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इस बार नया साल मनाने के लिए बड़े
पापा, यानी मेरे ताऊ जी ने हम सबको गाँव बुलाया है। जाने वाले
वर्ष के अंतिम दिन शाम से पहले ही हम गाँव पहुँच गए हैं। पापा
और चाचा दोनो ही पढ़-लिख कर शहर चले आए थे। वे दोनो तो बड़े
पापा और दादा-दादी के पीछे भी पड़े थे शहर आकर बस जाने के लिए,
पर कितना अच्छा हुआ कि बड़े पापा और दादी-दादा ने अपना गाँव,
‘गिलाड़ी’ छोड़ना स्वीकार नहीं किया था। वरना आज इस धरती से
इतनी आत्मीयता से जुड़ने का सुयोग कैसे बनता भला।
वसुधैव
कुटुम्बकम का राग कितना भी क्यों ना अलाप लिया जाए परंतु अपनी
स्थानीयता या अपनी व्यक्तिगत चीजों से जो भावनात्मक जुड़ाव
होता है वह पराई चीजों से हो ही नहीं सकता। यही कारण है कि हम
सब पूरे शहरी हो जाने के बावजूद अपनी इस धरती के साथ इस कदर
जुड़े हैं। ख़ैर, वैसे तो न्यूईयर ईव मेन्यू की मेन डिश
वुडफ़ायर्ड पिज़्ज़ा था। उसका सारा सामान हम बाँध-बूँधकर लाए
ही थे। परंतु बड़े पापा ने कह दिया है, बच्चों आज खाना मेरी
पसंद का होगा। लकड़ी फुँका इज्जा-पिज्जा छोड़ो, तुम सब तो
बेफ़िकर होकर नाचो-गाओ, ख़ुशी मनाओ और नए साल का स्वागत करो
अपने स्टाइल में बस।
बिरंची और लोकेस ने घेर के पीछे वाले खेत को समतल कर दिया है।
उसमें बड़े पापा ने टैंट लगवा दिया है। वहीं पीछे की साइड में
खाना बन रहा है। बड़े पापा ने अपने पसंदीदा हलवाई बिट्टे को
बुलाया है। टैंट में चार अलाव रखवा दिए हैं, उन अलावों में
गन्ने को पिलाई के लिए छीलने पर बची सूखी पत्ती से आग जलाई जा
रही है। कुछ सूखी मोटी लकड़ियाँ भी अलाव में डाल दी गई हैं।
टैंट के बाहर पौष माह की त्रयोदशी की जमा देने वाली सर्दी और
घना कोहरा है। टैंट के अंदर कुछ ऊष्मा तो है अंगारों की परन्तु
कुछ ऊष्मा, आत्मीय रिश्तों की भी ज़रूर ही है।
दादी शाम से पहले ही तख़त पर गद्दा डलवाकर, कम्बल ओढ़े अलाव के
पास टैंट में आन विराजी हैं, ताकि ये बिट्टे खाने में रत्ती भर
भी गड़बड़ी ना कर दे। एक तरफ़ चने का साग, शुद्ध घी में सराबोर
धान की रोटी, दाल की कचौड़ियाँ, शाही पनीर, आलू दम और बथुए का
स्वादिष्ट रायता है। दूसरी तरफ़ अपने ही खेत से लाई गई ताजी
गाजरों का हलवा और गुलाब जामुन हैं। हलवा और गुलाब जामुन अपने
ही गाँव की गाय - भैंसों के ताज़ा दूध और मावे से बने हैं।
इतना स्वादिष्ट हलुआ! मुझे याद नहीं मैंने कभी खाया भी है।
ताज़े भोजन, ताजे गुड़ और शुद्ध घी की सुगंध नथुनों में जबरन
घुसी जा रही है। बड़े पापा ने फोके-फोके गन्ने कटवाकर, साफ़
कराकर एक छोटी टेबल पर रखवा दिए हैं। वे बता भी रहे हैं,
बच्चों गन्ने धुलवाकर रखवाए हैं, तुम्हारी ‘हाइजीन’ का ध्यान
करके, थोड़ा-थोड़ा ज़रूर खाना।
