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संस्कृति



पकौड़ों की समृद्ध परंपरा
- पूर्णिमा वर्मन

 


बरसात की पहली फुहार, सोंधी मिट्टी की जानी-पहचानी महक और मौसम में घुली एक मीठी-सी सिहरन... भारत में मानसून का स्वागत भला चाय और पकौड़ों के बिना कैसे मुमकिन है? सच तो यह है कि गरमागरम पकौड़ों के बिना बरसात का हर रंग अधूरा-सा लगता है। तभी तो आसमान में बादलों के घिरते ही घर-घर की रसोइयों से उठती पकौड़ों की खुशबू वातावरण में घुलने लगती है।

यह केवल एक सुलभ व्यंजन नहीं, बल्कि अपनों को पास लाने और रिश्तों में गर्माहट घोलने का बहाना है। घरेलू बैठकों से लेकर बड़े आयोजनों तक, इसकी उपस्थिति हवा में आत्मीयता भर देती है। घर आए मेहमानों के स्वागत और अपनेपन को व्यक्त करने का इससे सहज और स्वादिष्ट माध्यम भला और क्या हो सकता है? भारतीय जनमानस के इस प्रिय व्यंजन का असली आनंद तो रिमझिम बरसते सावन के साथ ही पूरा होता है।

आलू, गोभी, पनीर, पालक, प्याज़ और ब्रेड के पकौड़े चटनी के चटकारों के साथ हर किसी को पसंद हैं। ये न सिर्फ़ हमारे घरों में बनते हैं, बल्कि एक पसंदीदा स्ट्रीट फूड भी हैं। बाज़ारों में कई जगह पकौड़ों के स्टॉल पर अपनी बारी के इंतज़ार में कतार खड़े लोग दिख ही जाते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि चटपटे पकौड़ों का आरंभ कब और कैसे हुआ?

भारतीय इतिहास

पकौड़ों का सबसे पहला उल्लेख प्राचीन संस्कृत और तमिल साहित्य में मिलता है, जिसमें दाल के तले हुए केक या पकौड़े और कुरकुरी तली हुई सब्जियों का उल्लेख है। *मानसोल्लासा* (११३० ई.) की रसोई की पुस्तक में "परीका" (पकौड़ा) को सब्जियों और बेसन के साथ बनाने की विधि का उल्लेख है। *लोकोपकार* (१०२५ ई.) की रसोई की पुस्तक में भी एक अनोखी पकौड़ी रेसिपी का उल्लेख है, जिसमें बेसन को मछली के आकार के साँचों में दबाया जाता है और सरसों के तेल में तला जाता है।

एक दूसरे मत के अनुसार "पकौड़ा" शब्द संस्कृत शब्द "पक्ववट" से लिया गया है और यह प्राचीन भारतीय पाक परंपराओं से जुड़ा है। "पक्व" का अर्थ है पका हुआ और "वट" अर्थात छोटे टुकड़े। इससे आशय दाल की पिट्ठी के छोटे-छोटे गोल पकौड़ों से है, जिन्हें तेल या घी में तला जाता था। वहीं "भजिया" की उत्पत्ति संस्कृत शब्द "भर्जित" से हुई मानी जाती है, जिसका अर्थ है—तला हुआ।

विश्व में पकौड़ों के समरूप व्यंजन

विदेशी संदर्भों को देखें तो पकौड़े बनाने की पहली विधि रोमन पाकशास्त्र की पांडुलिपि *एपिसियस* में मिलती है, जिसके बारे में माना जाता है कि इसे ४०० ई. के आसपास लिखा गया था। पुरातत्त्वविदों को चीन में तांग राजवंश के दौरान और स्विट्ज़रलैंड में ३,६०० ई.पू. के काल के ऐसे खाद्य पदार्थों के साक्ष्य मिले हैं। मध्यकालीन इतिहास में शाही खानपान में मांसाहारी पकौड़े भी शामिल किए गए। उस समय विभिन्न प्रकार के पकौड़ों में अंडा पकौड़ा, मटन पकौड़ा और चिकन पकौड़ा आदि का उल्लेख मिलता है।

खाद्य इतिहासकारों के अनुसार जब पुर्तगाली १६०० के दशक की शुरुआत में गोवा और मालाबार तट पर आलू (जिसे वे "बटाटा" कहते थे) लाए, तब ये भारतीय व्यंजनों का हिस्सा बने। इन्हें भारतीय मसालों और बेसन के घोल के साथ मिलाकर बटाटा वड़ा बनाया गया, जो आज भी पश्चिमी भारत में अत्यंत लोकप्रिय है। इसी बटाटा वड़ा को पाव (गोवा में पुर्तगाली उपनिवेशवादियों द्वारा लाया गया एक प्रकार का ब्रेड) के भीतर रखकर मुंबई का प्रसिद्ध वड़ा पाव बनाया गया। समय के साथ आलू और पाव दोनों ही भारत में व्यापक रूप से उगाए और बनाए जाने लगे। कुछ खाद्य इतिहासकारों का मानना है कि समुद्री व्यापार के दौर में पुर्तगालियों के संपर्क से भारतीय तली हुई खाद्य परंपराओं का प्रभाव जापान तक पहुँचा, जहाँ आगे चलकर टेम्पुरा जैसी विधा विकसित हुई। यह तथ्य भी रोचक है कि तले हुए घोल-आधारित व्यंजनों की परंपरा विश्व की अनेक सभ्यताओं में मिलती है।

