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साँझ
ढल रही थी और संगी अभी खेल में व्यस्त थी। क्या करे, हुआ कुछ
ऐसे था कि पिछले खेल में मीठू दी हार गयीं थीं तब बोलीं कि एक
और खेलो। संगी क्या करती खेलना पड़ गया। खेल के भी अपने नियम
होते हैं। चाहे जुआ हो या कोई और खेल हो, जब तक हारने वाला
बाजी न छोड़ दे खेल चलता रहता है। तो इसमें बेचारी संगी का
क्या दोष।
खेल भी क्या, वही पत्थर के चार टुकड़े और एक गेंद। हाँ गेंद न
हो तो एक बड़े गोल पत्थर से काम चल जाता है। गेंद उछालो और
पत्थर उठाओ फिर गेंद को लपक लो। गेंद गिरी तो बाजी दूसरे की।
पहले एक-एक पत्थर उठाना है, फिर दो-दो, फिर तीन एक साथ, बाद
में चारों एक साथ। जो पहले कर ले वो जीता। शायद हिन्दुस्तान के
हर छोटे शहर, कस्बे और गाँव में लड़कियाँ इसे खेलती मिलेंगी।
इसमें हाथ और आँख का तालमेल अच्छा होना चाहिये और फुर्ती भी
होनी चाहिये। जो इनमें अच्छा होगा वो जीतेगा।
मीठू दी, संगी के स्कूल में थीं उससे दो क्लास आगे। वो जानती
थीं कि संगी पढ़ाई में तेज है तो सोचा खेल में नहीं होगी क्यों
कि अक्सर ऐसा होता है कि जो बच्चा पढ़ाई में अच्छा हो खेल में
नहीं होता और जो खेल में अच्छा हो पढ़ाई में कमजोर होता है। पर
संगी तो खेल और पढ़ाई दोनों में बहुत तेज थी। संगी इस खेल में
पारंगत है, यह मीठू को पता नहीं था। उसने तो सोचा था वो संगी
से बड़ी है उसे हरा लेगी। वो लगातार तीन बार हार चुकी थी, पर
हार मानने को तैयार न थी। फिर शाम हुयी देख तय हुआ, कि एक
आखिरी बाजी खेल ली जाये और फिर खेल खत्म हो जायेगा, चाहे जो
जीते हारे। बस यही कारण था, कि संगी को रुकना पड़ा। आखिर वही
हुआ जो होना था, और संगी फिर जीत गयी। फिर खेल समाप्त, सब अपने
अपने घर।
संगी को देर होगई थी और उसकी माँ ने उसकी क्लास लगाने की पूरी
तैयारी कर ली थी। संगी घर पहुँची तो माँ शुरू हो गयी - कहाँ थी
अब तक, सूरज डूबा तो दिखा नहीं? याद नहीं आया कि घर जाना है?
पढ़ाई करनी है? क्या घर तुम्हें काटता है जो आने का मन नहीं
करता? याद नहीं आता कि माँ बेचारी बैठी होगी प्रतीक्षा करती?
माँ फिक्र कर कर के मर भी जाये तो तुम्हें क्या चिन्ता? तुमको
थोड़े ही दिखता है?