यहाँ गाँव में मुझे मेरे बचपन के मित्र राहुल और विनीता आते
वक्त खेतों पर ही मिल गए थे। आते ही उनसे मिलकर मन खुश हो गया
है। मेरे कौस्तुभ भैया, यानि मेरे बड़े पापा के बेटे बैंगलौर
में नौकरी करते थे। वे कई महीनो से गाँव में रहकर वर्क फ़्रम
होम कर रहे हैं। बस यूँ ही गाँव की ‘फील’ लेने के लिए। बुआ की
बेटी कनक मेरी बचपन की साथी है और उसका भाई अर्जुन मेरे भाई
प्रांजल का। चाचा के दोनो बेटे भी आए हैं। सक्षम और देव। बचपन
में हम सारे बच्चों की हर छुट्टी इसी गाँव में बीती है। कई
बरसों बाद आज वे सब स्मृतियाँ पुनर्नवा हो रही हैं।
बड़े पापा ने एम.एस.सी.एजी. की है, वे अब गाँव के प्रधान हैं,
हमारे बहाने आज उन्होंने अपने क्षेत्र के कई महत्वपूर्ण लोगों
की भी दावत का इंतज़ाम किया है। दादा जी, पापा, चाचा और वे सब
लोग रथखाने में मूढ़ों पर कम्बल ओढ़े बैठे हैं। एक अलाव वहाँ
भी जल रहा है। वे सब भी, हम शहरी हो गए ग्रामीणों के उत्सव में
खूब दिलचस्पी ले रहे हैं। आमने - सामने रखे दोनो हुक्कों की
चिलमें अंगारों से भरी दमक रही हैं। बड़े पापा के मित्र,
डॉक्टर रस्तौगी, सीजनल बीमारियों से बचे रहने की कुछ
सावधानियाँ और दवाइयों के विषय में बता रहे हैं। ब्लॉक प्रमुख
अपने ब्लॉक में सड़कों, बिजली, स्वास्थ्य, शिक्षा आदि उपलब्ध
कराए जाने की चर्चा कर रहे हैं। परंतु गन्ना समिति के अध्यक्ष,
प्रिंसिपल अंकल और फ़ौजी चाचा आदि हाल ही में सरकार द्वारा
बनाए गए किसान क़ानूनों की विशेष रूप से चर्चा कर रहे हैं। इस
बरस गन्ने के बढ़े हुए मूल्य को थोड़ा कम बता रहे हैं।
कौस्तुभ भैया के साथ वह कौन है न जाने! उदय? हाँ वही तो है, ये
कितना हैंडसम हो गया है! क्या कहना, कौस्तुभ भैया बता रहे थे
कि वो इंजीनियरिंग कर चुका है। एक चुप सी बात है, जिसे कोई
नहीं जानता। बस मैं जानती हूँ और शायद उदय भी, कह ही दूँ आज?
जब हम छोटे थे तो उदय मुझे बहुत अच्छा लगता था, शायद उसे भी
मैं। क्योंकि वो भी अपनी मोटी-मोटी आँखों से मुझे देखता ही
रहता था। एक बार नहीं, कई-कई बार। बस देखता ही था, कहता कुछ
नहीं था। किशोरावस्था के उन नशीले दिनों में मैं चाहती थी वह
मुझे सिर्फ देखता न रहे। कुछ कह भी दे। कुछ अच्छा सा, कुछ ऐसा
जो मेरे नशे को चार गुना बढ़ा दे, मेरे दिल में अनोखी तरंगें
पैदा कर दे और मैं धरती का आँचल छोड़कर कभी समन्दर पर तैरूँ कभी
आसमान में उड़ती फिरूँ। उससे कुछ कह देने को मुझे भी किसी ने
रोका तो नहीं था। अवसर भी एक नहीं, बहुत से थे मेरे पास।
मुझमें साहस नहीं था, ऐसा तो बिलकुल नहीं था। पर उन नासमझी के
दिनों में शायद यही पता नहीं था कि आखिर कहना क्या होता है! और
शायद यह भी रहा हो कि पहले मैं क्यों कहूँ, ये क्यों नहीं?
