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कहानियाँ

समकालीन हिंदी कहानियों के स्तंभ में प्रस्तुत है
यू.के. से पुष्पा राव की कहानी- टाइगर मेरा यार


कई महीनों से सोहन बिल्डिंग सोसायटियों के चक्कर लगा रहा था। उसे रिटायर होने में अब दस महीने बाक़ी थे और वह चाहता था कि रिटायर होने के बाद इस शहर को छोड़कर समुद्र के किनारे छोटा-सा बंगला ख़रीदकर अपनी पत्नी माया के साथ आराम से रहे। यह बात उसने कई बार माया से कही, पर माया तो सोच भी नहीं सकती थी कि वह शेफ़ील्ड छोड़कर कहीं और रहेगी। उसके सारे दोस्त और रिश्तेदार शेफ़ील्ड में रहते थे। वह शेफ़ील्ड में ही पैदा हुई थी; स्कूल और कॉलेज भी यहीं था।

उसकी माँ अकेली रहती थी, उसका ध्यान भी माया ही रखती थी। कहने को उसके भाई-भाभी भी शेफ़ील्ड में ही रहते थे, पर भाभी और माँ के रिश्ते इतने गहरे नहीं थे। वैसे भी माँ और बेटी का सम्बन्ध तो अनोखा ही होता है। दोनों को हिन्दी सिनेमा देखने, हिन्दी गाने और टी.वी. पर आने वाले कार्यक्रमों का शौक़ था। जब सोहन अपने दोस्तों के साथ फ़ुटबॉल या क्रिकेट मैच देखने का निश्चय करता, माया जल्दी से माँ के घर चली जाती। देर रात तक दोनों का सिनेमा देखना, गपशप लगाना और तरह-तरह के व्यंजन बनाना उनकी शाम का आधार था।

उस दिन एजेंट का फ़ोन आया और सोहन को पता लगा कि एक बंगला नॉरफ़ोक में बिक रहा है। सोहन की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा। काम के बाद जाकर वह सारी जानकारी ले आया। घर आकर उसने माया को यह बात बताई। माया के लिए यह बहुत ही गम्भीर विषय था। शेफ़ील्ड छोड़कर जाना, परिवार से दूर जाना—वह मन मारकर सोहन की ख़ुशी में शामिल हो रही थी। मन ही मन सोच रही थी कि किसी तरह यह बंगला उन्हें न मिले। शनिवार के दिन सोहन माया के साथ नॉरफ़ोक पहुँचा और क़िस्मत ने सोहन का साथ दिया—बंगला उन्हें मिल गया।

लौटते समय सोहन वही बातें करता रहा—कैसे रिटायर होते ही वे यहाँ आकर रहेंगे, दिन कितने अच्छे होंगे, लम्बी सैर करेंगे, टाइगर (कुत्ता) को समुद्र के पास दौड़ने ले जाएँगे, गोल्फ़ खेलेंगे। छोटा-सा गाँव है, जल्दी दोस्त मिल जाएँगे।

माया हाँ-ना कर रही थी। मन उसका विचलित था—कैसे माँ को बताएगी। अब उनका मिलना मेहमानों की तरह दो महीने में एक बार रहेगा। उन्हें भाभी पर निर्भर रहना पड़ेगा। सारी सहेलियाँ छूट जाएँगी। ख़ैर, अभी छह महीने थे, शायद कुछ बदल जाए। जब इंसान पर मुसीबत आती है तो यही सोचता है कि शायद टल जाए। छह महीने सोहन ने पूरी तैयारी में लगा दिए—हर सप्ताह नॉरफ़ोक जाना, वहाँ घर की मरम्मत करना, बगीचे को ठीक करना, शेफ़ील्ड के घर को बेचने की तैयारी, बड़े घर से छोटे घर में जाने की तैयारी और सामान कम करना।

आख़िर वह दिन आ गया। बड़े-से वैन में सामान लादा गया। माया पहले दिन ही परिवार से मिलकर आ गई। आँखों में आँसू भरकर वह कार में बैठ गई। सोहन तो ख़ुशी से फूला नहीं समा रहा था। उसने बताया कि वहाँ के गोल्फ़ क्लब का सदस्य भी बन गया है। माया के पास पति की ख़ुशी में साथ देने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं था। वह सोच रही थी कि उसके दादा-दादी, नाना-नानी भारत में बूढ़े होकर भी अपने ही बड़े घर में रहते थे। हर साल बचपन में भारत जाकर सब साथ रहते थे। इंग्लैण्ड में रिटायर होते ही लोग अपनी जीवन-शैली बदल देते हैं—छोटी कार, छोटा घर, छोटा शहर।

नई जगह पहुँचकर सोहन बच्चों की तरह फुदक रहा था। वह माया-माया कहकर कुछ-न-कुछ दिखा रहा था। दूसरे दिन सुबह उठकर समुद्र के किनारे सैर की, नाश्ते के बाद बगीचे का काम किया और दोपहर को पब में पहुँचकर लोगों से जान-पहचान बनाई। अगले दिन गोल्फ़ क्लब पहुँचकर दोस्त बनाए। माया को लगा कि उसने सोहन को कभी भी इतने उत्साह से हर काम में हिस्सा लेते हुए नहीं देखा था। थोड़े दिनों बाद हर शाम दोनों तैयार होकर पब पहुँच जाते। छोटे गाँव में पब में कई कार्यक्रम होते थे—कभी क्विज़, कभी गाने, कभी बार्बेक्यू। माया का भी दिल लगने लगा।