बेचारी संगी सुनती रही जैसे कि वह देर होने पर हर बार करती थी।
पर माँ तो रुकने का नाम नहीं ले रही थी, बस बोले ही जा रही थी।
संगी क्या करे? फिर उसने वही किया, जो बच्चे अक्सर करते हैं।
उसने अपने पिताजी की ओर देखा। वो समझ गये कि संगी कह रही है,
कि आप मुझे छुटकारा दिलायें। वो बोल पड़े। चलो बेटा माँ को
सौरी बोलो, कल से ध्यान रखना कि देर न हो। अब हाथ मुँह धो कर
पढ़ाई करो। माँ समझ गयीं कि अब बस करनी है, तो अपना आखिरी
व्यंग वाण छोड़ कर चुप हो गयी। बोलीं – बिगाड़ो, जितना मन आये
बिगाड़ो। बाद में जब ससुराल वाले कुछ कहेंगे तो मुझे दोष मत
देना।
फिर क्या, संगी झटपट हाथ मुँह धो कर पढ़ने बैठ गयी। वह विज्ञान
व गणित में बहुत तेज थी, और हमेशा ही क्लास में सबसे आगे होती
थी। यह विषय उसकी रुचि के थे। उसने विज्ञान की किताब ले ली और
पढ़ने बैठ गयी। पढ़ने बैठी ही थी कि उसकी नजर उसकी बड़ी बहन पर
पड़ी जो सामने मेज पर बैठ कर पढ़ रही थी।
बड़ी बहन इस वर्ष ही कालेज में गयी थी। असल में वह पढ़ नहीं
रही थी, पढ़ने का नाटक कर रही थी। उसने अपनी किताब तो खोल रखी
थी पर उसके अन्दर उसने एक फिल्मी पत्रिका रख ली थी और
माता-पिता की नजर बचा कर वह उस फिल्मी पत्रिका को पढ़ रही थी।
संगी की नजर मुख्य पृष्ट पर पड़ी। एक पहचाना सा चेहरा और नीचे
लिखा था - विद्या की पहली फिल्म आ रही है। चेहरे को पहचानने की
कोशिश की तो याद आ गया - यह तो वही लड़की है जो साबुन के
विज्ञापन में थी। अब फिल्मी तारिका बन गयी है।
संगी का दिमाग़ अब पड़ाई में न था, वो खो गयी अपने सपनों की
दुनिया में। उसका सपना था कि बड़ी होकर वो एक मॉडल गर्ल बने और
तरह-तरह के विज्ञापनों में उसकी तस्वीर आये। उसने सुना था,
विज्ञापनों के जगत में काम करने वाली मॉडल जो वस्त्र य आभूषण
पहनती हैं, वो उनके ही हो जाते हैं। वह सोचती थी, उसके पास
कितने ढेर सारे कपड़े और आभूषण होंगे, जरूर एक बड़ा भंडार लग
जायेगा। उसके अपने आलीशान घर के दो-तीन कमरे तो पूरे भर ही
जायेंगे। सपनों की अपनी दुनियाँ होती है, जिस पर सपना पालने
वाले का पूरा अधिपत्य होता है। वह जैसा चाहता है गढ़ लेता है,
और सब लोग सपने पालते हैं।
हाँ संगी ऐसा सपना क्यों न पाले। सब कुछ तो उसके पास है।
सुन्दर चेहरा, बड़ी-बड़ी आँखें, खूबसूरत लाल होट, ऊँची तीखी
नाक, भरे हुए गुलाबी गाल, इकहरा-छरहरा बदन, ऊँचा कद, सब कुछ।
सभी तो उसकी तारीफ करते हैं। जब कभी वह बाजार से निकलती है, तो
कितने ही लोग टकटकी लगा कर देखते हैं। स्कूल में तो सभी समारोह
में उसको रखते हैं। न जाने कितने लड़कों ने उसे कहा है कि वह
सभी फिल्मी तारिकाऔं से भी सुन्दर है। उसे पूरा विश्वास था कि
पहले वह विज्ञापन की दुनियाँ में जायेगी, उसके बाद फिल्म जगत
में। उसे विज्ञापन से फिल्म जगत पहुँचने में समय नहीं लगेगा।
फिर दुनियाँ उसकी मुट्ठी में होगी।
उसे नहीं पता था, कि उस जगत में जाने के लिये सबसे पहले चाहिये
– पहुँच, जान-पहचान और एक अवसर। जो बड़े शहरों की लड़कियों के
लिये तो आसान है, पर छोटे शहरों की लड़कियों के लिये लगभग
नामुमकिन है। इसलिये ही अनुपातन इस जगत में शहर की लड़कियाँ ही