नहीं पता था इस कोमल भावना में किसी, ‘पहले आप’ जैसे अहम के
लिए स्थान नहीं होता।
मुझे एक घटना आज भी याद है, सिर्फ याद ही नहीं है, जब याद आती
है तो मेरे भीतर तमाम महमहाते, ताजा-तरीन रंग-बिरंगे फूल खिला
देती है। उस घटना की याद जैसे गर्मियों की तपती साँझ में शीतल
पवन के झोंकें बनकर आती है और ठिठुरती सर्दियों में मुझसे नरम
धूप बनकर लिपट जाती है। यूँ कुछ ख़ास हुआ भी तो नहीं था। उदय की
बुआ की शादी थी, घर व्यवस्थित करने के नाम पर सारा सामान इधर
से उधर हटाया और रखा जा रहा था। जिसे जो काम बताया जा रहा था
हम सब लड़के-लडकियाँ करते जा रहे थे। हुकुम उदय की अम्मा का चल
रहा था। उदय की पड़ोसन बेला भी थी, बेला हर वक्त उदय के साथ लगी
रहती थी, इतनी कि उदय उससे खीझ ही जाता। पर वो उसके खीझने या
झिड़क देने का भी बुरा नहीं मानती थी, यहाँ तक कि वो उसे अपने
घर से चले जाने के लिए भी कह देता, तो भी वो बुरा नहीं मानती
थी, उस वक्त चले जाकर कुछ देर के बाद फिर आ जाती।
उस ‘दिन’ तो नहीं कह सकते क्योकि वह दिन तो लगभग बीत ही चुका
था, साँझ का धुंधलका छा गया था। बेला कोशिश कर रही थी कि उसे
कुछ ऐसा काम मिल जाए जिसमें उसे उदय का साथ मिल जाए। वो उदय के
साथ-साथ या उदय के पीछे-पीछे लगी घूम रही थी। पता नहीं उसने
क्या कहा या क्या किया कि उदय बहुत नाराज हो गया और गुस्सा
करने लगा, वो भी सबके सामने। बेला रोने लगी और रोते -रोते अपने
घर चली गई। मुझे उस दिन लगा कि अच्छा ही हुआ मैंने इस घमंडी
उदय को कोई संकेत नहीं किया था, वह तो बेला की तरह मेरी भी
इतनी भयंकर बेइज्जती कर सकता था। खैर , मैं उदय को पूरी तरह
इग्नोर करके अपने काम में लग गई। मैं ही क्या, हम सब सामान फिर
से व्यवस्थित कराने लगे। थोड़ी ही देर में उदय भी सामान्य हो
गया।
मुझे उसकी अम्मा ने सिलाई मशीन पकड़ा दी। मैं उसे लेकर आँगन पार
पिछले वरांडे में पड़े तखत पर रखने जा रही थी कि बीच में उदय आ
गया और बोला अरे! इतनी भारी मशीन तुम क्यों उठा रही हो, किसने
पकड़ा दी तुम्हें ? लाओ मुझे दो। और वह मेरे हाथ से मशीन लेने
लगा। सिलाई मशीन ऊपर से भारी और नीचे से हल्की और सपाट होती
है। उसका संतुलन बनाए रखने के लिए उसे ठीक बीच से पकड़ कर ही
उठाया जा सकता है अतः मैंने भी उसे बीच से पकड़ा हुआ था। उदय
मशीन मेरे हाथ से लेने लगा तो पकड़ना उसे भी ठीक वहीँ से पड़ा
जहाँ से उसे मैंने पकड़ा हुआ था, अन्यथा वह गिर जाती, हममें से
किसी एक के ऊपर या फिर दोनों के ही। उसने मशीन मुझसे लेने के
लिए अपने दोनों हाथ मेरे दोनों हाथों पर रखकर थोड़ा उठा दिए
ताकि मशीन का सारा बोझ वह ले सके। बोझ पकड़कर वह स्वाभाविक रूप
से थोड़ा सा मेरी और झुक भी गया। मेरी साँस और मेरे हाथ दोनों
फँस गए थे मशीन और उसके हाथों के बीच। वह मेरे हाथों को छोड़ने
का प्रयास तक भी नहीं कर रहा था, ऊपर से मुझे देखकर मुस्कुराए
जा रहा था। मेरी दृष्टि भी उसकी दृष्टि में फँस कर रह गई थी,
उस पल।
साँझ का धुंधलका, लाइट्स अभी जलाई नहीं गई थी। साँझ के
उस धुँधलके में भी साफ़ दिखाई देता, उसकी आँखों का वह गहरा
