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महर्षि कश्यप के वंशज
सम्पाति और जटायु
- केशवचंद्र अग्रवाल
महर्षि कश्यप की पत्नी विनिता (वनिता) से दो
पुत्र हुए— अरुण और गरुड़। अरुण सूर्य के सारथी माने जाते हैं। अरुण का
विवाह श्येनी के साथ हुआ और उनके भी दो पुत्र हुए— सम्पाति और जटायु। इन
दोनों भाइयों की शिक्षा दक्षिण के समुद्र तट के निकट 'चंद्रमा' नामक मुनि
के आश्रम में हुई। इस आश्रम में विज्ञान की शिक्षा भी दी जाती थी, जैसे
वायुयान बनाना और उड़ाना। यहीं पर इन दोनों भाइयों ने वायुयान उड़ाने का
प्रशिक्षण प्राप्त किया। सम्पाति बड़े और जटायु छोटे थे; ये दोनों भाई
महाराज दशरथ के समकालीन थे।
एक बार जटायु अपने प्रशिक्षण वायुयान के साथ उत्तर की ओर अयोध्या के पास के
जंगल में पहुँच गए। वहाँ महाराज दशरथ शिकार के लिए निकले हुए थे। महाराज
दशरथ ने जब जटायु को देखा, तो उन्हें अपने पास बुलाया और जटायु से वायुयान
के बारे में वार्तालाप किया। फिर दशरथ ने जटायु से कहा— “हमें एक विमान
चालक की आवश्यकता है। हमें एक दिन पश्चात देवासुर संग्राम के लिए जाना है
और हमारा नियमित विमान चालक अस्वस्थता के कारण लंबी दूरी तक विमान नहीं
उड़ा सकता।”
जटायु नतमस्तक होते हुए बोले— “यह तो मेरा सौभाग्य है महाराज, किंतु पहले
मुझे यह विमान चंद्रमा ऋषि के आश्रम में पहुँचाना होगा।”
महाराज दशरथ ने कहा— “हमारे पास अधिक समय नहीं है। हम अपने विमान से और आप
अपने विमान से चलिए। आप अपना विमान ऋषि के आश्रम में खड़ा करके हमारे साथ
चले आइएगा।”
इस प्रकार महाराज दशरथ जटायु को अपने साथ ले आए। अगले दिन प्रातःकाल ही
महाराज दशरथ ने जटायु के साथ देवलोक की ओर प्रस्थान किया। युद्ध लंबा चला।
इस युद्ध में जटायु ने कई बार महाराज के प्राणों की रक्षा की। युद्ध की
समाप्ति पर जटायु महाराज दशरथ के साथ अयोध्या लौटे। महाराज दशरथ ने जटायु
की सेवा से प्रसन्न होकर उनसे वर माँगने को कहा।
जटायु ने हाथ जोड़कर कहा— “महाराज, मुझे कुछ नहीं चाहिए। मैं कुछ दिन अपने
गुरु के आश्रम में बिताकर, फिर दंडक वन में कुटिया बनाकर जीवन का शेष समय
बिताना चाहता हूँ।” महाराज दशरथ ने कहा— “जैसी तुम्हारी इच्छा, मित्र।”
महाराज ने अपने यान से जटायु को उनके गुरु के आश्रम भिजवा दिया।
वहाँ सम्पाति भी रह रहे थे। एक दिन दोनों भाइयों ने योजना बनाई कि वे आश्रम
के दो यानों से सूर्य की ओर उड़ेंगे और वहाँ अपने पिता के चरण स्पर्श करके
लौटेंगे। योजनानुसार दोनों भाई वायुयान लेकर उड़े, किंतु सूर्य के तेज के
कारण पास पहुँचने से पहले ही उन्हें लौटना पड़ा। जटायु तो सुरक्षित लौट आए,
किंतु सम्पाति का विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया और वे घायल हो गए। चंद्रमा
मुनि ने विद्यार्थियों और शिक्षकों की सहायता से सम्पाति को आश्रम वापस
बुलाया और विमान को ठीक करने के लिए ले आए।
कुछ दिनों के बाद जटायु दंडक वन लौट गए और पंचवटी के पास छोटी सी कुटिया
बनाकर रहने लगे। समय बीतता गया। एक दिन जटायु पेड़ की छाँव में विश्राम कर
रहे थे। उस समय श्रीराम, लक्ष्मण और सीता अपने वनवास काल में थे। जहाँ
जटायु बैठे थे, उसी पेड़ के पास आकर वे आपस में विचार-विमर्श करने लगे कि
गुरु अगस्त्य ने कुटिया बनाने के लिए यही स्थान बताया था।
जटायु वृद्ध हो चुके थे, उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं था और उन्हें खाँसी आ रही
थी। राम को लगा कि शायद कोई उन पर आघात करने वाला है, इसलिए उन्होंने तुरंत
धनुष पर बाण चढ़ाया। तब जटायु ने कहा— “वत्स राम, मैं तुम्हारा शत्रु नहीं,
तुम्हारे पिता दशरथ का मित्र हूँ। जब से तुम अयोध्या से चले हो, तब से मेरी
दृष्टि तुम पर है।” राम ने आगे बढ़कर हाथ जोड़कर जटायु को प्रणाम किया और
पूछा— “तातश्री, आपके अनुसार कौन सा स्थान हमारे रहने के लिए उचित है? हम
अपनी कुटिया कहाँ बनाएँ?”
