आज सिरहानेउपन्यासउपहारकहानियाँकला दीर्घाकविताएँगौरवगाथापुराने अंक
नगरनामारचना प्रसंगघर–परिवारदो पलनाटकपरिक्रमा पर्वप्रकृतिपर्यटन
प्रेरक प्रसंगप्रौद्योगिकी फुलवारीरसोई लेखक विज्ञान वार्ता विशेषांकहिंदी लिंक
साहित्य संगमसंस्मरणसाहित्य समाचार साहित्यिक निबंधस्वास्थ्य
हास्य व्यंग्य

 

हास्य व्यंग्य

ख़ास बनने का नुस्ख़ा
-
वीरेंद्र जैन


कुछ लोग जीते जी महानता को प्राप्त हो जाते हैं। कुछ लोगों को उसके लिए मरना पड़ता है। मर जाने पर प्रत्येक का महान हो जाना स्वाभाविक होता है। भले ही महानता की सीमा श्मशान घाट और शोक सभा की समय सीमा तक ही रह पाती हो। कुछ की स्वाभाविक मौत तक समाचार बन जाती है भले ही वह चार पंक्तियों वाले संक्षिप्त समाचार तक ही सीमित हो जिसमें देश में उनके नहीं रहने व उम्र का उल्लेख होता है और दो में उनके नामों का ज़िक्र जो उनकी मौत पर दुख व्यक्त करने के लिए ज़िंदा बने हुए हैं व खुश हैं क्योंकि उनका नाम दुख व्यक्त करने वालों की सूची में छप गया है। अख़बार वालों ने किसी भी कारण सही नाम तो छापा।

अधिक पंक्तियों का समाचार बनने के लिए अस्वाभाविक मौत ज़रूरी होती है। पत्रकारिता में पढ़ाया जाता है कि आदमी को कुत्ता काट ले तो समाचार नहीं बनता। यदि आदमी कुत्ते को काट ले तो समाचार बन जाता है। इसी तरह बूढ़े होकर मर जाने वाले का समाचार चार लाइनों से उपर नहीं जाता। ट्रक की चपेट में आने या पंखे से लटक जाने पर ट्रक और पंखे तक का फ़ोटो अख़बार में छप जाता है। यदि विज्ञापन बाजी की यही रफ़्तार रही तो ट्रक वाले और पंखे वाले बड़ी शान से अपने ट्रक व पंखे का विज्ञापन करेंगे कि यह वही पंखा है जिससे लटक कर सुप्रसिद्ध साहित्यकार वरिष्ठ कवि सुकेश शर्मा ने अपनी जान न्योछावर कर दी। मृत्यु से पूर्व वे इसी पंखे की हवा में आराम फ़रमाते थे। मृत्यु के बाद शोक व्यक्त करने वाले इसी के नीचे बैठ कर शोक व्यक्त करेंगे। ज़िंदगी के साथ भी, ज़िंदगी के बाद भी।

शर्मा जी हवा हो गए पर पंखे की हवा अभी भी वैसी ही सरसरा रही है। आदमी चला जाएगा पर पंखा लटका रहेगा। ज़िंदगी का सच्चा लक्ष्य अधिक पंक्तियों का समाचार बनना है। जिस आदमी की मौत तक समाचार नहीं बनती वह सीधा कुम्भीपाक नर्क में जाता है।

आपको पता होना चाहिए कि नर्क के भी कई स्तर होते हैं जिनमें पात्रता अनुसार स्थान मिलता है। इसी से बचने के लिए लोगों के वारिस अपने परिवार के मृतक का फ़ोटो और नाम विज्ञापन की तरह छपवाने लगे हैं। अपनी फ़र्म और फ़ोन नंबरों के उल्लेख सहित मोटे-मोटे अक्षरों में उनके स्वर्गीय होने की घोषणा करना नहीं भूलते। पहले तो मैं समझता था कि ये फ़ोन नंबर उनके स्वर्ग के हैं और वे वहाँ भी व्यापार में जुट गए हैं। शुरू-शुरू में तो मैंने उन प्रकाशित फ़ोन नंबरों पर डायल भी कर दिया और जब उनके बेटे ने उठाया तो मैंने आश्चर्य से पूछा - क्या आप भी पहुँच गए। उत्तर में उसने मेरे पास सीधे आकर मेरी ग़लतफ़हमी दूर की।

