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अब इस
उम्र मे दिमाग के पास फुरसत ही फुरसत है। खाली तो नहीं
कहूँगा इसे अन्यथा शैतान यहाँ अपना डेरा बना लेगा। फुरसत
होने के कारण इधर उधर की खोज खबर लेने की आदत डाल दी है
इसने आँखो को।
परसो(२३/६) दोपहर में बीच की
तरफ पैदल हो लिया था। समुद्र शायद निंदियाया था इस कारण
बहुत ही शांत था। जब समुद्र शान्त होता है तो किनारों से
बहुत दूर हो लेता है। इस कारण मेरीवेदर बॉथ से बरबुड बीच
के बीच का किनारा पैदल जाने लायक हो जाता है, अन्यथा कई
बार पानी उस चट्टान से टकरा रहा होता है जो इन दोनो बीचो
के बीच में पड़ती है। पानी वहाँ पर उथला ही होता है इस
कारण जूते उतार कर उसे पार किया जा सकता है। पर बिना जूते
उतारे जाने मे भला लगता है।
कई बार गया हूँ इस चट्टानी किनारे से बरबुड बीच तक। दूर से
इन स्लेटी रंग की चट्टानो पर सफेद-सफेद छोटे-छोटे
बिन्दुनुमा कुछ चिपके दिखाई देते थे। ये बिन्दु भले लगते
थे देख कर। इस बार रुककर गौर से देखा तो पाया कि ये
छोटे-छोटे बिन्दु शंख थे। शंखो का आकार वैसे ही मुझे भला
लगता है उसकी आवाज के अलावा। परन्तु इतने लघु रूप मे मुझे
पहली बार दिखे थे और बहुत ही न्यारे लग रहे थे
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रतन
मूलचंदानी
१ मई २०२६ |