हास्य व्यंग्य

टाई
नरेंद्र कोहली  


साक्षात्कार समाप्त हो गया तो मैंने बड़ी उत्सुकता से रामलुभाया के सामने रखे गए काग़ज़ पर दृष्टि डाली। मैं देखना चाहता था कि जिस लड़के को मैंने सब से अधिक योग्य पाया था, रामलुभाया ने भी उसी को सब से अधिक अंक दिए थे या नहीं?

मुझे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। रामलुभाया ने उस लड़के को सब से कम अंक दिए थे।
"तुम ने इस लड़के को नहीं चुना?" मैंने रामलुभाया को डाँटने से पहले अपने संदेह की पुष्टि कर लेनी चाही।
"नहीं!" उसने बहुत सहज भाव से कहा।
"क्यों?" मेरा स्वर कुछ ऊँचा उठ गया, "वह सब से अधिक योग्य है। उसने तुम्हारे सारे प्रश्नों के उत्तर ठीक-ठीक दिए हैं। उसने सामूहिक चर्चा में सब से अच्छी बातें कही हैं। उसकी भाषा सबसे अच्छी है। उसके तर्क सब से सबल हैं। उसका उच्चारण सब से शुद्ध है और उसकी शैली सब से अधिक मोहक हैं।"
"ठीक कहते हो।" उसने उसी प्रकार शांत स्वर में कहा।
"तो फिर उसी को चुना जाना चाहिए था और तुमने उसे पहले ही चक्र में बाहर कर दिया है। क्यों?"
"क्योंकि वह सब से ख़तरनाक है। ऐसे लोग ख़तरनाक होते ही हैं।"
"तुम यह कैसे कह सकते हो?"
"उसने टाई नहीं बाँध रखी थी।" रामलुभाया ने उत्तर दिया।
"तुम यहाँ एक प्रशासक का चुनाव करने बैठे थे या टाइयाँ बेचने?" मैंने चिढ़ कर कहा, "इस नौकरी से टाई बाँधने न बाँधने का क्या संबंध?"
"क्यों? संबंध क्यों नहीं?" रामलुभाया बोला, "तुम्हें इसमें विद्रोह की गंध नहीं आती?"
"विद्रोह? कैसा विद्रोह??" मैंने कहा, "वह लड़का तो इतना शिष्ट और शालीन था। विद्रोह तो उसके आसपास ही नहीं फटकता।"

"मूर्ख हो तुम।" रामलुभाया बोला, "आज उसने टाई नहीं बाँधी है, कल वह पतलून पहनने से इंकार कर देगा। धोती बाँध कर आने लगेगा, कार्यालय में।"
"तो? उससे प्रशासन में कोई कमी आ जाएगी?" मैंने पूछा, "भारत में यदि कोई पुरुष धोती बाँध कर कार्यालय में आता है तो क्या बुराई है। सारे विश्व में लोग कार्यालयों में अपने राष्ट्रीय परिधान में आते हैं। उसके धोती बाँध कर आने से क्या हो जाएगा?"
"क्या हो जाएगा?" रामलुभाया के चेहरे पर असंतोष झलका, "फिर वह छुरी काँटे से न खा कर अपने हाथ से खाना खाएगा और मेज़ पर दाल चावल बिखेरेगा।"
"तो क्या हो जाएगा?" मैंने पूछा, "तुम्हें उसकी मेज़ साफ़ नहीं करनी पड़ेगी। उसे नौकर साफ़ करेगा। तुम्हारी क्या हानि हो जाएगी?"
"फिर वह अंग्रेज़ी के स्थान पर हिंदी बोलने की हठ करेगा।" रामलुभाया बोला, "भारत में बच्चों को शिक्षा उनकी मातृभाषा में दी जाए - ऐसी माँग करेगा।"
"तो उसमें अनुचित ही क्या है?" मैंने कहा, "प्रत्येक देश अपनी भाषा में शिक्षा देता है।"
"गधे हो तुम।" रामलुभाया ने कहा, "ऐसा व्यक्ति रामनवमी के दिन अपने घर में न तो केक काट कर हैप्पी बर्थडे टू यू श्रीराम गाएगा और न ही मैरी क्रिसमस और हैप्पी न्यू इयर के कार्ड भेजेगा, और न ही ''31 दिसंबर'' की रात को शराब पी कर दंगा करेगा।"
"तो इन सबसे इस नौकरी का क्या संबंध?" मैंने चिल्ला कर कहा।
"सचमुच नहीं समझते?" रामलुभाया ने पहली बार कुछ हताश हो कर मेरी ओर देखा।
"नहीं।" मैंने कहा।

"अरे यार, वह दिनों को संडे मंडे न कह कर सोम और मंगल कहेगा। जनवरी फरवरी को छोड़ कर चैत्र बैसाख की बात करेगा। रेड और येलो न कह कर लाल पीला कहेगा। मौम और डैड न कह कर माताजी और पिताजी कहेगा। घर में क्रिसेंधमम और पेंज़ी न लगा कर तुलसी का बिरवा लगाना चाहेगा।" उसने मेरी और देखा, "यह सब हम कैसे सहन कर सकते हैं।"
"क्यों क्या कष्ट है तुम को इसमें?" मैंने उसे डाँटा, "कोई आदमी अपने देश और समाज के अनुरूप रहना चाहता है तो तुम्हारे पेट में शूल क्यों उठता है?"
"यदि वह अपने ढंग से रहता है, अपनी भाषा बोलता है, अपने पेड़-पौधे, अपने पर्व-त्यौहारों से जुड़ा रहता है, चाकलेट के स्थान पर बर्फी खाता है, केक के स्थान पर हलवा पसंद करता है - तो वह गीता और रामायण कैसे छोड़ देगा?" रामलुभाया लगभग रो ही पड़ा।
"तो उससे क्या होगा?" मैंने कहा, "तुम उससे गीता और रामायण छुड़वाना ही क्यों चाहते हो?"

"बाज़ार में शिकंजी और लस्सी ही चलती रही तो व्हिस्की और कोक कैसे बिकेगी? गीता और रामायण ही पढ़ी जाती रही तो वह पाश्चात्य रंग में कैसे रंगा जाएगा, ईसाई कैसे बनेगा? वह न तो विदेशी व्यापार को जमने देगा, न विदेशी संस्कृति को और न ही विदेशी धर्म को।"
"तो तुम इस देश को एक साथ ही राजनीतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से दास बना देना चाहते हो?" मैंने कहा।
"अब यह सब अलग-अलग तो नहीं हो सकता न। होगा तो सब कुछ एक साथ ही होगा। यह तो एक प्रकार का पैकेज डील है।" वह मुस्करा रहा था।
"पर उससे तुम्हें क्या लाभ होगा?" मैं एक प्रकार से रो पड़ा।
"नहीं तो ये विदेशी संस्थाएँ मुझे लाखों रुपए प्रति मास क्यों देंगी?" उसने मुझ पर एक विजय भरी मुस्कान डाली।

1 जनवरी 2005