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इतिहास

 

हिन्दी पत्रकारिता का इतिहास
शैलेन्द्र चौहान


छापे की पहली मशीन भारत में १६७४ में पहुँचाई गई थी। ईस्ट इंडिया कंपनी के भूतपूर्व अधिकारी विलियम बोल्ट्स की सन् १७७६ में भारत से पहला ख़बरनामा/अख़बार प्रकाशित करने की योजना थी, लेकिन कंपनी से मतभेद होने के कारण वह अख़बार प्रकाशित नहीं कर सका। उसने एक पुस्तक अवश्य प्रकाशित की। १५वीं शताब्दी के मध्य में योहन गूटनबर्ग ने छापने की मशीन का आविष्कार किया। असल में उन्होंने धातु के अक्षरों का आविष्कार किया था। इसके फलस्वरूप किताबों का ही नहीं, अख़बारों का भी प्रकाशन संभव हुआ। १६वीं शताब्दी के अंत में, यूरोप के शहर स्ट्रॉसबर्ग में, योहन कारोलूस नाम का कारोबारी धनवान ग्राहकों के लिए सूचना-पत्र लिखवा कर प्रकाशित करता था। लेकिन हाथ से प्रतियों की नकल करने का काम महँगा और धीमा भी था। तब उसने छापे की मशीन ख़रीद ली और सन् १६०५ से समाचार-पत्र छापने लगा। समाचार-पत्र का नाम था ‘रिलेशन’। यह विश्व का प्रथम मुद्रित समाचार-पत्र माना जाता है।

भारत का सबसे पहला अख़बार, जिसमें विचार स्वतंत्र रूप से व्यक्त किए गए, वह १७८० में जेम्स ऑगस्टस हिकी का अख़बार ‘बंगाल गज़ेट’ था। अख़बार में दो पन्ने थे, और इसमें ईस्ट इंडिया कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों के व्यक्तिगत जीवन पर लेख छपते थे। जब हिकी ने अपने अख़बार में तत्कालीन ब्रिटिश गवर्नर की पत्नी पर आक्षेप किया, तो उसे ४ महीने के लिए जेल भेजा गया और ५०० रुपये का जुर्माना लगा दिया गया। लेकिन हिकी ने शासकों की आलोचना करने से परहेज़ नहीं किया। फिर जब उसने गवर्नर और सर्वोच्च न्यायाधीश की आलोचना की, तो उस पर ५००० रुपये का जुर्माना लगाया गया और एक साल के लिए जेल में डाला गया। इस तरह उसका अख़बार बंद हो गया। १७९० के बाद भारत में अंग्रेज़ी भाषा के कुछ और अख़बार प्रकाशित हुए, जो अधिकतर अंग्रेज़ शासन के मुखपत्र थे। भारत में प्रकाशित होने वाले समाचार-पत्र थोड़े-थोड़े दिनों तक ही जीवित रह सके।

१८१९ में किसी भारतीय भाषा में जो पहला समाचार-पत्र प्रकाशित हुआ था, वह बंगाली भाषा का पत्र ‘संवाद कौमुदी’ (बुद्धि का चाँद) था। उसके प्रकाशक राजा राममोहन राय थे। १८२२ में गुजराती भाषा का साप्ताहिक ‘मुंबईना समाचार’ प्रकाशित होने लगा, जो दस वर्ष बाद दैनिक हो गया और गुजराती के एक प्रमुख दैनिक के रूप में आज तक विद्यमान है। भारतीय भाषा का यह सबसे पुराना समाचार-पत्र है। १८२६ में ‘उदंत मार्तंड’ नाम से हिंदी के प्रथम समाचार-पत्र का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। यह साप्ताहिक पत्र १८२७ तक चला और पैसे की कमी के कारण बंद हो गया। १८३० में राममोहन राय ने बड़े हिंदी साप्ताहिक ‘बंगदूत’ का प्रकाशन शुरू किया। यह बहुभाषीय पत्र था, जो अंग्रेज़ी, बंगला, हिंदी और फ़ारसी में निकलता था। यह कोलकाता से निकलता था, जो अहिंदी क्षेत्र था। राममोहन राय हिंदी का महत्व समझते थे। १८३३ में भारत में २० समाचार-पत्र थे, १८५० में २८ हो गए, और १९५३ में ३५। इस तरह अख़बारों की संख्या नाममात्र को ही सही, पर बढ़ी। बहुत से पत्र जल्द ही बंद हो गए और उनकी जगह नए निकले। अधिकतर समाचार-पत्र कुछ महीनों से लेकर दो-तीन साल तक जीवित रहे। उस समय सभी भारतीय समाचार-पत्रों की आकांक्षाएँ और समस्याएँ प्रायः समान थीं। वे नया ज्ञान अपने पाठकों को देना चाहते थे और उसके साथ समाज-सुधार की भावना भी उनमें निहित थी। सामाजिक सुधारों को लेकर नए और पुराने विचारवालों में कुछ अंतर होते थे। इस कारण नए-नए पत्र निकले। उनके सामने यह समस्या भी थी कि वे पाठकों को किस भाषा में समाचार और विचार दें।

दूसरी समस्या थी—भाषा शुद्ध हो या सबके लिए सुलभ हो? १८४६ में राजा शिवप्रसाद ‘सितारेहिंद’ ने एक हिंदी पत्र ‘बनारस अख़बार’ का प्रकाशन शुरू किया। राजा शिवप्रसाद शुद्ध हिंदी का प्रचार करते थे और अपने पत्र के पृष्ठों पर उन लोगों की कड़ी आलोचना करते थे जो बोलचाल की हिंदुस्तानी के पक्ष में थे। लेकिन उसी समय के हिंदी लेखक भारतेंदु हरिश्चंद्र ने ऐसी रचनाएँ रचीं जिनकी भाषा समृद्ध भी थी और सरल भी। इस तरह भारतेंदु ने आधुनिक हिंदी की नीँव रखी और हिंदी के भविष्य के बारे में हो रहे विवाद को समाप्त कर दिया। १८६८ में भारतेंदु हरिश्चंद्र ने साहित्यिक पत्रिका ‘कविवचन सुधा’ निकालना प्रारंभ किया। १८५४ में हिंदी का पहला दैनिक ‘समाचार सुधावर्षण’ निकला।