भारतीय उपमहाद्वीप के पकौड़े, अंग्रेज़ों के फ्रिटर्स और मध्यपूर्व के फलाफल एक ही प्रकार के व्यंजन के विविध रूप हैं। पकौड़े का घोल बेसन से बनता है, फ्रिटर्स के लिए मैदे का घोल इस्तेमाल किया जाता है, जबकि फलाफल के लिए उबले चनों को पीसकर मिश्रण तैयार किया जाता है। आज भारतीय पकौड़े, जापानी टेम्पुरा, अंग्रेज़ी फ्रिटर्स और मध्यपूर्व के फलाफल अलग-अलग नामों और रूपों में दिखाई देते हैं, किंतु इनमें एक साझा सूत्र है—घोल या पिसे हुए पदार्थ में लिपटी सामग्री को तलकर कुरकुरा और स्वादिष्ट बनाना।

भारतीय पकौड़ों की परंपरा

भारत में हर प्रदेश के पकौड़े अपनी-अपनी बोली बोलते हैं। राजस्थान का मिर्ची वड़ा तीखेपन का स्वाद देता है तो मध्यप्रदेश का आलू बोंडा सड़क किनारे की दुकानों की पहचान है। दिल्ली और पंजाब की तरफ़ बढ़ें तो पनीर पकौड़ों का स्वाद भी कुछ कम नहीं। दाल से बने दही बड़े में भी तले हुए घोल की वही परंपरा दिखाई देती है जो पकौड़ों में मिलती है।

उत्तर प्रदेश के प्याज़ पकौड़े, बिहार के प्याजू और ओडिशा की प्याजी बरसात के मौसम में विशेष रूप से बनाए जाते हैं। पश्चिम बंगाल की बेगुनी और कुम्हड़े के फूल की भाजा, गुजरात के मेथी ना गोटा तथा कश्मीर के नादिर मोनजी अपने-अपने क्षेत्र की खाद्य परंपराओं का परिचय देते हैं। झारखंड का पलाश पकौड़ा राज्य के आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों का एक अनूठा और पारंपरिक व्यंजन है। पलाश के फूलों (टेसू) को बेसन, मसालों और चावल के आटे के साथ मिलाकर कुरकुरा होने तक तला जाता है। औषधीय गुणों से भरपूर यह पकौड़ा चटनी के साथ बेहद स्वादिष्ट लगता है।

आंध्र प्रदेश की मिरपकाया बाज्जी में जहाँ मिर्च के बीच में चीरा लगाकर खट्टे-मसालेदार (जैसे इमली और अजवाइन के) पेस्ट भरे जाते हैं, वहीं राजस्थान में कम तीखी मोटी मिर्च के भीतर आलू का चटपटा मसाला भरा जाता है। मैंगलोर बोंडा दक्षिण भारत के कर्नाटक राज्य, विशेष रूप से तटीय मैंगलोर और उडुपी क्षेत्र का एक अत्यंत लोकप्रिय और स्वादिष्ट नाश्ता है। इसे स्थानीय तुलु भाषा में "गोली बाजे" भी कहा जाता है। मैंगलोर बोंडे और मध्यप्रदेश के आलू बोंडे का नाम एक होते हुए भी इनमें कुछ अंतर है। मैंगलोर बोंडा मैदे, खट्टे दही, चावल के आटे, हरी मिर्च, अदरक, करी पत्ता और मसालों के मिश्रण से बनी छोटी-छोटी तली हुई पकौड़ी होती है, जबकि मध्यप्रदेश का आलूबोंडा आलू के चटपटे मसाले पर गाढ़े बेसन का लेप चढ़ाकर तला जाता है।

आमतौर पर सभी पकौड़े नमकीन और चटपटे होते हैं, लेकिन पझम पोड़ी, जिसे एथक्का अप्पम भी कहते हैं, पके हुए केलों को मैदे के मीठे घोल में लपेटकर तलकर बनाई जाती है। यह केरल का एक बेहद लोकप्रिय और स्वादिष्ट पकौड़ा है। दक्षिण भारत के अन्य प्रदेशों में वाझक्कई बाज्जी, मेंगलूर बोंडा, महाराष्ट्र की कांदा भजिया और पझमपोड़ी जैसे रूप दिखाई देते हैं। साथ ही मेदु वड़ा भी पकौड़े का ही एक रूप है। यहाँ हम मुंबई के बटाटा वड़ा और वड़ा पाव को एक बार फिर याद कर सकते हैं।  भारत में सभी तरह के पकौड़ों के घोल के लिए बेसन, सूजी या चावल के आटे का प्रयोग किया जाता है, जबकि व्रत-उपवास में कूटू, सिंघाड़े या राजगीरा के आटे का प्रयोग होता है। हर प्रदेश के अपने मसाले भी इसमें योगदान करते हैं।

भारत जैसे विविधताओं से भरे देश में पकौड़ा केवल एक व्यंजन नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक सेतु है। इनके नाम भले ही अलग-अलग हों, पर वर्षा की पहली फुहार के साथ चाय के प्याले के पास उसकी उपस्थिति पूरे देश में एक-सी दिखाई देती है। स्वाद के इस छोटे-से टुकड़े में भारतीय जीवन की आत्मीयता, साझापन और उत्सवधर्मिता समाई हुई है, जिसमें बच्चों की भी आनंदमय उपस्थिति हर जगह दिखाई देती है। शायद यही कारण है कि पकौड़े बाल-साहित्य तक में अपनी जगह बना चुके हैं। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की ये पंक्तियाँ देखिए—

दौड़ी-दौड़ी आई पकौड़ी, मेरे मन को भाई पकौड़ी!
छुन-छुन-छुन-छुन तेल में नाची, प्लेट में आ शरमाई पकौड़ी।
हाथ से उछली मुँह में पहुँची, पेट में जा घबराई पकौड़ी।
दौड़ी-दौड़ी आई पकौड़ी, मेरे मन को भाई पकौड़ी!

१ जुलाई २०२५

 
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