जटायु ने कहा— “सामने ऊपर की तरफ पंचवटी है, आप अपनी कुटिया वहीं बनाइए।”
राम, लक्ष्मण और सीता पंचवटी में कुटिया बनाकर रहने लगे।
पंचवटी के आसपास कई राक्षस रहते थे और शूर्पणखा उनकी रानी थी। उसने राम और
लक्ष्मण के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा, जिसे दोनों भाइयों ने ठुकरा दिया।
तब शूर्पणखा ने सीता पर आक्रमण करना चाहॉ, तो लक्ष्मण ने उसकी नाक काट दी।
इस घटना के फलस्वरूप शूर्पणखा के भाइयों खर और दूषण ने त्रिशिरा के साथ
मिलकर पंचवटी पर आक्रमण किया, किंतु राम ने उनका और उनकी सेना का विनाश कर
दिया। तब शूर्पणखा लंका गई और रावण से सहायता माँगी।
शूर्पणखा के कहने पर लंकेश्वर रावण सीता-हरण की योजना के साथ पंचवटी की
कुटिया पर ब्राह्मण के रूप में आया। भिक्षुक रूप में रावण ने कपट से माता
सीता को बाहर बुलाया और भिक्षा लेने के बहाने उनका अपहरण करके अपने विमान
से ले जाने लगा। जटायु ने जब माता सीता की चीख-पुकार सुनी, तो वे रावण के
विमान से उलझ गए। दुष्ट रावण ने जटायु की दोनों भुजाएँ काट दीं, जिससे वे
घायल होकर नीचे गिर पड़े और रावण विमान को लेकर दक्षिण दिशा की ओर उड़ गया।
भुजाएँ काटने को कई स्थानों पर "पर काटना" (पंख काटना) भी लिखा गया है।
तुलसीदास जी ने लिखा है कि रावण ने जटायु के 'पर' काट दिए। यहाँ "पर काट
देना" एक मुहावरा भी हो सकता है, जिसका अर्थ है— लाचार कर देना।
उधर राम जब कुटिया में पहुँचे, तो सीता वहाँ नहीं थीं। राम "सीते-सीते"
पुकारते हुए उनकी खोज में निकल पड़े। अचानक उन्हें किसी के कराहने की आवाज़
सुनाई दी। जटायु घायल अवस्था में पड़े 'राम-राम' का जाप कर रहे थे। जटायु
को रक्तरंजित देख प्रभु विचलित हो गए और बोले— “तातश्री, किसने आपकी यह दशा
की है?” जटायु ने कहा— “रावण माता सीता का अपहरण करके अपने विमान से उन्हें
दक्षिण दिशा में ले गया है। मेरे रोकने पर उसने मेरी भुजाएँ काट दीं।”
राम धरती पर बैठकर धीरे-धीरे जटायु को सहलाने लगे। जटायु की आँखें बंद होने
लगीं और उनके मुख से अंतिम शब्द निकला— 'राम'। राम ने लक्ष्मण से लकड़ियों
की व्यवस्था करने को कहा और फिर जटायु की चिता को मुखाग्नि देकर उनका अंतिम
संस्कार किया— “तेहि की क्रिया यथोचित निज कर कीन्ही राम।”
इस घटना के पश्चात रामकथा में सम्पाति का वर्णन मिलता है। सम्पाति ने ही
वानर दल को सीता जी के लंका में होने की सूचना दी थी। जब सम्पाति को अपने
अनुज की मृत्यु का समाचार मिला, तो उन्होंने कहा— “मोहि लै जाहु सिंधु तट,
देउँ तिलांजलि ताही।”
इन कथाओं में ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि अंतिम संस्कार और तिलांजलि की
प्रक्रिया मनुष्यों के लिए होती है, पक्षियों के लिए नहीं। श्रीराम द्वारा
जटायु का अंतिम संस्कार और सम्पाति द्वारा तिलांजलि देना यह संकेत देता है
कि जटायु और सम्पाति मानव (संभवतः गिद्ध गोत्र के) थे, न कि पक्षी। आज भी
गुजरात के कुछ गाँवों में कुर्मी जाति में 'जटायु' गोत्र के लोग मिलते हैं।
१ अप्रैल २०२४ |