आधुनिक हिंदी पत्रकारिता का जन्म अठारहवीं शताब्दी के चतुर्थ चरण में कलकत्ता, बंबई और मद्रास में हुआ। हिंदी के पहले पत्र ‘उदंत मार्तंड’ (१८२६) के प्रकाशित होने तक इन नगरों की ऐंग्लो-इंडियन (अंग्रेज़ी) पत्रकारिता काफी विकसित हो गई थी। इन वर्षों में फ़ारसी भाषा में भी पत्रकारिता का जन्म हो चुका था। १८वीं शताब्दी के फ़ारसी पत्र कदाचित् हस्तलिखित पत्र थे। १८०१ में ‘हिंदुस्थान इंटेलिजेंस ओरिएंटल एंथोलॉजी’ नाम का जो संकलन प्रकाशित हुआ, उसमें उत्तर भारत के कितने ही "अख़बारों" के नाम और उद्धरण थे। १८१० में मौलवी इकराम अली ने कलकत्ता से लीथो पत्र "हिंदोस्तानी" प्रकाशित करना आरंभ किया। जैसा कि हम जानते हैं, १८१६ में गंगाकिशोर भट्टाचार्य ने "बंगाल गजट" का प्रकाशन प्रारंभ किया। यह पहला बंगला पत्र था। बाद में श्रीरामपुर के पादरियों ने प्रसिद्ध प्रचार-पत्र "समाचार दर्पण" (२७ मई, १८१८) का आरंभ किया। इन प्रारंभिक पत्रों के बाद १८२३ में हमें बँगला भाषा के ‘समाचार चंद्रिका’ और "संवाद कौमुदी", फ़ारसी और उर्दू के "जामे जहाँनुमा" और "शमसुल अख़बार" तथा गुजराती के "मुंबई समाचार" के दर्शन होते हैं।
अतः यह सुस्पष्ट है कि हिंदी पत्रकारिता बहुत बाद की चीज़ नहीं है। दिल्ली का "उर्दू अख़बार" (१८३३) और मराठी का "दिग्दर्शन" (१८३७) हिंदी के पहले पत्र "उदंत मार्तंड" (१८२६) के बाद ही आए। "उदंत मार्तंड" के संपादक पंडित जुगलकिशोर थे। यह साप्ताहिक पत्र था। पत्र की भाषा पछाँही हिंदी थी, जिसे पत्र के संपादकों ने "मध्यदेशीय भाषा" कहा है। यह पत्र १८२७ में बंद हो गया। उन दिनों सरकारी सहायता के बिना किसी भी पत्र का चलना संभव नहीं था। कंपनी सरकार ने मिशनरियों के पत्र को डाक आदि की सुविधा दे रखी थी, परंतु चेष्टा करने पर भी "उदंत मार्तंड" को यह सुविधा प्राप्त नहीं हो सकी।

१८२६ ई. से १८७३ ई. तक के काल को हम हिंदी पत्रकारिता का पहला चरण कह सकते हैं। १८७३ ई. में भारतेंदु ने "हरिश्चंद्र मैगजीन" की स्थापना की। एक वर्ष बाद यह पत्र "हरिश्चंद्र चंद्रिका" नाम से प्रसिद्ध हुआ। वैसे भारतेंदु का "कविवचन सुधा" पत्र १८६७ में ही सामने आ गया था और उसने पत्रकारिता के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया; परंतु नई भाषा-शैली का प्रवर्तन १८७३ में "हरिश्चंद्र मैगजीन" से ही हुआ। इस बीच के अधिकांश पत्र प्रयोग-मात्र कहे जा सकते हैं; उनके पीछे पत्र-कला का ज्ञान अथवा नए विचारों के प्रचार की भावना संभवतः नहीं थी। "उदंत मार्तंड" के बाद प्रमुख पत्र हैं: बंगदूत (१८२९), प्रजामित्र (१८३४), बनारस अख़बार (१८४५), मार्तंड पंचभाषीय (१८४६), ज्ञानदीप (१८४६), मालवा अख़बार (१८४९), जगद्दीप भास्कर (१८४९), सुधाकर (१८५०), साम्यदंड मार्तंड (१८५०), मजहरुलसरूर (१८५०), बुद्धिप्रकाश (१८५२), ग्वालियर गजेट (१८५३), समाचार सुधावर्षण (१८५४—दैनिक, कलकत्ता), प्रजाहितैषी (१८५५), सर्वहितकारक (१८५५), सूरजप्रकाश (१८६१), जगलाभचिंतक (१८६१), सर्वोपकारक (१८६१), प्रजाहित (१८६१), लोकमित्र (१८६३), भारतखंडामृत (१८६४), तत्त्वबोधिनी पत्रिका (१८६५), ज्ञानप्रदायिनी पत्रिका (१८६६), सोमप्रकाश (१८६६), सत्यदीपक (१८६६), वृत्तांतविलास (१८६७), ज्ञानदीपक (१८६७), कविवचनसुधा (१८६७), धर्मप्रकाश (१८६७), विद्याविलास (१८६७), वृत्तांतदर्पण (१८६७), विद्यादर्श (१८६९), ब्रह्मज्ञानप्रकाश (१८६९), अल्मोड़ा अख़बार (१८७०), आगरा अख़बार (१८७०), बुद्धिविलास (१८७०), हिंदू प्रकाश (१८७१), प्रयागदूत (१८७१), बुंदेलखंड अख़बार (१८७१), प्रेमपत्र (१८७२), और बोधा समाचार (१८७२)।

इन पत्रों में से कुछ मासिक थे, कुछ साप्ताहिक। दैनिक पत्र केवल एक था—"समाचार सुधावर्षण", जो द्विभाषीय (बंगला-हिंदी) था और कलकत्ता से प्रकाशित होता था। यह दैनिक पत्र १८७१ तक चलता रहा। अब अधिकांश हिंदी भाषा के पत्र आगरा से प्रकाशित होने लग गए, जो उन दिनों एक बड़ा शिक्षा-केंद्र था, और वे विद्यार्थी-समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति करते थे। शेष ब्रह्मसमाज, सनातन धर्म और मिशनरियों के प्रचार-कार्य से संबंधित थे। बहुत से पत्र द्विभाषीय (हिंदी-उर्दू) थे और कुछ तो पंचभाषीय तक थे। इससे भी पत्रकारिता की अपरिपक्व दशा ही सूचित होती है। हिंदी प्रदेश के प्रारंभिक पत्रों में "बनारस अख़बार" (१८४५) काफी प्रभावशाली था और उसी की सामायिक भाषा-नीति के विरोध में १८५० में तारामोहन मैत्र ने शुद्ध भाषा में काशी से साप्ताहिक "सुधाकर" और १८५५ में राजा लक्ष्मण सिंह ने आगरा से "प्रजाहितैषी" का प्रकाशन आरंभ किया था। राजा शिवप्रसाद का "बनारस अख़बार" उर्दू भाषा-शैली को अपनाता था, तो ये दोनों पत्र पंडिताऊ तत्सम-प्रधान शैली की ओर झुके हुए थे। १८६७ से पहले भाषा-शैली के संबंध में हिंदी पत्रकार किसी निश्चित शैली का अनुसरण नहीं कर सके थे। इसी वर्ष 'कविवचनसुधा' का प्रकाशन प्रारंभ हुआ; हम उसे पहला महत्वपूर्ण हिंदीभाषी पत्र कह सकते हैं। पहले यह मासिक था, फिर पाक्षिक हुआ और अंत में साप्ताहिक। भारतेंदु के बहुविध व्यक्तित्व का प्रकटन इस पत्र के माध्यम से हुआ, परंतु सच तो यह है कि "हरिश्चंद्र मैगजीन" के प्रकाशन (१८७३) तक वे भी भाषा-शैली और विचारों के क्षेत्र में मार्ग ही खोजते दिखाई देते हैं।