कुछ महीने बीते और मार्च का महीना आ गया। टी.वी. पर कोरोना की ख़बरें आने लगीं। कहीं चीन में फैली बीमारी के बारे में सब चर्चा कर रहे थे। मार्च के दूसरे सप्ताह में यह बीमारी इंग्लैण्ड पहुँच गई। लंदन में सोहन का बेटा, बहू और दो बच्चे रहते थे। कुछ ही दिनों में लंदन सब बन्द होने लगा। बेटा मोहन परेशान रहने लगा—कैसे लंदन में रह पाएगा? उसका कारोबार भी बन्द हो गया था। घर का किराया, बच्चों की परवरिश, सारे घर के ख़र्चे—सब सोचकर वह चिन्ता में रहने लगा।

एक दिन उसने अपने माँ-बाप को फ़ोन पर सब बताया। अब सोहन और माया को कहना पड़ा कि वे सब नॉरफ़ोक आ जाएँ। घर छोटा है, पर गुज़ारा कर लेंगे। सोहन ने सोचा, कुछ महीनों की बात है; हालात ठीक हो जाएँगे तो वे लंदन वापस चले जाएँगे। बेटा-बहू पोते-पोती के साथ आ गए। माया बेटे के आगमन से बहुत प्रसन्न थी। सालों के बाद सब साथ रहने आए थे, नहीं तो साल में एक-दो बार मिलने का ही मौक़ा मिलता था।

एक महीना आराम से बीत गया, पर बाद में रोज़ कुछ-न-कुछ झगड़े होने लगे। दो औरतों का एक ही रसोईघर में मिलकर काम करना ज़रा मुश्किल होता है—ख़ासकर सास और बहू। छोटे घर में बच्चों के साथ रहने की आदत नहीं रही थी। कभी-कभी सोहन भी चिढ़ जाते थे। बाहर आने-जाने की मनाही अलग परेशानी का कारण बन रही थी। सारे पब बन्द हो गए थे, गोल्फ़ बन्द हो गया था, लोगों से मिलना-जुलना भी ख़त्म हो गया था। दिन में दो बार समुद्र के किनारे सैर करना और टाइगर को दौड़ाना—यही कर पा रहे थे। पर उन्हें एक बात की तसल्ली थी कि इस गाँव में कोरोना की बीमारी का आतंक इतना नहीं था।

एक दिन सुबह सोहन उठा तो उसे बुख़ार और खाँसी आने लगी। सिर भी भारी लग रहा था। उसने ज़्यादा ध्यान नहीं दिया और दवा लेकर आराम करने लगा। दो दिन बाद तबियत सुधरने के बजाय बिगड़ने लगी। घर में सबने अपने-अपने बचाव का प्रबन्ध कर लिया। सोहन के लिए सन लाउंज में बिस्तर लगा दिया गया। बच्चों को कमरों में बन्द रखने लगे। तीन दिन तक सोहन घर के बाहर वाले कमरे में तड़पता रहा। न माया, न बेटा वहाँ आते—सिर्फ़ टाइगर, उनका कुत्ता, हमेशा पास में रहता। रात के वक़्त सोहन को एम्बुलेंस में डालकर अस्पताल ले गए। कोई बाहर तक नहीं आया। टाइगर एम्बुलेंस के पीछे दौड़ता रहा।

सोहन एक सप्ताह वेंटिलेटर पर रहकर ठीक हो गया। इसमें उसकी क़िस्मत और स्वस्थ शरीर का कमाल था। खिड़की के पास ही उसका बिस्तर था। उसने बाहर देखा—टाइगर वहाँ पहरेदारी दे रहा था। बाद में पता लगा कि टाइगर प्रतिदिन सुबह से शाम तक वहीं रहता था। तीन दिन में सोहन को घर जाने की अनुमति मिल गई। उसने नर्स से घर पर फ़ोन करने के लिए कहा, पर नर्स ने बताया कि वह पहले ही ख़बर दे चुकी है।

जल्दी से अपने कपड़े पहनकर सोहन परिवार का इन्तज़ार करने लगा। शाम हो गई, पर कोई उसे लेने नहीं आया। टाइगर बैठा मालिक का इन्तज़ार कर रहा था। सोहन बाहर निकला, बैंक को फ़ोन किया और निकल पड़ा। कितने ही सप्ताह वह और टाइगर एक होटल से दूसरे होटल, एक शहर से दूसरे शहर घूमते रहे। एक महीने बाद एक अख़बार में गुमशुदा की ख़बर छपी दिखाई दी। सोहन मुस्करा रहा था। अब उसकी शक्ल बिल्कुल उस तस्वीर से नहीं मिलती थी—लम्बे-लम्बे बाल, बड़ी दाढ़ी, जीन्स और कोट में वह एक हिप्पी जैसा लग रहा था। उसे दुख हो रहा था कि कैसे परिवार ने उसे छोड़ दिया, पर उसने भी बदले में सारे बैंक अकाउंट अपने नाम करवा लिए थे। पेंशन भी बदलवा ली थी। अब माँ-बेटे जो करें, उनकी मर्ज़ी।

दूसरे सप्ताह पेपर में उसे ढूँढ़ने वालों के लिए इनाम भी छपा—दो हज़ार पाउंड। वही पेंशन, जिससे घर चलता था। सोहन ने टाइगर को सहलाया, जैसे कह रहा हो—यार, तू ही सच्चा दोस्त साबित हुआ।

१ जुलाई २०२५

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