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चैत्र
मास की खिली-खिली धूप और नीम की कोपलों की महक चारों ओर
फैली थी। वसंत की इस बहार के साथ ही घरों में चैत्र
नवरात्रि के भजन, मंत्रों की गूँज सुनाई देने लगी थी। आठ
साल का नकुल बहुत खुश था, पर उसकी खुशी का कारण भक्ति से
ज्यादा 'उपहार' और 'हलवा-पूरी' में था।
नकुल ने देखा कि घर में बड़ी सफाई हो रही है, कलश स्थापना
हुई है और उसकी छोटी बहन पीहू को घर में सभी बड़ा लाड़ कर
रहे हैं। उसके लिए माँ नई फ्रॉक भी लाई है। अष्टमी की सुबह
जब घर में नौ कन्याओं के पूजन की तैयारी शुरू हुई, तो नकुल
मचल गया। उसने देखा कि माँ ने सुंदर रंगीन डिब्बे, छोटी
गुड़िया, और चमकदार कंगन सजाकर रखे हैं।
"माँ, मुझे भी भोज में बैठना है! मुझे भी ये उपहार चाहिए,"
नकुल ने ज़िद पकड़ ली।
दादी पास ही बैठी माला जप रही थीं। उन्होंने मुस्कुराते
हुए नकुल को पास बुलाया और कहा, "अरे मेरे लड्डू, ये उपहार
तो उन नन्ही देवियों के लिए हैं जो प्रकृति का रूप हैं।
क्या तुम्हें पता है कि चैत्र नवरात्रि में हम लड़कियों की
ही पूजा क्यों करते हैं?"
नकुल ने मासूमियत से सिर हिलाया, "नहीं दादी, मुझे तो वो
खिलौने अच्छे लग रहे हैं।"
दादी ने उसे समझाते हुए कहा, "देखो नकुल, यह चैत्र का
महीना है जब चारों तरफ नए फूल खिलते हैं, पेड़ नई पत्तियाँ
लाते हैं। जैसे धरती माता नए जीवन को जन्म देती है, वैसे
ही ईश्वर ने केवल स्त्री को यह शक्ति दी है कि वह एक नए
जीवन को इस दुनिया में ला सके। तुम्हारी माँ, तुम्हारी बहन
और ये छोटी लड़कियाँ, ये सब उसी प्रकृति का हिस्सा हैं जो
संसार को आगे बढ़ाती हैं। इनके बिना यह दुनिया रुक जाएगी।
इसीलिए हम इनका सम्मान करते हैं क्योंकि इनमें सृजन की
शक्ति छिपी है।"
नकुल को बात तो समझ आई, पर उसकी नज़र अभी भी उन उपहारों पर
थी। तभी कन्या पूजन शुरू हुआ। आस-पड़ोस की छोटी-छोटी
बच्चियाँ आईं। नकुल ने देखा कि उसकी अपनी छोटी बहन पीहू,
जिसे वह अक्सर खेलते समय परेशान करता था और 'कमज़ोर' कहकर
चिढ़ाता था, आज वह कितनी शांत और तेजस्वी लग रही थी।
जब माँ ने पीहू के पैर धोए और उसे तिलक लगाया, तो नकुल को
पहली बार अहसास हुआ कि जिस बहन से वह रोज़ लड़ता रहता है,
वह तो साक्षात देवी का रूप मानी जाती है। उसे अपनी उन
गलतियों की याद आई जब उसने स्कूल में अपने साथ पढ़ने वाली
लड़कियों का मज़ाक उड़ाया था। पूजन के बाद जब उपहार बाँटने
की बारी आई, तो नकुल ने खुद आगे बढ़कर पीहू को वह चमकदार
गुड़िया वाला डिब्बा दिया। उसने उपहार माँगा नहीं, बल्कि
अपनी बहन के सम्मान में अपना सिर झुका दिया।
दादी ने यह देखा तो उनके चेहरे पर संतोष की चमक आ गई।
उन्होंने नकुल को गले लगाते हुए कहा, "आज तुमने असली पूजा
की है नकुल। उपहारों का लालच तो छोटा है, पर लड़कियों के
प्रति हमेशा सम्मान का भाव रखना सबसे बड़ा उपहार है जो तुम
इस नवरात्रि देवी माँ को दे सकते हो।"
उस दिन के बाद नकुल के मन में लड़कियों के लिए एक नया
नजरिया था। वह समझ गया था कि जो नया जीवन दे सकती है, वह
कभी कमज़ोर नहीं हो सकती, उसे कन्या शक्ति का अहसास हो
चुका था।
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