हिंदी पत्रकारिता का दूसरा युग १८७३ से १९०० तक चलता है। इस युग के एक छोर पर भारतेंदु का "हरिश्चंद्र मैगजीन" था और नागरीप्रचारिणी सभा द्वारा अनुमोदन प्राप्त "सरस्वती"। इन २७ वर्षों में प्रकाशित पत्रों की संख्या ३००–३५० से ऊपर हो गई और इनका विस्तार नागपुर तक हो गया। अधिकांश पत्र मासिक या साप्ताहिक थे। मासिक पत्रों में निबंध, नवल-कथा (उपन्यास), वार्ता आदि के रूप में कुछ अधिक स्थायी सामग्री संचित रहती थी। अधिकांश पत्र १०–१५ पृष्ठों से अधिक नहीं जा पाते थे। उनमें प्रस्तुत की जाने वाली सामग्री की दृष्टि से उन्हें "विचारपत्र" कह सकते हैं। साप्ताहिक पत्रों में समाचारों और उन पर टिप्पणियों का भी महत्वपूर्ण स्थान था। वास्तव में दैनिक समाचारों के प्रति उस समय विशेष आग्रह नहीं था और कदाचित् इसीलिए उन दिनों साप्ताहिक और मासिक पत्र कहीं अधिक महत्वपूर्ण थे। उन्होंने जनजागरण में अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्नीसवीं शताब्दी के इन २५ वर्षों का आदर्श भारतेंदु की पत्रकारिता थी। "कविवचनसुधा" (१८६७), "हरिश्चंद्र मैगजीन" (१८७४), "श्री हरिश्चंद्र चंद्रिका" (१८७४) और "बालबोधिनी" (स्त्री-जन की पत्रिका, १८७४) के रूप में भारतेंदु ने ही इस दिशा में पथ-प्रदर्शन किया। उनकी टीका-टिप्पणियों से सरकारी अधिकारी घबराते थे और "कविवचनसुधा" के "पंच" पर रुष्ट होकर काशी के मजिस्ट्रेट ने भारतेंदु के पत्रों को शिक्षा विभाग के लिए लेना बंद करा दिया था। इसमें संदेह नहीं कि पत्रकारिता के क्षेत्र में भी भारतेंदु पूर्णतया निर्भीक थे और उन्होंने नए-नए पत्रों के प्रकाशन को प्रोत्साहन दिया। "हिंदी प्रदीप", "भारतजीवन" आदि अनेक पत्रों का नामकरण भी उन्होंने ही किया था। उनके युग के सभी पत्रकार उन्हें अग्रणी मानते थे। भारतेंदु के बाद इस क्षेत्र में जो पत्रकार आए, उनमें प्रमुख थे: पंडित रुद्रदत्त शर्मा (भारतमित्र, १८७७), बालकृष्ण भट्ट (हिंदी प्रदीप, १८७७), दुर्गाप्रसाद मिश्र (उचित वक्ता, १८७८), पंडित सदानंद मिश्र (सारसुधानिधि, १८७८), पंडित वंशीधर (सज्जन-कीर्त्ति-सुधाकर, १८७८), बदरीनारायण चौधरी "प्रेमधन" (आनंद कादंबिनी, १८८१), देवकीनंदन त्रिपाठी (प्रयाग समाचार, १८८२), राधाचरण गोस्वामी (भारतेंदु, १८८२), पंडित गौरीदत्त (देवनागरी प्रचारक, १८८२), राजा रामपाल सिंह (हिंदुस्तान, १८८३), प्रतापनारायण मिश्र (ब्राह्मण, १८८३), अंबिकादत्त व्यास (पीयूषप्रवाह, १८८४), बाबू रामकृष्ण वर्मा (भारतजीवन, १८८४), पं. रामगुलाम अवस्थी (शुभचिंतक, १८८८), योगेशचंद्र वसु (हिंदी बंगवासी, १८९०), पं. कुंदनलाल (कवि व चित्रकार, १८९१) और बाबू देवकीनंदन खत्री एवं बाबू जगन्नाथदास (साहित्य सुधानिधि, १८९४)।

१८९५ ई. में "नागरीप्रचारिणी पत्रिका" का प्रकाशन आरंभ होता है। इस पत्रिका से गंभीर साहित्य-समीक्षा का आरंभ हुआ और इसलिए हम इसे एक निश्चित प्रकाश-स्तंभ मान सकते हैं। १९०० ई. में "सरस्वती" और "सुदर्शन" के अवतरण के साथ हिंदी पत्रकारिता के इस दूसरे युग का पटाक्षेप हो जाता है। 'हंस' का प्रकाशन सन् १९३० ई. में बनारस से हुआ। इसके संपादक प्रेमचंद थे। प्रेमचंद के संपादकत्व में यह पत्रिका हिंदी की प्रगति में अत्यंत सहायक सिद्ध हुई। सन् १९३३ में प्रेमचंद ने इसका 'काशी विशेषांक' बड़े परिश्रम से निकाला। वे सन् १९३० से १९३६ तक इसके संपादक रहे। उसके बाद जैनेंद्र कुमार और शिवरानी देवी ने इसका संपादन किया। इसके विशेषांकों में "प्रेमचंद स्मृति अंक", "एकांकी नाटक अंक" (१९३८), "रेखाचित्र अंक", "कहानी अंक", "प्रगति अंक" तथा "शांति अंक" विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। जैनेंद्र और शिवरानी देवी के बाद इसके संपादक शिवदान सिंह चौहान और श्रीपत राय, फिर अमृत राय और फिर नरोत्तम नागर रहे। बहुत दिनों बाद सन् १९५९ ई. में उसका बृहत् संकलन का रूप सामने आया, जिसमें बालकृष्ण राव और अमृत राय के संपादकत्व में आधुनिक साहित्य और उससे संबंधित नवीन मूल्यों पर विचार किया गया।