कई लोग तो महत्व मिलने की तमन्ना में मरने को भी तैयार बैठे रहते हैं कि चलो ऐसे ही महत्व मिले। लोग बात तो करें उनके बारे में। कविवर उमा चरण जी अपना उत्तराधिकार पत्र तैयार करने लगते हैं जब बीस दिन तक उनकी कोई कविता कहीं नहीं छपती या किसी कवि सम्मेलन का कोई निमंत्रण पत्र नहीं आता। भले ही वह स्थानीय ही क्यों न हो। उन्होंने अपना जीवन कविता को अर्पित कर दिया है पर इन दिनों कविता जिनके क़ब्ज़े में है वे उसे उमाचरण जी के पास पहुँचने ही नहीं देते। बेचारे उसकी एक झलक तक को तरस जाते हैं। इसलिए सोचते हैं कि इस नश्वर जीवन में क्या रखा है। जब कवि सम्मेलन का निमंत्रण प्राप्त होता है तो यह सुखद भ्रम पैदा होता है कि कविता उनके पास है। जब संपादक उनकी कविता माँगता है तो लगता है जैसे कि ज़िंदगी में कितने रंग हैं।

पर जब कोई नहीं पूछता तो उन्हें लगता है कि शायद मौत ही उन्हें पूछे जाने का अंतिम मार्ग प्रशस्त करे। चिंता की आग उनकी रचनाओं को प्रकाशित करने की ज्योति बन जाए। वे आत्महत्या की धमकी-सी देते हुए कहते हैं कि अब जीवन में आनंद नहीं है - समय बहुत ख़राब आ गया है जीने की इच्छा चुक गई है। सोचता हूँ बड़ा मकान बिल्लू को सिविल लाइन वाला डब्बू को और गांधी नगर वाला छोटू के नाम लिख दूँ।

अरे आप कैसी निराशा की बातें कर रहे हैं, मैं उन्हें सांत्वना बँधाना चाहता हूँ।
इसमें निराशा क्या यह तो जीवन का सार आधार है - आएगा सो जाएगा...वे और दुखी होते हैं। इतने में डाक आती है जिसमें किसी कवि गोष्ठी का आमंत्रण होता है। आमंत्रित कवियों में उनका नाम नहीं होता पर वे मानते हैं कि इत्यादि में वे शामिल हैं और जब कार्ड आया है तो श्रोता की तरह तो नहीं बुलाया होगा।
अपने पंख नुमा बालों व धोती कुर्ता या पाजामा शेरवानी में वे कवि ही कवि दिखाई देते हैं। वे अपने दो दर्जन संकलन छपवा कर स्वयं ही विमोचन करवा चुके हैं जिसके स्वल्पाहार की व्यापक चर्चा होती रही है। इस चर्चा से उनकी कविता के बारे में जो थोड़ी बहुत अच्छी बुरी चर्चा हो सकती थी वह भी दब जाती है। आमंत्रण मिलते ही उन्हें वसीयत में कमियाँ नज़र आने लगती हैं क्योंकि छोटू को गांधी नगर की जगह सिविल लाइन वाला मकान ज़्यादा ठीक रहेगा। वे भविष्य में पुन: लिखने के लिए वसीयत फाड़कर फेंक देते हैं।

मृत्यु अकेले होती है इसलिए मृत्यु में हम विशिष्ट होते हैं। जिन्हें विशिष्ट होने का कोई दूसरा रास्ता नहीं सूझता वे मरने की ही तैयारी करने लगते हैं। मैंने कई लोगों को देखा है कि मरने से पहले वे अपनी प्रमुख कविताएँ उनके उपर लिखे लेख तथा बचपन से पचपन तक के फ़ोटो छाँट कर प्रमुख जगह रख देते हैं प्रशस्ति पत्रों पर जमी धूल पोंछ देते हैं तथा स्मृति चिन्ह को अपनी स्मृति बनाए रखने के लिए ब्रासो से साफ़ करवा कर रखवा देते हैं ताकि किसी को ज़्यादा तकलीफ़ न करना पड़े या ज़्यादा तकलीफ़ की आशंका से लिखने वाले उनके जीवनवृत्त की कोई बात छोड़ न दें। मृत्यु विशिष्ट होने का अंतिम अस्त्र है और जाते-जाते उसका भी भरपूर प्रयोग कर लेता है तथाकथित साहित्य सेवक।

9 अगस्त 2007

 

इस रचना पर अपनी प्रतिक्रिया लिखें - दूसरों की प्रतिक्रिया पढ़ें

Click here to send this site to a friend!

आज सिरहानेउपन्यासउपहारकहानियाँकला दीर्घाकविताएँगौरवगाथापुराने अंकनगरनामारचना प्रसंग
घर–परिवार दो पलनाटक परिक्रमापर्व–परिचय प्रकृतिपर्यटन प्रेरक प्रसंगप्रौद्योगिकी फुलवारीरसोई लेखक
विज्ञान वार्ताविशेषांकहिंदी लिंकसाहित्य संगमसंस्मरणसाहित्य समाचारसाहित्यिक निबंधस्वास्थ्यहास्य व्यंग्य

© सर्वाधिका सुरक्षित
"अभिव्यक्ति" व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9–16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।