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लघु उपन्यास

समकालीन परिस्थितियों पर आधारित आधुनिक जीवन की अंतहीन दौड़ का संवेदनशील दस्तावेज़, ममता कालिया का बहुचर्चित उपन्यास- 'दौड़'


(पहला भाग)

वह अपने ऑफ़िस में घुसा।
शायद इस वक्त लोड शेडिंग शुरू हो गई थी। मुख्य हॉल में आपातकालीन ट्यूब लाइट जल रही थी। वह उसके सहारे अपने केबिन तक आया। अँधेरे में मेज़ पर रखे कंप्यूटर की एक बौड़म सिलुएट बन रही थी। फ़ोन, इंटरकॉम सब निष्प्राण लग रहे थे। ऐसा लग रहा था संपूर्ण सृष्टि निश्चेष्ट पड़ी है।

बिजली के रहते यह छोटा-सा कक्ष उसका साम्राज्य होता है। थोड़ी देर में आँख अँधेरे की अभ्यस्त हुई तो मेज़ पर पड़ा माउस भी नज़र आया। वह भी अचल था। पवन को हँसी आ गई, नाम है चूहा पर कोई चपलता नहीं। बिजली के बिना प्लास्टिक का नन्हा-सा खिलौना है बस। ''बोलो चूहे कुछ तो करो, चूँ चूँ ही सही,'' उसने कहा। चूहा फिर बेजान पड़ा रहा।

पवन को यकायक अपना छोटा भाई सघन याद आया। रात में बिस्कुटों की तलाश में वे दोनों रसोईघर में जाते। रसोई में नाली के रास्ते बड़े-बड़े चूहे दौड़ लगाते रहते। उन्हें बड़ा डर लगता। रसोई का दरवाज़ा खोल कर बिजली जलाते हुए छोटू लगातार म्याऊँ-म्याऊँ की आवाज़ें मुँह से निकालता रहता कि चूहे ये समझें कि रसोई में बिल्ली आ पहुँची है और वे डर कर भाग जाएँ। छोटू का जन्म भी मार्जार योनि का है।

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