इस तरह इन २५ वर्षों में हिंदी पत्रकारिता अनेक दिशाओं में विकसित हुई। प्रारंभिक पत्र शिक्षा-प्रसार और धर्म-प्रचार तक सीमित थे। भारतेंदु ने सामाजिक, राजनीतिक और साहित्यिक दिशाएँ भी विकसित कीं। उन्होंने ही "बालाबोधनी" (१८७४) नाम से पहला स्त्री-मासिक-पत्र चलाया। कुछ वर्ष बाद महिलाओं को स्वयं इस क्षेत्र में उतरते देखते हैं—"भारतभगिनी" (हरदेवी, १८८८), "सुगृहिणी" (हेमंतकुमारी, १८८९)। इन वर्षों में धर्म के क्षेत्र में आर्य समाज और सनातन धर्म के प्रचारक विशेष सक्रिय थे। ब्रह्मसमाज और राधास्वामी मत से संबंधित कुछ पत्र और मिर्ज़ापुर जैसे ईसाई केंद्रों से कुछ ईसाई धर्म संबंधी पत्र भी सामने आते हैं, परंतु युग की धार्मिक प्रतिक्रियाओं को हम आर्य समाज के और पौराणिकों के पत्रों में ही पाते हैं।

आज ये पत्र कदाचित् उतने महत्वपूर्ण नहीं जान पड़ते, परंतु इसमें संदेह नहीं कि उन्होंने हिंदी भाषा की गद्य-शैली को पुष्ट किया और जनता को नए विचारों की ज्योति दी। इन धार्मिक वाद-विवादों के फलस्वरूप समाज के विभिन्न वर्ग और संप्रदाय सुधार की ओर अग्रसर हुए और बहुत शीघ्र ही सांप्रदायिक पत्रों की बाढ़ आ गई। सैकड़ों की संख्या में विभिन्न जातीय और वर्गीय पत्र प्रकाशित हुए और कहा जा सकता है कि उन्होंने असंख्य जनों को वाणी भी दी। लेकिन आज वही पत्र हमारी इतिहास-चेतना में विशेष महत्व रखते हैं, जिन्होंने भाषा-शैली, साहित्य अथवा राजनीति के क्षेत्र में कोई अप्रतिम कार्य किया हो। साहित्यिक दृष्टि से हिंदी प्रदीप (१८७७), ब्राह्मण (१८८३), क्षत्रियपत्रिका (१८८०), आनंद कादंबिनी (१८८१), भारतेंदु (१८८२), देवनागरी प्रचारक (१८८२), वैष्णव पत्रिका (पश्चात् पीयूषप्रवाह, १८८३), कवि व चित्रकार (१८९१), नागरी नीरद (१८९३), साहित्य सुधानिधि (१८९४) और राजनीतिक दृष्टि से भारतमित्र (१८७७), उचित वक्ता (१८७८), सार सुधानिधि (१८७८), भारत उदय (दैनिक, १८८३), भारत जीवन (१८४), भारतोदय (दैनिक, १८८५), शुभचिंतक (१८८७) और हिंदी बंगवासी (१८९०) की भूमिका विशेष तौर पर महत्वपूर्ण है। इन पत्रों में हमारे १९वीं शताब्दी के साहित्य-रसिकों, हिंदी के कर्मठ उपासकों, शैलीकारों और चिंतकों की सर्वश्रेष्ठ निधि सुरक्षित है। यह क्षोभ का विषय है कि हम इस महत्वपूर्ण सामग्री का पत्रों की फाइलों से उद्धार नहीं कर सके। बालकृष्ण भट्ट, प्रतापनारायण मिश्र, सदानंद मिश्र, रुद्रदत्त शर्मा, अंबिकादत्त व्यास और बालमुकुंद गुप्त जैसे सजीव लेखकों की कलम से निकले हुए न जाने कितने निबंध, टिप्पणी, लेख, पंच, हास-परिहास और स्केच आज हमें अलभ्य हो रहे हैं। आज भी हमारे पत्रकार उनसे बहुत कुछ सीख सकते हैं। अपने समय में तो वे अग्रणी थे ही।

प्रथम महायुद्ध की उत्तेजना ने एक बार फिर कई दैनिक पत्रों को जन्म दिया। कलकत्ता से "कलकत्ता समाचार", "स्वतंत्र" और "विश्वामित्र" प्रकाशित हुए; बंबई से "वेंकटेश्वर समाचार" ने अपना दैनिक संस्करण प्रकाशित करना आरंभ किया और दिल्ली से "विजय" निकला। १९२१ में काशी से "आज" और कानपुर से "वर्तमान" प्रकाशित हुए। इस प्रकार हम देखते हैं कि १९२१ में हिंदी पत्रकारिता फिर एक बार करवटें लेती है और राजनीतिक क्षेत्र में अपना नया जीवन आरंभ करती है। हमारे साहित्यिक पत्रों के क्षेत्र में भी नई प्रवृत्तियों का आरंभ इसी समय से होता है। फलतः बीसवीं शती के पहले बीस वर्षों को हम हिंदी पत्रकारिता का तीसरा चरण कह सकते हैं। आधुनिक युग (१९२१) के बाद हिंदी पत्रकारिता का नया काल आरंभ होता है। इस युग में हम राष्ट्रीय और साहित्यिक चेतना को साथ-साथ पल्लवित पाते हैं। इसी समय के लगभग हिंदी का प्रवेश विश्वविद्यालयों में हुआ और कुछ ऐसे कृती संपादक सामने आए जो अंग्रेज़ी की पत्रकारिता से पूर्णतः परिचित थे और जो हिंदी पत्रों को अंग्रेज़ी, मराठी और बँगल/बंगला के पत्रों के समकक्ष लाना चाहते थे। फलतः साहित्यिक पत्रकारिता में एक नए युग का आरंभ हुआ। राष्ट्रीय आंदोलनों ने हिंदी की राष्ट्रभाषा के लिए योग्यता पहली बार घोषित की और जैसे-जैसे राष्ट्रीय आंदोलनों का बल बढ़ने लगा, हिंदी के पत्रकार और पत्र अधिक महत्व पाने लगे। १९२१ के बाद गांधी जी के नेतृत्व में राष्ट्रीय आंदोलन मध्यवर्ग तक सीमित न रहकर ग्रामीणों और श्रमिकों तक पहुँच गया और उसके इस प्रसार में हिंदी पत्रकारिता ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। सच तो यह है कि हिंदी पत्रकार राष्ट्रीय आंदोलनों की अग्र पंक्ति में थे और उन्होंने विदेशी सत्ता से डटकर मोर्चा लिया। विदेशी सरकार ने अनेक बार नए-नए कानून बनाकर समाचार-पत्रों की स्वतंत्रता पर कुठाराघात किया, परंतु जेल, जुर्माना और अनेकानेक मानसिक और आर्थिक कठिनाइियाँ झेलते हुए भी हमारे पत्रकारों ने स्वतंत्र विचार की दीपशिखा जलाए रखी।