आकर्षण मैं आज भी भुला नहीं सकी हूँ। मेरे हाथ ना चाहते हुए भी
छूट जाने को कुलबुला रहे थे और उदय मशीन के बोझ से बेखबर, निडर
खड़ा हुआ मेरी आँखों में देखते हुए मुस्कुराए जा रहा था। ‘कोई
क्या कहेगा’ के डर से मैं मुस्कुरा भी नहीं पा रही थी, बस खड़ी
थी सहमी हुई सी। लड़कियों को ‘कोई’ की चिंता करना शायद उनके
बचपन में ही सिखा दिया जाता है, ज़ाहिर है मुझे भी सीखा दिया
गया था। इसीलिए उस अभूतपूर्व अनुभूति और कोरे स्पर्श को मैंने
उस पल पूरा - पूरा जिया ही नहीं। देर बाद उसने मेरे हाथों को
छोड़ा था। मेरी उँगलियों की बाहरी सतह में देर तक उसका स्पर्श
झनझनाता रहा था। मैं फिर बहुत देर तक वहाँ नहीं रुक सकी। बेला,
उदय की डाँट के कारण और मैं उसके प्रेम के कारण, दोनों
अपने-अपने घर भाग आए थे। आज बरसों बाद वही उदय मेरे सामने खड़ा
है। पर आज भी कौस्तुभ भैया के साथ खड़ा है। ज़ाहिर है आज भी मैं
उस वक्त उदय के स्पर्श से अपनी उँगलियों की झनझनाहट को दोहरा
भी नही पा रही हूँ।
उदय ही नहीं हमारे बचपन के कई और दोस्त भी आ गए हैं और आ गई है
सिद्धा पंडितानी भी। वह कह रही है,
“का कहने परधान जी के आज तो बरात गए बिना ई खोड़िया* पड़बा
दियौ। ”
हम सब उसकी बात पर ज़ोर से हँस पड़े हैं। वह हमेशा से हँसी की
ही पात्र समझी जाती रही है।
“जामे हँसबे की कौन बात भई ? छोरा तो छोरा मेई सुसरी छोरिन कू
बी मज़ाक़ बनाबे की सूझ रई है। ” वह खिसिया कर कह रही है।
“अरी सिद्धा, यू खोड़िया काए कूँ है बेसऊरी, यू तो नए बर्स को
जसन है।” दादी उसे बता रही हैं।
“ऐ अम्मा जी, जा बुढ़ापे मैं तुमऊ बहक गई दीखौ। माघ मैं नयौ
बर्स कहाँ ते आ गओ भला, कछु पत्रा कौ हिसाब बी रख लै करौ। नयौ
बर्स तो चैत सै सुरू होत है। ”
“अरी जा ऐमक, तू बस नाम की सिद्धा रई…” दादी ने उसे झिड़का है
और उससे बहस करना व्यर्थ समझ रही हैं या फिर नए बरस का हिसाब
सिद्धा पंडितानी का सही लगा तो चुप हो गई हैं। दादी अक्सर यह
करती ही हैं, अपनी गलती पकड़ी जाने पर बात अगड़म - बगड़म कर देती
हैं और साफ़ बच निकलती हैं। इस वक्त चुप रहकर निकल गई हैं।
अभी म्यूज़िक सिस्टम ऑन किया ही था कि लाईट चली गई है। बड़ी –
बड़ी कई पैट्रोमैक्स जल रही हैं। कुसुम चाची ने अपने घर से
ढोलक मँगा ली है। उनकी ढोलक की थाप दूर तक गूँज रही है। बेला
नाच रही है, “आलू के सन्नाटे* ने मार दिया ननदी…” बेला चोर नज़र
से ही सही पर अब भी बार-बार उदय को देख रही है।
इस बीच हमने खाना खा लिया है। थोड़ी ही देर में लाईट भी आ गई
है, राहुल ने म्यूज़िक सिस्टम फिर से ऑन कर दिया है। हमारे घर
के आस - पास की ग्रामीण लड़कियाँ नए वर्ष के इस उत्सव में
सिर्फ़ आई ही नहीं हैं, पूरी सज-धज के साथ आई हैं। वे बेबाक़ी
से डाँस कर रही हैं, वो भी कौस्तुभ भैया की लिस्ट के अंग्रेज़ी
गीतों की फ़ास्ट बीट्स पर। अगर किसी को पता ना हो तो उनकी वेश
– भूषा और हाव - भाव से कोई मानने को तैयार नहीं होगा कि ये
लड़कियाँ इस गाँव की हैं। ये सब अपनी – अपनी स्कूटियों पर सवार
