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हास्य व्यंग्य

 

हास्य व्यंग्य

  (उ)ई मेल 
रविशंकर श्रीवास्तव  


हाल ही में मेरा ई-मेल पता किसी तकनीकी कारण से बदल गया और नतीजतन मुझे भेजे गए मेल, भेजने वालों को खाली खाते के चेक की तरह बाउंस हो गए। आम तौर पर मैंने तो जैसे तैसे इस मार को सह लिया। परंतु इसकी मार मेरी प्रेयसी को ज़रा ज़्यादा ही पड़ गई। उसे लगा कि मैं न जाने किस मुसीबत में फँस गया हूँ या मुझे किसी और मुसीबत ने तो नहीं फाँस लिया है। जहाँ दिन में दस बार ई-मेल के माध्यम से प्रेम संदेशों का आदान-प्रदान होता हो, वहाँ यकायक, नई व्यवस्था के होते तक प्रेम भरे संदेश मिलना बंद हो जाएँ तो प्रेमियों के हालत का अंदाज़ा आसानी से लगाया जा सकता है।

वैसे भी ई-मेल अक्सर उई-मेल का काम ज़्यादा करता है। ज़्यादा पुरानी बात नहीं है, महज़ साल दो साल पहले जब इस निगोड़ी ई-मेल के अते-पते नहीं थे, तो कितने मज़े थे। डाकिया चिठ्ठी पत्री लेकर आता था, रंगबिरंगे लिफ़ाफ़े होते थे और होती थी सुंदर हाथों से लिखी हुई चिठ्ठियाँ, जिनमें अक्सर महबूब के स्पर्श की खुशबू भी समाहित होती थी। लोग इन पत्रों को हज़ार बार पढ़कर, छूकर और देखकर निहाल हुआ करते थे और फिर बड़े जतन से जवाब लिखा करते थे। डाकिये का इंतज़ार भी कितना सुहाना होता था और जब पत्र लिखते थे तो जवाब का इंतज़ार हफ़्ते भर बाद शुरू होता था। इस बीच कई शंकाओं कुशंकाओं - मसलन पत्र मिला या नहीं, जवाब भेजा या नहीं - के बीच जब पत्र मिलता था तो उस आनंद का कोई ठिकाना नहीं होता था।

पर अब? जनाब अब तो हालात यह है कि इंस्टेंट मैसेंजर और चैट जैसे ई-मेल के नए अवतारों ने इंतज़ार का मज़ा ही किरकिरा कर दिया है। इधर आपने ई-मेल से कुछ भेजा नहीं, उधर दन्न से जवाब आया नहीं। ऊपर से अगर जवाब नहीं आया तो दिल में खलबली, लिहाज़ा हर दस पाँच मिनट में अपना ई-मेल इनबॉक्स एक्सेस किए बग़ैर चैन नहीं चाहे रात के बारह बजे हों। अगर आपका मेल वांछित जगह पर नहीं पहुँचा तो वह मेलर डेमन के द्वारा आपको वापस मिल जाता है। यहाँ तक कि 'ई-मेल रीड रिक्वेस्ट' के कारण भेजा गया मेल पढ़ लिया गया या नहीं यह भी पता लग जाता है। कुल मिलाकर पत्र भेजने और मिलने के इंतज़ार और सस्पेंस के सारे मज़े का गुड़गोबर। फिर हाथ से लिखे पत्रों को पढ़ने जैसा आनंद भला कंप्यूटर के मॉनीटर पर पढ़ने या प्रिंटर से प्रिंट किए गए पत्रों के पढ़ने से आ सकता है?

निगोडी ई-मेल ने सबकुछ बदल डाला। अब न तो ऐसे पत्र आते हैं, जिनमें अपने महबूब के बदन की खुशबू का अहसास होता है, न ही उनके हाथों से लिखी गई मोती जैसी इबारतों को बार-बार पढ़ने का आनंद आता है। अब तो ई-मेल के द्वारा आया प्रेम पत्र भी किसी स्पाम मेल के जैसा भयानक होता है।