कर्मवीर (१९२४), सैनिक (१९२४), स्वदेश (१९२१), श्रीकृष्णसंदेश (१९२५), हिंदूपंच (१९२६), स्वतंत्र भारत (१९२८), जागरण (१९२९), हिंदी मिलाप (१९२९), सचित्र दरबार (१९३०), स्वराज्य (१९३१), नवयुग (१९३२), हरिजन सेवक (१९३२), विश्वबंधु (१९३३), नवशक्ति (१९३४), योगी (१९३४), हिंदू (१९३६), देशदूत (१९३८), राष्ट्रीयता (१९३८), संघर्ष (१९३८), चिनगारी (१९३८), नवज्योति (१९३८), संगम (१९४०), जनयुग (१९४२), रामराज्य (१९४२), संसार (१९४३), लोकवाणी (१९४२), सावधान (१९४२), हुंकार (१९४२), सन्मार्ग (१९४३) और जनवार्ता (१९७२) जैसी पत्र-पत्रिकाओं की इस समय धूम रही। इनमें से अधिकांश साप्ताहिक थीं, परंतु जनमन के निर्माण में उनका योगदान महत्वपूर्ण रहा है।

जहाँ तक पत्र-कला का संबंध है, वहाँ तक हम स्पष्ट रूप से कह सकते हैं कि तीसरे और चौथे युग के पत्रों में धरती और आकाश का अंतर है। आज पत्र-संपादन वास्तव में उच्च कोटि की कला है। राजनीतिक पत्रकारिता के क्षेत्र में "आज" (१९२१) और उसके संपादक स्वर्गीय बाबूराव विष्णु पराड़कर का लगभग वही स्थान है, जो साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी को प्राप्त है। सच तो यह है कि "आज" ने पत्र-कला के क्षेत्र में एक महान् संस्था का काम किया है और उसने हिंदी को बीसियों पत्र-संपादक और पत्रकार दिए हैं।

बीसवीं शताब्दी की पत्रकारिता हमारे लिए अपेक्षाकृत निकट है और उसमें बहुत कुछ पिछले युग की पत्रकारिता की ही विविधता और बहुरूपता मिलती है। १९वीं शती के पत्रकारों को भाषा-शैली के क्षेत्र में अव्यवस्था का सामना करना पड़ा था। उन्हें एक ओर अंग्रेज़ी और दूसरी ओर उर्दू के पत्रों के सामने अपनी बात रखनी थी। अभी हिंदी में रुचि रखने वाली जनता बहुत छोटी थी। धीरे-धीरे परिस्थिति बदली और हम हिंदी पत्रों को साहित्य और राजनीति के क्षेत्र में नेतृत्व करते पाते हैं। इस शताब्दी से धर्म और समाज-सुधार के आंदोलन कुछ पीछे रह गए और जातीय चेतना ने धीरे-धीरे राष्ट्रीय चेतना का रूप ग्रहण कर लिया। फलतः अधिकांश पत्र साहित्य और राजनीति को ही लेकर चले।

साहित्यिक पत्रों के क्षेत्र में पहले दो दशकों में आचार्य द्विवेदी द्वारा संपादित "सरस्वती" (१९०३–१९१८) का नेतृत्व रहा। वस्तुतः इन बीस वर्षों में हिंदी के मासिक पत्र एक प्रभावी साहित्यिक शक्ति के रूप में सामने आए। हिंदी में साहित्यिक पत्रिकाओं का लंबा और समृद्ध इतिहास रहा है। १९२१ के बाद साहित्य-क्षेत्र में जो पत्र आए, उनमें प्रमुख हैं: माधुरी (१९२३), मर्यादा, चाँद (१९२३), मनोरमा (१९२४), समालोचक (१९२४), चित्रपट (१९२५), कल्याण (१९२६), सुधा (१९२७), विशाल भारत (१९२८), त्यागभूमि (१९२८), हंस (१९३०), गंगा (१९३०), विश्वामित्र (१९३३), रूपाभ (१९३८), साहित्य संदेश (१९३८), कमला (१९३९), मधुकर (१९४०), जीवन-साहित्य (१९४०), विश्वभारती (१९४२), संगम (१९४२), कुमार (१९४४), नया साहित्य (१९४५), पारिजात (१९४५), हिमालय (१९४६) आदि।

शृंखलित उपन्यास और कहानी के रूप में भी कई पत्र प्रकाशित हुए—जैसे उपन्यास (१९०१), हिंदी नाविल (१९०१), उपन्यास लहरी (१९०२), उपन्यास सागर (१९०३), उपन्यास कुसुमांजलि (१९०४), उपन्यास बहार (१९०७), उपन्यास प्रचार (१९१२)। केवल कविता अथवा समस्यापूर्ति लेकर अनेक पत्र उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में निकलने लगे थे; वे चलते रहे। गंभीर समालोचना के क्षेत्र में "समालोचक" (१९०२) और ऐतिहासिक शोध से संबंधित "इतिहास" (१९०५) का प्रकाशन भी महत्वपूर्ण घटनाएँ हैं। परंतु "सरस्वती" ने 'मिसलेनी' (Miscellany) के रूप में जो आदर्श रखा था, वह अधिक लोकप्रिय रहा और इस श्रेणी के पत्रों में उसके साथ कुछ थोड़े ही पत्रों का नाम लिया जा सकता है, जैसे—"भारतेंदु" (१९०५), नागरी हितैषिणी पत्रिका, बाँकीपुर (१९०५), नागरीप्रचारक (१९०६), मिथिलामिहिर (१९१०) और इंदु (१९०९)। "सरस्वती" और "इंदु" दोनों हमारी साहित्य-चेतना के इतिहास के लिए महत्वपूर्ण हैं और एक तरह से हम उन्हें उस युग की साहित्यिक पत्रकारिता का उत्कर्ष भी कह सकते हैं। "सरस्वती" के माध्यम से आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी और "इंदु" के माध्यम से पंडित रूपनारायण पांडेय ने जिस संपादकीय सतर्कता, अध्यवसाय और ईमानदारी का आदर्श हमारे सामने रखा, वह हमारी पत्रकारिता को एक नई दिशा देने में समर्थ हुआ।

