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 बतरस से लिखवट                                               पिट्ठू टॉवर

हमारी अम्माँ हमें शारीरिक रुप से कमजोर सा मानती थी, क्योंकि हमारा कद छोटा था। इस कारण हमें किसी भी खेल से जुड़ने नहीं दिया था उन्होंने। बता दूँ दाएँ बाएँ किनारे पर पट्टी लगी निकर पहन कर अपने साथियों को जब फुटबाल खेलते देखता था तो बड़ी इच्छा होती थी कि वैसी ही निकर पहन कर मैं भी उनके साथ हो लूँ। जैसे ध्यान है वह निकर मुझे बहुत आकर्षक लगती थी । लगती क्या थी, अब भी लगती है।
दो ही खेल थे जो हमने बचपन में खेले थे। एक कंचे व दूसरा पिट्ठू।

चट्टानी समुन्द्री किनारों पर घूमने का अपना एक सम्मोहन है। घिसकर या टूट कर ये चट्टानें कई आकारों में बिखरी मिलती हैं। इन फैली छोटी चट्टानों को इकट्ठा कर लोग बहुत कुछ बनाते रहते हैं। सबसे प्रचलित कृति टावर बनाना है। जब भी ऐसा कोई टावर मुझे दिखता था उस पर

एक और पत्थर रख कर उसको ऊँचा करने से मैं अपने नहीं रोक पाता था। इस तरह के टावर को देख पर मुझे हमेशा बचपन में खेला गया पिट्ठू का खेल याद आ जाता है। फोटो में जो ऊँचा टावर है ना उस पर बड़ी मुश्किल से मैं एक और पत्थर रख पाया था। हाँ बगल के अभी शुरु हुए टावर में एक और पत्थर जोड़ना काफी सरल था।

रतन मूलचंदानी
१ सितंबर २०२६

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