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 ललित निबंध

 

मध्याह्न का काव्य
- काका कालेलकर


वेद में मध्याह्न का जैसा वर्णन है, वैसा किसी दूसरे ग्रंथ में नहीं। मध्याह्न एक बड़ा शिकारी कुत्ता है और वह आकाश में दौड़ता है। उसने जीभ बाहर निकाल रखी है, उसमें से ज्वाला निकलती है। यह कुत्ता किसका होगा? सूर्य का या उसके पुत्र का? यम जी भास्कर हमेशा कुत्ते लेकर घूमते हैं, लेकिन उनकी चार-चार आँखें होती हैं। भास्कर राव से ही उन्हें वे कुत्ते मिले होने चाहिए। स्वयं बारह आँखों वाले हैं, इसलिए चार आँखों वाले कुत्ते उनके ही पास होंगे।

मध्याह्न को कुत्ते की उपमा देने वाले नये कवि हरींद्रनाथ चट्टोपाध्याय हैं। उनके फीस्ट ऑफ यूथ (यौवन की मेजबानी) नामक काव्य-संग्रह में ऐसा ही चित्रण देखने को मिलता है। कवि त्रिभुवन व्यास ने मध्याह्न का वर्णन करने का प्रयत्न किया है। जबकि आज के मध्याह्न का अनुभव करने के बाद ऋतुसंहार में मिलता ग्रीष्म का वर्णन ही ध्यान में आता है। मध्याह्न के त्रास से पीड़ित चूहा, सर्प के फण की छाया लेने में भी नहीं हिचकता। दूसरे क्षण दुर्वासा का भाई विश्वामित्र याद आता है। उसने हरिश्चंद्र का सत्य परखने के लिए चंद्रभानु को भयंकर तपाया था। फिर भी हरिश्चंद्र का सत्य तो नहीं ही पिघला। यह बात अलग है कि कोमल रोहीदास भी उससे विचलित न हुआ।

ऐसी ही प्रखर धूप में, एक बार मुझे बचपन में नंगे पाँव दवा लेने जाना पड़ा था। म्युनिसिपैलिटी के लालटेन के खंभे और घर की दीवारें कंजूस की तरह अपनी छाया अपने ही पाँव तले दबाकर खड़ी थीं, इसलिए मेरे पाँवों को छाया का आश्रय कहाँ से मिलता? सड़क से गुजरे परोपकारी पशुओं ने गोबर के चोथ गिराए थे। वह भी दिखता तो क्षणभर के लिए उस पर जा खड़ा होता। उसकी ठंडक कितनी मीठी लगती! पाँव से चिपककर उसके यदि सूखे उपले बनते तो जरूर वे पादत्राण (चप्पल) की गरज न रखते। ऐसे समय गोबर जैसी वस्तु गंदी नहीं लगती। नफ़रत या सौंदर्य आखिर वस्तुगत नहीं, भावनागत हैं।

उस दिन धूप पर मैं अंतिम बार चिढ़ा। उसके बाद मैं हमेशा धूप से प्रेम ही करता आया हूँ। यह परिवर्तन किस कारण हुआ, यह जानना मुश्किल है। त्राटिका नाटक में प्रतापराव अपनी नवोढ़ा वधू को धूप में चाँदनी कहकर ले जाता है। उसके साथ का समभाव उसे ऐसा ही लगा हो, कौन जाने? पर ऐसा नहीं है। सचमुच ही धूप का रंग मुझे खूब पसंद है। कितनी ही वस्तुओं के प्रति हम तटस्थ नहीं हो सकते, इसलिए उसका सौंदर्य खो देते हैं। बिहार में तालाब पर लाल रंग की काई जमती है। उससे अंजीरी रंग के गलीचे की कैसी अनोखी शोभा फूटती है! लेकिन तालाब के पानी में जाने पर तो पाँव ही फिसलता है, और फिर वह पीने लायक नहीं होता। इस कारण उसका स्मरण कर आदमी कड़वा मुँह बनाता है। आदमी उपयोगिता के ख़्याल से जब तक निकल नहीं जाता, तब तक सौंदर्य-प्रेम समझ नहीं सकता।

मेरा तर्क यह है कि जिस धूप में कोमल फूल खिलते हैं, उस धूप में आप दोष कैसे निकाल सकते हैं? जो धूप केले के पेट का पानी भी नहीं लूटती, उसे त्रासदायक कहा जा सकता है?
धूप पूरे जोश में लगती हो, उस समय आकाश की शोभा खास देखने लायक होती है। दूध दुहने के समय जैसे भैंस आँखें बंद कर निस्तब्ध खड़ी रहती है, उसी तरह आकाश धूप की छाया छोड़ता ही रहता है। नहीं दिखते बादल, नहीं दिखती चाँदनी। चाँद होता भी है तो बासी रोटी के टुकड़े की तरह कहीं पड़ा रहता है। सर्वत्र एक ही रस फैला हुआ होता है। उसे वीर रस कहें या रौद्र? मैं तो उसे शांत रस ही कहूँगा। शांत रस शीतल ही क्यों होता है? तप्त क्यों नहीं होता?