होकर स्कूल - कॉलेज जाने वाली लड़कियाँ हैं। पर जाने क्यों
मुझे लगा कि इन लड़कियों की प्राथमिकता कैरियर के स्थान पर
फ़ैशन और लुक्स अधिक है। दादी लड़कियों को डपट रही हैं,
“इत्ता काए मटक रई हो छोरियों, बस करौ भतेरो है गओ ‘नू गियर’
को नाच। ”
“दादी जे छोरे ना दीख रए तुमैं मटकत भए। इनन्ने कछु ना कइयों,
हम छोरिन्नें ईं टोकत रहियों उमर भर। ” लड़कियाँ नाचते -नाचते
उल्टा दादी को ही उलाहना दे रही हैं।
हमारे सैलिब्रेशन को चलते घंटों बीत गए हैं, अब बारह बजने को
हैं। हमारा म्यूज़िक और तेज़ हो गया है और अब काउंट डाउन शुरू
टैन, नाइन, एट, सेवन, सिक्स, फ़ाइव, फ़ोर, थ्री, टू, वन…
“हैप्पी न्यू ईयर” हम सबने बुलंद सुर में नए वर्ष का स्वागत
किया है। हमने एक दूसरे को गुलाब जामुन खिलाए हैं। हम एक-
दूसरे के गले मिल रहे हैं। हमारी दादी की सहेली गुरेजनी दादी
उनसे कह रही हैं,
“जे छोरा छोरिन को गले मिलबे को चलन मोय फूटी आँख ना भावै
भगवंती। ”
“अब का भयो अम्मा ?” यह सब देखकर सिद्धा पंडिताइन पूछ रही है।
“बारा बज गए तारीक बदल गई, नयौ बर्स सुरु है गओ, और का भयो। ”
पास बैठी बड़ी माँ उसे बताती हैं।
“तारीक बदल गयी, बो कैसै भला ? तारीक तो बदलै पौ फटबे पै और पौ
फटै है भोर भए। ए तुमैं का भयौ बड़ी भाबी ? तुमऊ बाबली है रयी
हो कईं ?”
“अरी जा तू, काय मेरो दिमाग़ खा रयी यै सिद्धा। ”
मैंने दादी को गुलाब जामुन खिलाकर नए वर्ष की शुभकामनाएँ दी
हैं, दादी ने मुझे गले लगा कर ढेरों आशीष दिए हैं और हम सारे
बच्चों को बुलाकर अपने कुर्ते की जेब से निकाल कर सौ - सौ रुपए
दिए हैं।
आने वाले वर्ष को बेहतर बना सकने की आशा, अभिलाषा के साथ हम
युवा, देर रात तक हो - हल्ला करते रहे हैं।
***
इस बार गाँव में न्यू ईयर मनाया तुमने बच्चों, कैसा लगा भई?
तुम्हारे शहरों में मनाए जाने वाले नए साल के उत्सवों से कमतर
तो नहीं लगा तुम्हें? बड़े पापा हमसे पूछ रहे हैं।
“बिलकुल नहीं।” हमारा समवेत स्वर गूँजा है।
उदय कुछ न कहने की अपनी पुरानी आदत से मजबूर, बस मेरी और देख
भर रहा है बार-बार। मैं भी ‘मैं क्यों कहूँ?’ की हठ के मजबूत
धागों से बंटी रस्सी में बँधी हूँ। हम अपनी-अपनी चुप्पियों के
दुशालों में लिपटे अगली सुबह वापस अपने-अपने शहर लौट रहे हैं।
सुबह की मंद-मंद, पर सर्द हवा, अपने स्पर्श में ममत्व भर कर
जीवन के मकरंद से भरे गेहूँ के नन्हें-नन्हें, गहरे हरे पौधों
को, नरमाई से सहला रही है। लगे हाथ वह हृष्ट-पुष्ट गन्ने की
फसल के नुकीले, धारदार पोरुओं को भी छेड़ती जा रही है। शीत भरे
आसमान में पँख साधकर उड़ते रंगबिरंगे पाखी, हमारे गाँव के
दशहरिया जोहड़े के पानी पर क्वय-क्वय करती जलमुर्ग़ियाँ आगामी
जीवन के प्रति आशा भरा अनुराग जगा रही हैं। झीने कोहरे की परत
के पार से झाँकती सूरज की रश्मियाँ, चुप्पियों को मन की धरती
से परे धकेल कर कह रही हैं, इस बरस चुप्पियाँ शब्दों का आकार
ले लेंगी…
*(खोड़िया - बारात लौट कर आने से पहले घर की स्त्रियों द्वारा
किया गया नाच - गाना)
*(सन्नाटा - आलू का बहुत ही चटपटा पतला रायता ) |