प्रकाशन : प्रवीण सक्सेना -|- परियोजना निदेशन : अश्विन गांधी
संपादन, कलाशिल्प एवं परिवर्धन : पूर्णिमा वर्मन

 
सहयोग : कल्पना रामानी
 

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