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 १८. ५. २०१५

इस सप्ताह-

अनुभूति में-1
बाँस पर केंद्रित गीत, छंदमुक्त और दोहा विधाओं में अनेक रचनाकारों मनमोहक की रचनाएँ।

- घर परिवार में

रसोईघर में- मौसम है शीतल पेय का और हमारी रसोई-संपादक शुचि लेकर आई हैं बाँस की कोपलों से बाना विशेष व्यंजन- बाँस की कोपलों का सलाद

बागबानी में- आसान सुझाव जो बागबानी को उपयोगी और रोचक बनाने में उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं-
१६- घर के बगीचे में बाँस के पौधे

जीवन शैली में- कुछ आसान सुझाव जो व्यस्त जीवन में, जल्दी वजन घटाने के लिये सहायक हो सकते हैं- १९- बाँस की चाय  

सुंदर घर- घर को सजाने के कुछ उपयोगी सुझाव जो आपको घर के रूप रंग को आकर्षक बनाने में काम आएँगे- १५- बैठक में बाँस

- रचना व मनोरंजन में

क्या आप जानते हैं- आज केदिन- (१८ मई को) होमी वाडिया, अंतरिक्ष वैज्ञानिक वेंकटरमण राधाकृष्णन, अभिनेत्री सोनाली कुलकर्णी और... विस्तार से

नवगीत संग्रह- में इस सप्ताह प्रस्तुत है- संजीव सलिल की कलम से ब्रजेश श्रीवास्तव के नवगीत संग्रह- बाँसों के झुरमुट से का परिचय।

वर्ग पहेली- २३७
गोपालकृष्ण-भट्ट-आकुल और
रश्मि-आशीष के सहयोग से


हास परिहास
में पाठकों द्वारा भेजे गए चुटकुले

साहित्य एवं संस्कृति में-

गौरवगाथा में प्रस्तुत है
फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी ठेस

खेती-बारी के समय, गाँव के किसान सिरचन की गिनती नहीं करते। लोग उसको बेकार ही नहीं, 'बेगार' समझते हैं। इसलिए, खेत-खलिहान की मजदूरी के लिए कोई नहीं बुलाने जाता है सिरचन को। क्या होगा, उसको बुला कर? दूसरे मजदूर खेत पहुँच कर एक-तिहाई काम कर चुकेंगे, तब कहीं सिरचन राय हाथ में खुरपी डुलाता दिखाई पड़ेगा - पगडंडी पर तौल तौल कर पाँव रखता हुआ, धीरे-धीरे। मुफ्त में मजदूरी देनी हो तो और बात है।
...आज सिरचन को मुफ्तखोर, कामचोर या चटोर कह ले कोई। एक समय था, जबकि उसकी मड़ैया के पास बड़े-बड़े बाबू लोगो की सवारियाँ बँधी रहती थीं। उसे लोग पूछते ही नहीं थे, उसकी खुशामद भी करते थे। '...अरे, सिरचन भाई! अब तो तुम्हारे ही हाथ में यह कारीगरी रह गई है सारे इलाके मे। एक दिन भी समय निकाल कर चलो।
कल बड़े भैया की चिट्ठी आई है शहर से - सिरचन से एक जोड़ा चिक बनवा कर भेज दो।'
मुझे याद है... मेरी माँ जब कभी... आगे-
*

प्रेरक प्रसंग
 जीवन जैसे बाँस
*

लोकरंग के अतर्गत
छत्तीसगढ़ का बाँसगीत 

*

अर्बुदा ओहरी की कलम से
 बाँस की कहानी
*

पुनर्पाठ में डॉ. डी. एन तिवारी
का आलेख- चिर सखा है बाँस

पिछले सप्ताह-

आलोक सक्सेना का व्यंग्य
हमारी सोसायटी में राजन के जलवे
*

बुद्धिनाथ मिश्र का ललित निबंध
फूल आए हैं कनेरों में 

*

राजेन्द्र शंकर भट्ट का आलेख
 विभिन्न धर्मों में जल प्रलय की कहानी
*

पुनर्पाठ में अभिज्ञात की
आत्मकथा तेरे बगैर का छठा भाग

*

उपन्यास अंश में प्रस्तुत है अलका सरावगी के उपन्यास जानकीदास तेजपाल मैनशन का अंश स्मृतियाँ

वह इन दो सालों के जीवन में पूरी तरह बदल गया। अकेलेपन की आदत भी उसे पड़ ही गई। भले ही काफी परेशानी के बाद। आदमी मजबूरन मजबूत हो जाता है। न हो तो क्या करे? क्या दीवालों से अपना सिर पीटे या जिस-तिस को फोन कर अपना रोना गाना सुनाता जाए - यह जानते हुए कि सामनेवाले ने कान से फोन हटाकर बगल में रख दिया है? सच पूछा जाए तो वह इतना मजबूत कभी नहीं था। दीपा के रहते भी नहीं। उसे मालूम है कि अब जीवन में न बड़े दुख होंगे और न ही बड़े सुख। अब न कोई डर बचा है न कोई बडी उम्मीद। अगर आज कोई उससे पूछे कि उसके जीवन में किसी बात का अफसोस है क्या, तो उसके लिए बताना मुश्किल हो जाएगा। अमेरिका से एडवोकेट बाबू ने बुला लिया, तो क्या? उसे खुद मालूम है कि अमेरिका उसके लिए ठौर नहीं बन सकता था। वह तो मन ही मन तरस खाता है उन लोगों पर जो वहीं रह गए और अब... आगे-

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"अभिव्यक्ति" व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है
यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को प्रकाशित होती है।


प्रकाशन : प्रवीण सक्सेना -|- परियोजना निदेशन : अश्विन गांधी
संपादन, कलाशिल्प एवं परिवर्धन : पूर्णिमा वर्मन

 
सहयोग : कल्पना रामानी -|- मीनाक्षी धन्वंतरि
 

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