गरमी के दिन अपेक्षाकृत रमणीय होते हैं, ऐसा प्रमाण-पत्र देने की कोई ज़रूरत नहीं। मध्याह्न भी कुछ कम रमणीय नहीं होता—मात्र उस रमणीयता को परखने की दृष्टि चाहिए। इतना ही, दोपहर भर सड़कें जैसे सूनी होती हैं, गाँव-गाँव के बीच का अंतर बढ़ता है, शहर में अभी भी अधिक बस्ती समा सकती है, ऐसा भास होता है। और जैसे ईश्वर की इस लीला के आगे चराचर सृष्टि तो क्या, मानव-प्राणी भी स्तब्ध हो जाता है।

धूप का आनंद परखता है केवल पवन। वह सुख से इच्छानुसार दौड़ता है। नदियों के ऊपर भी दौड़ता है और पहाड़ों के ऊपर से भी दौड़ता है। समुद्र हो या मैदान हो, उसे दौड़ने में ज़रा भी कठिनाई नहीं होती। उसे गोबर की चप्पल नहीं ढूँढ़नी पड़ती। वह जा-जाकर वृक्षों से पूछता है, "क्यों, अच्छी तरह हैं न?" आलसी वृक्ष आवेश से सिर हिलाकर जवाब देते हैं, "क्यों नहीं, क्यों नहीं?" आकाश में उड़ती चीलें भी धूप के रस में आनंद मनाती हैं। ज़रा भी जल्दीबाज़ी किए बिना गोल-गोल उड़ती वे ऊपर जाती हैं और फिर उतने ही धैर्य से नीचे उतरती हैं—जैसे प्रशांत सागर के यात्री जहाज़।

ऐसी धूप में यदि सफ़र का प्रसंग आए तो शुरू में एक घड़ी जो तकलीफ़ होती है, बस उतनी ही। लेकिन एक बार पसीना छूटा, फिर तो ऐसा आनंद आता है जैसे तालाब में स्नान कर रहे हों। हाँ, पाँव तले रेत हो तो पाँव के बिस्कुट ज़रूर बनेंगे, लेकिन यह दोष कोई धूप का नहीं है।
अन्यस्मात् धबधपदो नीचो प्रायेण युस्सहो भवति।
रविरपि न दहति तादक् यादक् दहति वालुका-निकर।।

मनुष्य चाहे तो इसका उपाय कर सकता है। राजस्थान के लोग जो जूते पहनते हैं, उसमें ऊपर की छोटी जीभ की जगह मोर की कलगी जैसा चमड़ा ही लगा होता है। रेत में चलने पर रेत तो खूब उड़ेगी ही, लेकिन इस कलगी के कारण पाँव बच जाते हैं। राजपूत इसे क्या कहते हैं, कौन जाने? अरसिक अंग्रेज़ इसे सैंडगार्ड (रेत-रक्षक) कहेंगे। मैं तो इसे जूते की कला कहूँगा।

सुबह-शाम की अपेक्षा मध्याह्न में आकाश का रंग कुछ हल्का होता है, इसलिए ही धूप इतनी अच्छी लगती है। खग्रास ग्रहण के समय धूप में कालापन आता-जाता है और आकाश भी ऐसा गमगीन दिखता है कि उसे आश्वासन देने के लिए तारों को भी दौड़ आना पड़ता है। इसकी अपेक्षा तो चतुर्दिक फैला फीका आकाश हज़ार गुना अच्छा। और इसमें यदि हल्के बादल आ जाएँ तो, तो संगमरमर की शोभा ही देख लें।

लेकिन धूप का आनंद प्रत्यक्ष मिलता हो तो उस समय शब्द लिखने का भी नहीं सूझना चाहिए। अधिक लिखना हो तो लेखनी भी सूख जानी चाहिए। फिर कवि विलियम कूपर विलाप करे तो भी स्याही के बिना वह लिख कैसे पाएगा?

शांति-निकेतन में गर्मी के दिन थे। भारी दोपहरी में कविश्री से मिलने गया था। मैंने उनसे कहा—
"असमय आकर आपको तकलीफ़ दे रहा हूँ।"
उन्होंने कहा, "आपने भी तो तकलीफ़ उठाई है न!"

मैंने कहा, "नहीं, मुझे तो धूप अच्छी लगती है, मैं तो इसका आनंद लूटता हूँ।" यह सुनने के साथ कविश्री एकाएक खुश हो गए और बोले, "हैं! आपको भी धूप में आनंद आता है? जब बहुत धूप होती है तब मैं तो खिड़की के आगे आराम-कुरसी डालकर लू में नहाता हूँ। मुझे इसमें खूब ही आनंद आता है। पर, मैं तो समझता था कि ऐसा शौकीन अकेला मैं ही हूँ।"

मैंने डरते-डरते विनोद किया, "रवि को अपनी धूप न पसंद हो तो वह कहाँ जाएगी?"

(‘जीवन का आनंद’ से)

 

१ जून २०२६

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