साल दर साल, एक जैसे टाइपफ़ेस, आगे पीछे विज्ञापन, रिमाइंडर और अन्य तकनीकी जानकारियाँ, जिससे पढ़ने वाले को अक्सर कोई लेना देना नहीं होता, प्रेमपत्र के मज़े को और भी ख़राब कर देते हैं। जैसे पत्र के अंत में लिखा होगा आई लव यू - सीमा। नीचे ई-मेल का सर्वर आपको चिढ़ाता हुआ अपना विज्ञापन लिख देगा - डू यू याहू? फिर आप चाहे कितना ही अपने ई-मेल को इनक्रिप्ट करके गुप्त बनाने की कोशिश कर लें, आपका मेल मालूम नहीं दुनिया के किन-किन सर्वरों में से घूम फिर कर आता है जिससे कि इसके सार्वजनिक हो जाने का ख़तरा बना ही रहता है। यही नहीं, आपने एक बार किसी को मेल कर दिया, तो फिर इसको इंटरनेट से मिटा पाना असंभव-सा कार्य है। आपको इलहाम ही नहीं होगा कि आपका पोटेंशियली डैंजरस किस्म का ई-मेल कहाँ-कहाँ किस-किस कंप्यूटर में स्टोर है।

ई-मेल को आपके पास भेजने में किसी को कोई ख़ास खर्च नहीं करना पड़ता लिहाज़ा आपके पास रोज़ ऐसे सैंकड़ों ई-मेल आ सकते हैं जिनमें किसी प्रकार की छूट या किसी प्रकार की लाटरी लगने या अन्य किसी प्रकार की कमाई करने के और अन्य धार्मिक अंधविश्वासों के विवरण होते हैं। आपका ई-मेल पता आमतौर पर सार्वजनिक ही होता है, कोई हैकर या कोई वेब साइट आपके कंप्यूटर से आपका ई-मेल पता आसानी से हासिल कर सकता है। लिहाज़ा कोई भी आपको ई-मेल करने हेतु स्वतंत्र होता है और माना कि कोई आतंकवादी ही आपको ई-मेल कर दे तो फिर आप तो गए काम से। इंटरनेट के तमाम सर्वरों और प्रेषक के कंप्यूटरों में से कहीं न कहीं आपको फँसने फँसाने के तमाम सबूत मिल ही जाएँगे। फिर आप अपनी सफ़ाई देते फिरिए।

एक नया भय भी अब आपको सताने लगा है। अगर आप ई-मेल के यूजर नहीं हैं, आपका ई-मेल पता नहीं हैं, तो आपकी इस दुनिया में मौजूदगी निरर्थक है। हर कहीं कोई फ़ार्म भरिए, या किसी से बात करिए, ई-मेल का एक कॉलम नया जुड़ा होता है या आपका ई-मेल पता पूछा जाता है। गोया कि यह भी कोई स्टेटस सिंबल हो। फिर आपको नए सिरे से एक छात्र जैसा बनकर इंटरनेट की पढ़ाई करनी होती है। ई-मेल का उपयोग करने के लिए आज कल के छोकरों से तमाम उम्रदराज़, दुनियादारी के जानकार लोगों को भी नसीहतें लेनी पड़ती है। भला यह भी कोई अच्छी बात है? कलियुग की कल्पना में यह बात भी जोड़ दी जानी चाहिए।

ई-मेल से ज़रा बच के भी रहिए। यह आपके कंप्यूटर को जमकर बीमार कर सकता है। यह एक कथ्य है कि कंप्यूटरों में वायरस ई-मेल द्वारा ज़्यादा फैलते हैं। हो सकता है कि आपके महबूब के बीमार कंप्यूटर का वायरस ई-मेल के द्वारा 'आइ लव यू' कहता हुआ आपके कंप्यूटर में घुस जाए और आपकी तमाम मेहनत पर पानी फेरता हुआ आपके डाटा को ख़त्म कर दे। यह बात तो और भी आश्चर्यजनक है कि अब तक समस्त संसार के कंप्यूटरों में तमाम तरह के गंभीर वायरसों को फैलने फैलाने का काम जब इस ई-मेल ने ही किया है, तब भी लोग इसे क्यों अपनाए फिर रहे हैं। क्या इस पर तत्काल प्रतिबंध नहीं लगा देना चाहिए? मगर जब तक प्रतिबंध लगे, आप अपने उई मेल के अनुभव मुझे ई-मेल अवश्य करिएगा।

1 मार्च 2005

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