साहित्यिक पत्रकारिता उत्कर्ष पर पहुँची, परंतु राजनीतिक क्षेत्र में हिंदी पत्रकारिता को नेतृत्व प्राप्त नहीं हो सका। पिछले युग की 'राजनीतिक पत्रकारिता' का केंद्र कलकत्ता था। कलकत्ता हिंदी प्रदेश से दूर था, इसलिए हिंदी प्रदेश को राजनीतिक दिशा में जागरूक नेतृत्व कुछ देर से मिला। हिंदी प्रदेश का पहला दैनिक राजा रामपाल सिंह का द्विभाषीय "हिंदुस्तान" (१८८३) है, जो अंग्रेज़ी और हिंदी में कालाकाँकर से प्रकाशित होता था। दो वर्ष बाद (१८८५ में) बाबू सीताराम ने "भारतोदय" नाम से एक दैनिक पत्र कानपुर से निकालना शुरू किया। परंतु ये दोनों पत्र दीर्घजीवी नहीं हो सके और साप्ताहिक पत्रों को ही राजनीतिक विचारधारा का वाहन बनना पड़ा। वास्तव में उन्नीसवीं शताब्दी में कलकत्ता के भारतमित्र, बंगवासी, सार सुधानिधि और उचित वक्ता ही हिंदी प्रदेश की राजनीतिक भावना का प्रतिनिधित्व करते थे। इनमें कदाचित् "भारतमित्र" ही सबसे अधिक स्थायी और शक्तिशाली था।

उन्नीसवीं शताब्दी में बंगाल और महाराष्ट्र लोक-जागृति के केंद्र थे और उग्र राष्ट्रीय पत्रकारिता में भी ये ही प्रांत अग्रणी थे। हिंदी प्रदेश के पत्रकारों ने इन प्रांतों के नेतृत्व को स्वीकार कर लिया; अतः बहुत दिनों तक उनका स्वतंत्र राजनीतिक व्यक्तित्व विकसित नहीं हो सका। फिर भी हम "अभ्युदय" (१९०५), "प्रताप" (१९१३), "कर्मयोगी", "हिंदी केसरी" (१९०४–१९०८) आदि के रूप में हिंदी राजनीतिक पत्रकारिता को आगे बढ़ते पाते हैं। आधुनिक साहित्य के अनेक अंगों की भाँति हमारी पत्रकारिता भी नई कोटि में सम्मिलित हो गई और उसमें मुख्यतः हमारे मध्यवित्त वर्ग की सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक और राजनीतिक हलचलों का प्रतिबिंब भास्वर है। वास्तव में पिछले १८० वर्षों का सच्चा इतिहास हमारी पत्र-पत्रिकाओं से ही संकलित हो सकता है। बंगला के 'कलेर कथा' ग्रंथ में पत्रों के अवतरणों के आधार पर बंगाल के उन्नीसवीं शताब्दी के मध्यवित्तीय जीवन के आकलन का प्रयत्न हुआ है। हिंदी में भी ऐसा प्रयत्न वांछनीय है। एक तरह से उन्नीसवीं शती में 'साहित्य' कही जा सकने वाली चीज़ बहुत कम है और जो है भी, वह पत्रों के पृष्ठों में ही पहले-पहल सामने आई है। भाषा-शैली के निर्माण और जातीय शैली के विकास में पत्रों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है, परंतु बीसवीं शती के पहले दो दशकों के अंत तक मासिक पत्र और साप्ताहिक पत्र ही हमारी साहित्यिक प्रवृत्तियों को जन्म देते और विकसित करते रहे हैं। द्विवेदी युग के साहित्य को हम "सरस्वती" और "इंदु" में जिस प्रयोगात्मक रूप में देखते हैं, वही उस साहित्य का असली रूप है। १९२१ ई. के बाद साहित्य बहुत कुछ पत्र-पत्रिकाओं से स्वतंत्र होकर अपने पैरों पर खड़ा होने लगा, परंतु फिर भी विशिष्ट साहित्यिक आंदोलनों के लिए हमें मासिक पत्रों के पृष्ठ ही उलटने पड़ते हैं।

राजनीतिक चेतना के लिए तो पत्र-पत्रिकाएँ हैं ही। वास्तव में हमारे मासिक साहित्य की प्रौढ़ता और विविधता में किसी प्रकार का संदेह नहीं हो सकता। हिंदी की अनेकानेक प्रथम श्रेणी की रचनाएँ मासिकों द्वारा ही पहले प्रकाश में आई और अनेक श्रेष्ठ कवि और साहित्यकार पत्रकारिता से भी संबंधित रहे। हमारे मासिक पत्र जीवन और साहित्य के सभी अंगों की पूर्ति करते रहे हैं। अब विशेषज्ञता की ओर भी ध्यान गया है। साहित्य की प्रवृत्तियों की जैसी विकासमान झलक पत्रों में मिलती है, वैसी पुस्तकों में नहीं मिलती। वहाँ हमें साहित्य का सक्रिय, सप्राण, गतिशील रूप प्राप्त होता है। १९२७ में मध्य भारत हिंदी प्रचार समिति, इंदौर से साहित्यिक पत्रिका 'वीणा' निकलने लगी।

लघु पत्रिका (लिटिल मैगजीन) आंदोलन मुख्य रूप से पश्चिम में प्रतिरोध (प्रोटेस्ट) के औज़ार के रूप में शुरू हुआ था। यह प्रतिरोध राज्य-सत्ता, उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद या धार्मिक वर्चस्ववाद—किसी के भी विरुद्ध हो सकता था। लिटिल मैगजीन आंदोलन की विशेषता उससे जुड़े लोगों की प्रतिबद्धता तथा सीमित आर्थिक संसाधनों में तलाशी जा सकती थी। अक्सर बिना किसी बड़े औद्योगिक घराने की मदद लिए, व्यक्तिगत अथवा छोटे सामूहिक प्रयासों के परिणामस्वरूप निकलने वाली ये पत्रिकाएँ अपने समय के महत्वपूर्ण लेखकों को छापती रही हैं। भारत में भी सामाजिक चेतना के बढ़ने के साथ-साथ बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में लघु पत्रिकाएँ प्रारंभ हुईं।

१९५० से लेकर १९८० तक का दौर हिंदी की लघु पत्रिकाओं के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण रहा। यह वह दौर था जब नई-नई मिली आज़ादी से मोहभंग शुरू हुआ था और बहुत बड़ी संख्या में लोग विश्वास करने लगे थे कि बेहतर समाज बनाने में साहित्य की निर्णायक भूमिका हो सकती है। दरअसल, हिंदी में लघु पत्रिका आंदोलन की शुरुआत छठे दशक में व्यावसायिक पत्रिकाओं के जवाब के रूप में की गई। इस आंदोलन का श्रेय हम हिंदी के वरिष्ठ कवि विष्णुचंद्र शर्मा को दे सकते हैं। उन्होंने १९५७ में बनारस से 'कवि' का संपादन-प्रकाशन शुरू किया था। कालांतर में और भी कई लघु पत्रिकाएँ व्यक्तिगत प्रयासों और प्रकाशन-संस्थानों से निकलीं, जिन्होंने हिंदी साहित्य की तमाम विधाओं को न केवल समृद्ध किया, बल्कि उनका विकास भी किया।