ज्यादा होतीं हैं। न तो उसे इन सब बातों का ज्ञान था, न समझने
की क्षमता। वो तो नादान भोली-भाली लड़की थी, और यह सब उससे
कोसों दूर था। वो कहाँ जानती थी कि यह जगत उसकी पहुँच से परे
है। वो तो सपने बुनना जानती थी, और उन्हें गढ़ लेती थी, जैसे
चाहती थी।
संगी उस दिन भी यही कर रही थी। वो सपनों की दुनिया में खोई थी।
और सपनों में देख रही थी कि वो एक बड़ी-लम्बी गाड़ी में बैठी,
नारीमन पॉइन्ट से गोरेगाँव फिल्म सिटी जा रही थी। यहाँ वह
एनसीपीऐ के सभागृह में बाजार में आये एक नये इत्र के लौंच के
समारोह में आई थी। उसने मंच पर आकर लोगों को बताया, कि इत्र
कितना अच्छा है, वह उसे इस्तेमाल करती है। इस पाँच मिनिट के
काम के लिये उसे इत्र कंम्पनी ने पचास लाख रुपये दिये थे।
पचासों पत्रकारों ने वहाँ उसकी तस्वीर ली थी, कुछ ने प्रश्न भी
पूछा । वह इस कार्यक्रम की मुख्य अतिथि थी - सबसे बाद में
पहुँची और सबसे पहले निकल गयी। क्यों न निकलती, उसे तो अपनी
अगली फिल्म की शूटिंग के लिये गोरेगाँव में फिल्म सिटी में
पहुँचना था।
गाड़ी तेजी से जा रही थी, वो देख रही थी कि फिल्म के सैट पर सब
बेसब्री से उसके इन्तजार में हैं। वहाँ पहले वह अपने मेक-अप के
कमरे में जायेगी। हाँ वहाँ उसका अपना कमरा है, मेक-अप आर्टिस्ट
हैं। पहले वो सब मिल कर उसे तैयार करेंगे, डायलॉग राईटर
बीच-बीच में उसे बताते जायेंगे कि उसे क्या बोलना है। फिल्म
निदेशक बतायेंगे, कि कब और किस अन्दाज में वह किससे क्या
बोलेगी, कहाँ और कैसे खड़ी होगी। कोई उस पर लाईट डालेगा, तो
कोई माइक लिये उसके सामने होगा। सब उसके आगे पीछे घूम रहे
होंगे। फिल्म जगत की अपनी अलग दुनिया है और अपने अलग कायदे
कानून। यहाँ नायक व नायिका पर मुहावरा चरितार्थ है – आधे में
मियाँ मौज, आधे में सारी फौज।
तभी उसे याद आया कि रास्ते में जुहू में उसे अपने बंगले पर
रुकना है। बंगला समुन्दर के किनारे है, और सुबह समुद्र के
किनारे की रेत पर चलना उसे पसंद है, इसलिये ही तो उसने यह
बंगला लिया था। वो हीरों का हार जो पिछले सप्ताह उसने फ्रांस
में पेरिस से खरीदा था, वो भी तो लेना था। उस कंपनी ने कितनी
खुशामद की थी कि वह उनकी ब्रैण्ड दूत बन जाये, और वो बन भी
जायेगी। बात अटकी है पैसों पर, वो क्या देंगे। संगी का काम
देखने वाली कम्पनी चाहती है कि वो हर साल उसे दस करोड़ रुपये
दें। कहते हैं कि एक-दो महीने में बात पक्की हो जायेगी, ऊपर से
हार पहनने के लिये मुफ्त।

संगी आज की शूटिंग में उस हार को पहनना चाहती थी। इतना कीमती
हार हो और उसे पहन कर न दिखाया जाये तो क्या फायदा। उसने
ड्राइवर से गाड़ी जूहू की तरफ लेने को कहा ही था कि तभी उसके
कानों में आवाज पड़ी। माँ चीख रही थी- संगी! सुनती हो या नहीं।
मैं तो आवाज दे-दे कर थक गयी। तीसरी बार बुला रही हूँ पर यह
लड़की है कि सुनती नहीं। खाना तैयार है आकर खा लो। वरना वहीं
आकर कान पकड़ूँगी।
संगी का स्वप्न भंग हो गया। वो वापिस इस जगत में आ गयी तो पाया
कि वो कार में न थी। अपनी कुर्सी पर थी। उसनें आवाज लगाई – माँ
आती हूँ। फिर कुर्सी छोड़, खाना खाने चली गयी। |