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१. ३. २०२

इस सप्ताह-

अनुभूति में- 1
होली के रंगों से सराबोर, छंद की अनेक विधाओ में रची, गुझिया के रस में पगी अनेक रचनाएँ।

- घर परिवार में

रसोईघर में- होली के अवसर पर अभिव्यक्ति की विभिन्न व्यंजन लेखिकाओं द्वारा प्रस्तुत होली के ढेर से पकवान

सौंदर्य सुझाव -- बेसन, नीबू, हल्दी और नारियल के तेल को मिलाकर बनाए गए लेप से होली के रंग आसानी से छूटते हैं और त्वचा भी स्वस्थ रहती है।

संस्कृति की पाठशाला- जैसे रात्रि के बाद भोर का आना या दुख के बाद सुख का आना जीवन चक्र का हिस्सा है वैसे ही प्राचीनता

क्या आप जानते हैं? कि होली का पर्व राधा-कृष्ण, शिव-पार्वती, प्रह्लाद-होलिका और कंस-पूतना जैसे पौराणिक चरित्रों से जुड़ा हुआ है।

- रचना और मनोरंजन में

गौरवशाली भारतीय- क्या आप जानते हैं कि मार्च के महीने में कितने गौरवशाली भारतीय नागरिकों ने जन्म लिया? ...विस्तार से 

सप्ताह का विचार- जलाने की लकड़ी ही होलिका है जब वह जलती है तब प्रह्लाद की प्राप्ति होती है। प्रह्लाद जो आह्लाद का ही विशेष रुप है। -मुक्ता

वर्ग पहेली-३३५
गोपालकृष्ण-भट्ट-आकुल और रश्मि आशीष के सहयोग से


 

हास परिहास में
पाठकों द्वारा भेजे गए चुटकुले

साहित्य और संस्कृति में-

कालजयी कहानियों के स्तम्भ गौरवगाथा के अंतर्गत
प्रस्तुत है- शिवानी की सुप्रसिद्ध कहानी- लाल हवेली

ताहिरा ने पास के बर्थ पर सोए अपने पति को देखा और एक लंबी साँस खींचकर करवट बदल ली। कंबल से ढकी रहमान अली की ऊँची तोंद गाड़ी के झकोलों से रह-रहकर काँप रही थी। अभी तीन घंटे और थे। ताहिरा ने अपनी नाजुक कलाई में बँधी हीरे की जगमगाती घड़ी को कोसा, कमबख़्त कितनी देर में घंटी बजा रही थी। रात-भर एक आँख भी नहीं लगी थी उसकी। पास के बर्थ में उसका पति और नीचे के बर्थ में उसकी बेटी सलमा दोनों नींद में बेखबर बेहोश पड़े थे। ताहिरा घबरा कर बैठ गई। क्यों आ गई थी वह पति के कहने में, सौ बहाने बना सकती थी! जो घाव समय और विस्मृति ने पूरा कर दिया था, उसी पर उसने स्वयं ही नश्तर रख दिया, अब भुगतने के सिवा और चारा ही क्या था! स्टेशन आ ही गया था। ताहिरा ने काला रेशमी बुर्का खींच लिया। दामी सूटकेस, नए बिस्तरबंद, एयर बैग, चांदी की सुराही उतरवाकर रहमान अली ने हाथ पकड़कर ताहिरा को ऐसे सँभलकर अंदाज़ से उतारा जैसे वह काँच की गुड़िया हो, तनिक-सा धक्का लगने पर टूटकर बिखर जाएगी। सलमा पहले ही कूदकर उतर चुकी थी। आगे-
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डॉ. सरस्वती माथुर की
लघुकथा- सपनों का गुलाल

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जसवीर त्यागी का संस्मरण
ऐसे थे रामविलास
शर्मा
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पूर्णिमा वर्मन से जानकारी
गुझिया की कहानी

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कला दीर्घा के अंतर्गत-
होली आधुनिक शैली की कलाकृतियों में
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होली के अवसर पर विशेष-

पर्व परिचय में-

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बस्तर और छत्तीसगढ़ की होली- अनुराग शुक्ला व योगेंद्र ठाकुर

व्यंग्य में-

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लला फिर आईयो खेलन होली- प्रेम जनमेजय

लोक साहित्य में-

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लोकगीतों में देवी-देवताओं की होली- प्रो. अश्विनी केशरवानी

लघुकथा में-

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सीमा वर्मा की लघुकथा- होली आई रे

कहानियों में-

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रामदरश मिश्र की कहानी— विदूषक

जब भी गाँव जाता हूँ, मन में अपने बचपन के सहपाठियों और मित्रों से मिलने की एक अजीब बेचैनी भरी होती है। इस जीवन-यात्रा में कुछ तो नवयौवन के पड़ाव पर ही अभावों से टूटकर गिर पड़े, जैसे आँधी में‍ टिकोरे। कुछ बाद में टूटे। कुछ बीमारी या अस्‍वस्‍थता की लपेट में आ गए। यानी एक-एक कर न जाने कितने चले गए और कितनों से तो (जो दूसरे गाँवों के थे) युगों से भेंट ही नहीं हुई। पता नहीं, कौन क्‍या कर रहा है, जीवित भी है कि नहीं। गाँव के भी कई सहपाठियों से जमाने से भेंट नहीं हुई क्‍योंकि वे नौकरी के सिलसिले में बाहर रहते हैं। जब मैं गाँव पहुँचता हूँ तो वे नहीं होते, वे पहुँचते हैं तो मैं नहीं होता। यही स्थिति मेरे बचपन के बहुत जीवंत दोस्‍त जोगीराय की थी। वे रेलवे में काम करते थे और अपने ढँग से गाँव आते-जाते रहे होंगे। मैं जब भी गाँव पहुँचता उनके बारे में पूछता - 'आए हैं क्‍या?' आगे...

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