बेनेट कोलमैन एंड कंपनी तथा हिंदुस्तान टाइम्स लिमिटेड की पत्रिकाओं—धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, सारिका, कादंबिनी, दिनमान और माधुरी जैसी बड़ी पूँजी से निकलने वाली पत्रिकाओं के मुकाबले अणिमा, कहानी, नई कहानियाँ, कल्पना, लहर, वातायन, बिंदु, क्यों, तटस्थ, वाम, उत्तरार्ध, आरंभ, ध्वजभंग, सिर्फ, हाथ, कथा, आलोचना, कृति, क ख ग, माध्यम जैसी पत्रिकाएँ बड़े प्रतिष्ठानों से नहीं, बल्कि लेखकों के व्यक्तिगत, निजी प्रयत्नों से छोटे पैमाने पर निकलीं। उस वक़्त ऐसी पत्रिकाओं की जैसे झड़ी ही लग गई: समझ, आवेग, सनीचर, अकविता, आकंठ, इबारत, जारी, ज़मीन, आइना, कंक, अब, आमुख, तेवर, धरातल, आवेश, धरती, वयं, संबोधन, संप्रेषण जैसी पत्रिकाएँ निकलीं जो सीमित संसाधनों, व्यक्तिगत प्रयासों या लेखक-संगठनों की देन थीं। इन पत्रिकाओं का मुख्य स्वर साम्राज्यवाद-विरोध था और ये शोषण, धार्मिक कठमुल्लापन, लैंगिक असमानता जैसी प्रवृत्तियों के विरुद्ध खड़ी दिखाई देती थीं।

एक समय तो ऐसा भी आया जब मुख्यधारा के बहुत से लेखकों ने पारिश्रमिक का मोह छोड़कर बड़ी पत्रिकाओं के लिए लिखना बंद कर दिया और वे केवल इन लघु पत्रिकाओं के लिए ही लिखते रहे। एक दौर ऐसा भी आया जब बड़े घरानों की पत्रिकाओं में छपना शर्म की बात समझा जाता था और लघु पत्रिकाओं में छपने का मतलब साहित्यिक समाज की स्वीकृति की गारंटी होता था। इन्होंने रचनाशीलता का एक अलग ही माहौल बनाया। इनमें से ज्यादातर में दृष्टि थी, रचना-विवेक था और इन्हें लेखकों का अकुंठित सहयोग प्राप्त था। लघु पत्रिकाएँ घटनाओं की जड़ तक पहुँचकर सच्चाई को उजागर करने का काम कर रही थीं। इनसे एक ओर जहाँ नवलेखन पल्लवित होता है, वहीं सामान्य जन की आशा-आकांक्षाओं को अभिव्यक्ति मिलती है। लोग पारिश्रमिक देने वाली और लेखक को स्टार बनाने वाली पत्रिकाओं में छपने की जगह इनमें छपना गौरव की बात समझते थे। सारी बड़ी बहसें इन्हीं छोटी पत्रिकाओं में चली हैं। आज जो भी लिखा जा रहा है, उसके प्रकाशन का मंच यही पत्रिकाएँ हैं।

लेकिन इन लघु पत्रिकाओं की सीमा भी है: इनका प्रसार बहुत कम होता है (वैसे, अगर संतोष करना चाहें तो यह तथ्य कि 'टाइम्स लिटरेरी सप्लीमेंट' और 'न्यूयार्क रिव्यू ऑफ बुक्स' की भी ७-८ हजार प्रतियाँ ही छपती हैं); दूसरे, कुकुरमुत्तों की तरह फैलने वाली आज की इन पत्रिकाओं में संपादकीय दृष्टि का अभाव भी दिखाई देता है। इनमें रचनाओं का अभाव भी होता है। संपादक की महत्त्वाकांक्षा भी इनकी एक सीमा है। व्यावसायिक/आर्थिक विवशताएँ तो हैं ही। आज राष्ट्रीय एवं वैश्विक कारणों से न तो लघु पत्रिकाएँ निकालने वालों के मन में पुराना जोश बाकी है और न ही उनमें छपना पहले जैसी विशिष्टता का अहसास कराता है; फिर भी लघु पत्रिकाओं में छपी सामग्री का अपना एक ऐतिहासिक महत्व है। हिंदी साहित्य के बहुत सारे विवादों, आंदोलनों, प्रवृत्तियों को निर्धारित करने वाली सामग्री और महान रचनाएँ इन लघु पत्रिकाओं के पुराने अंकों में समाई हुई हैं। इनमें से बहुत सारी सामग्री कभी पुनर्मुद्रित नहीं हुई। साहित्य के गंभीर पाठकों एवं शोधार्थियों के लिए इनका ऐतिहासिक महत्व है। अब भी लघु पत्रिकाएँ सामाजिक व राजनीतिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए साहित्यिक चेतना जगाने का काम कर रही हैं।

टेलीविज़न समाचारों के आने के बाद समाचार के क्षेत्र में क्रांति आई—जल्दी और ताज़ा ख़बरों की माँग बढ़ी, फोटो का महत्त्व बढ़ा, स्वयं को देखने, सजने-संवरने और ज़्यादा से ज़्यादा मुखर होने की प्रवृत्ति में इज़ाफ़ा हुआ। व्यक्तिवाद में वृद्धि हुई, और इसके साथ-साथ ख़बरों को छिपाने या गलत ख़बर देने की प्रवृत्ति में भी वृद्धि हुई है। खासकर मानवाधिकारों के हनन की ख़बरों को छिपाने के मामले में मीडिया (विशेषकर टीवी) सबसे आगे है। चूँकि मानवाधिकार का संदर्भ किसी व्यक्ति के जीवन, स्वतंत्रता और गरिमा से सम्बद्ध है, इसलिए 'मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा' (१९४८) विश्व की एक महत्वपूर्ण घटना है और संयुक्त राष्ट्र संघ की महान उपलब्धि है। मानवाधिकार स्थैतिक नहीं हैं; ये गतिशील हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ के विकास कार्यक्रम के तहत हर वर्ष प्रकाशित मानव विकास रिपोर्ट में नए आयामों की झलक मिलती है। वे सब तत्त्व जो मानव के विकास के मार्ग में बाधक हैं, वहाँ मानवाधिकारों का उल्लंघन है। रोज़गार भी उतना ही बड़ा मानवाधिकार है, जितना जीने का अधिकार है। महँगाई भी मानवाधिकार का हनन है; प्रदूषित पर्यावरण मानवाधिकार पर अतिक्रमण है।

उत्पादक, उत्पाद और उपभोक्ता के इस दौर में ख़बरों को भी उत्पाद बना दिया गया है। जो बिक सकेगा, वही ख़बर है। अफ़सोस की बात है कि तथाकथित बिकाऊ ख़बरें भी ऐसी हैं कि उनका वास्तविक खरीदार कोई है भी या नहीं, यह पता करने की कोशिश नहीं की जा रही है। बिना किसी विकल्प के उन तथाकथित बिकाऊ ख़बरों को खरीदने (देखने, सुनने, पढ़ने) के लिए लक्ष्य-समूह को मजबूर किया जा रहा है। ख़बरों के ‘उत्पादकों’ के पास इस बात का भी तर्क है कि यदि उनकी ‘बिकाऊ’ ख़बरों में दम नहीं होता तो चैनलों की टीआरपी और अख़बारों की पाठक-संख्या ('रीडरशिप') कैसे बढ़ती?
हारवर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रहे सैमुएल हंटिंगटन ने अपनी चर्चित पुस्तक ‘सभ्यताओं का संघर्ष’ में यह स्थापना दी थी कि अब विचारों की समाप्ति का युग है। उनकी बातों का थोड़ा विस्तार किया जाए तो अब संघर्ष विचारधाराओं के कारण नहीं, बल्कि किसी बेज़ुबानों को ज़ुबान देने या किसी अव्यक्त को व्यक्त करने के लिए नहीं—अपितु मीडिया-समूहों के बीच मौजूद आर्थिक अंतर के लिए हो रहा है।

बड़ी-बड़ी कंपनियों का रूप लिए जा रहे इन समाचार माध्यमों में क्या कॉरपोरेट-हित के अलावा भी कोई बात होती है? जन-सरोकारों की बात भी आपको पढ़ने-देखने-सुनने को मिलती है? नहीं! अगर कुछ समूह गाँव-गरीब-किसान की बात करते भी हैं, तो स्वाभाविक तौर पर नहीं, बल्कि लोकतंत्र को कमज़ोर करने वाले भ्रष्ट तत्त्वों द्वारा प्रायोजित-प्रभावित होकर ही। सरकारी विज्ञापनों द्वारा रेवड़ियाँ पाने की आँधी में चाहे छोटे और मंझोले समाचार माध्यम हों या तथाकथित प्रगतिशील—सब गंगा में डुबकियाँ लगा रहे हैं। उधर सरकार या संसदीय व्यवस्था को तार-तार करने का मंसूबा पाले देशी-विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के समूह तथा गैर-सरकारी गिरोहों द्वारा उपलब्ध करवाए गए फंड को पाकर लोकतंत्र के खिलाफ युद्ध करने वाले प्रायोजित समूहों के मध्य आपको निष्पक्ष मीडिया ढूँढे नहीं मिलेगा। मीडिया का मालिकाना चरित्र (ओनरशिप कैरेक्टर) समझे बिना पत्रकारिता और उसकी सीमाओं को समझना मुश्किल होगा। जिस मीडिया को करोड़ों रुपये मैनेज करने होते हैं, वह देश की चिंता क्यों करेगा?

पत्रकार दिलीप मंडल ने एक गोष्ठी में मीडिया का पूरा परिदृश्य बताते हुए कहा कि पत्रकार कितना भी ईमानदार हो जाए, ओनरशिप स्ट्रक्चर की वजह से वह 'प्रो-पीपल' (जन-उन्मुख) नहीं हो सकता। दिलीप मंडल ने 'सकाल' के प्रबंध निदेशक की एक बात उद्धृत की थी कि "मैं ख़बर और विचार पाठकों को बेचता हूँ और अपने पाठक विज्ञापनदाताओं को दे देता हूँ।"

'न्यू मीडिया' की बात करें तो कहा जाता है कि यह संचार का वह संवादात्मक (Interactive) स्वरूप है, जिसमें इंटरनेट का उपयोग करते हुए हम पॉडकास्ट, आरएसएस फ़ीड, सोशल नेटवर्क (फ़ेसबुक, माईस्पेस, ट्विटर), ब्लॉग्स, विकी, टेक्स्ट मैसेजिंग इत्यादि के जरिए पारस्परिक संवाद स्थापित करते हैं। यह संवाद-माध्यम बहु-संचार संवाद का रूप धारण कर लेता है, जिसमें पाठक/दर्शक/श्रोता तुरंत अपनी टिप्पणी न केवल लेखक/प्रकाशक से साझा कर सकते हैं, बल्कि अन्य लोग भी प्रकाशित/प्रसारित/संचारित विषय-वस्तु पर अपनी टिप्पणी दे सकते हैं। ये टिप्पणियाँ एक से अधिक भी हो सकती हैं, यानी बहुधा सशक्त टिप्पणियाँ परिचर्चा में परिवर्तित हो जाती हैं। उदाहरणतः आप फ़ेसबुक को ही लें—यदि आप कोई संदेश प्रकाशित करते हैं और बहुत से लोग आपकी विषय-वस्तु पर टिप्पणी देते हैं, तो कई बार पाठक-वर्ग परस्पर परिचर्चा आरंभ कर देते हैं और लेखक एक से अधिक टिप्पणियों का उत्तर देता है।

मीडिया के इस बदले रुख से उन पत्रकारों की चिंता बढ़ती जा रही है, जो यह मानते हैं कि मीडिया का कार्य समाज को जागरूक करना, शिक्षित करना और सामाजिक सरोकारों के प्रति संवेदनशील बनाना है। दूसरी ओर उन पत्रकारों की भी कमी नहीं है, जो बाज़ारीकरण के दौर में मीडिया को व्यवसाय के रूप में देख रहे हैं। आज इंटरनेट ब्लॉगिंग, डिजिटल बुक्स, ई-मैगज़ीन्स, वेबज़ीन्स आदि का युग है। सूचना प्रौद्योगिकी के इस विकसित समय में विज़ुअल मीडिया की भूमिका सर्वोपरि एवं सर्वग्राह्य हो गई है; ऐसे में पत्रिकाओं का भविष्य भारत के दूर-दराज के कस्बों और गाँवों में दिखाई देता है। साहित्यिक पत्रकारिता अब बस इतिहास की वस्तु बनती जा रही है।

१ सितंबर २०२६

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