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बरसात में भजिया
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कंदर्प
अरब
सागर की अथाह मटमैली जलराशि के किनारे
गर्व से दप-दपाती इस द्वीप-नगरी को अब
बारिशें भिगोने लगी हैं। कालिदास के
मेघ की तरह उत्तर-गमन करते मानसून ने
लगता है अपनी कोहनी मुंबई में टिका दी
है और यदि कहूँ कि पालथी मारकर बैठ
गया है तो अतिशयोक्ति न होगी। वैसे
बरसात से आम मुंबईकर का विचित्र नाता
है। वे कहते हैं न— *तुम बिन रहा भी न
जाए और तुम्हें सहा भी न जाए!* लेकिन
हर परिस्थिति में स्वयं को 'एडजस्ट'
कर लेने वाली यह नगरी समय-असमय पड़ती
इन बौछारों को भी साल-दर-साल बड़े जतन
से आत्मसात कर लेती है।
दिनचर्या में तुरत-फुरत बदलाव कर लिए
जाते हैं। छाते, रेनकोट बाहर आ जाते
हैं। घरों में सीलन-प्रबंधन का
कार्यक्रम आरंभ होने लगता है। आउटडोर
को तिलांजलि देकर इंडोर खेलों और
कार्यक्रमों की रूपरेखा बनने लगती है
और बाहर के खाने, यानी स्ट्रीट फूड,
पर अंकुश लगाने की कोशिशें होने लगती
हैं।
किंतु मायानगरी के रोम-रोम में
रचे-बसे स्ट्रीट फूड कल्चर पर अंकुश
धरा जा सकता है क्या? नहीं, नहीं धरा
जा सकता। इसलिए तो झमाझम बरसते मौसम
में भी इन खानों की अनवरत आपूर्ति
जारी रहती है। रसीले सांभर में डूबे
कुरकुरे मेंदू वड़े की प्लेट अभी भी
बड़े चाव से लपकी जाती है। बारीक कटे
प्याज़ और धनिए से सजी-परोसी पाव-भाजी
का स्वाद अब भी जिह्वा पर बना रहता है
और मुँह में पानी भर देने वाली मसाला
डोसे की महक इस मौसम में भी हवाओं में
रची रहती है। वैसे इन खानों की
फेहरिस्त और भी लंबी है— तीखे
मसालेदार मिसल, उसे टक्कर देता उसल,
दालवड़ा, साबूदाना वड़ा, साबूदाना
खिचड़ी और न जाने क्या-क्या! और इन
सबके ऊपर लोकप्रियता के शीर्ष पर
विराजमान है मुंबई का वड़ापाव!
वड़ापाव मुंबई के स्ट्रीट फूड का
बादशाह है। उसे कोई चुनौती नहीं देता।
किंतु इस मौसम में एक विलक्षण बात यह
होती है कि भजिया, और उसमें भी कांदा
भजिया की लोकप्रियता इसे टक्कर देने
लगती है।
मुंबई के मेरे शुरुआती दिनों में ऐसे
ही मौसम में एक महाराष्ट्रीयन मित्र
ने पूछ लिया था—
"भजिया खाएगा?"
मैंने जिज्ञासावश हामी भर तो दी थी,
लेकिन जब प्लेट आँखों के सामने आई तो
मेरा उत्तर भारतीय मन चिहुँक उठा।
"अरे, ये तो पकौड़े हैं!"
"हाँ... और भजिया बोलने से स्वाद कम
नहीं हो जाएगा। अब भजिया बोलने की आदत
डाल ले।"
खैर, आदत तो मैंने डाल ली, किंतु इस
भीगते-सीलते मौसम में आज भी कभी-कभी
मन बरसों की यात्रा करता हुआ पीछे की
ओर दौड़ने लगता है तो घर के आँगन में
माँ दिखाई दे जाती है— स्टोव पर लोहे
की बड़ी-सी कड़ाही चढ़ाकर उसमें सरसों
की तीखी गंध वाला तेल गरम करती हुई।
थोड़ी ही देर में प्याज़ के छल्ले,
बेसन के घोल में लिपटे हुए, गरम तेल
में तड़-तड़ करते हुए कुरकुरे होने
लगते हैं। माँ के कंधे के इर्द-गिर्द
लिपटी मेरी छोटी-छोटी बाँहें उन
गरम-गरम पकौड़ों के कड़ाही से बाहर
आने की बेसब्री से प्रतीक्षा करती
हैं।
पकौड़े बचपन का हमारा फास्ट फूड थे।
माँ के हाथों से सहर्ष परोसा गया
इंस्टैंट आइटम। न जाने कितने ही
आकस्मिक अवसरों पर झटपट तैयार हो जाने
वाला खाना था पकौड़ा। विचार उठता है
कि कदाचित प्राचीन भारत का पहला फास्ट
फूड भी यही रहा होगा, या फिर अलग तरह
से कहूँ तो आज के फास्ट फूड का जनक।
देखिए... आप सोच रहे होंगे कि लेखक
महोदय कहाँ बहते चले जा रहे हैं।
किंतु क्या करूँ? विचारों के अश्व रुक
ही नहीं रहे। वैसे एक विचार यह भी आता
है कि क्या आज का फास्ट फूड भी ममता
में तला-पगा हो सकता है? मैकडॉनल्ड्स
से पिज़्ज़ा और बर्गर ऑर्डर करती आज
की पीढ़ी को देख रहा हूँ। सोचता हूँ,
क्या इस फास्ट फूड में वह ममत्व हो
सकता है जो उन पकौड़ों में था? पता
नहीं।
हाँ, पकौड़ों के बारे में कुछ और भी
है जो तनिक विलक्षण है। भारत में लगभग
सौ से अधिक प्रकार के पकौड़े विभिन्न
शहरों में, विभिन्न स्वादों में,
विभिन्न मसालों में लिपटे और विभिन्न
नामों से पहचाने जाने वाले मिल
जाएँगे। महाराष्ट्र और दक्षिण भारत की
भजिया, मध्य भारत का आलू बोंडा, उत्तर
भारत का पकौड़ा और बंगाल का पकुरा।
उत्तर भारत का कद्दू के फूल और केले
का पकौड़ा तो कश्मीर का कमल-नाल का
पकौड़ा।
शाकाहारियों को प्रिय पनीर का पकौड़ा
है तो मांस-प्रेमियों को अज़ीज़
डीप-फ्राइड फिश पकौड़ा। इसके रूप अनेक
हैं— कटहल का पकौड़ा, कंदमूल का
पकौड़ा, कॉर्न पकौड़ा, चाइनीज़
पकौड़ा, चिली पकौड़ा, मेथी का पकौड़ा,
साबूदाने का पकौड़ा, चावल का पकौड़ा
और न जाने क्या-क्या!
किंतु इतनी विविधताओं में भी यह
पकौड़ा ही है। फिर चाहे यह कश्मीर में
हो या कर्नाटक में, बंगाल में हो या
राजस्थान में। इसकी आत्मा वही है। रूप
अलग हो सकता है, स्वाद अलग हो सकता
है, किंतु भीतर से यह पकौड़ा ही है।
कदाचित यह अनेकता में एकता की उत्तम
मिसाल है, भारतीयता का अद्भुत नमूना
है।
सोचता हूँ, भारत की अनेकता में एकता
का एक कारण यह भी रहा है कि पुरातन
काल से ही अनेक सभ्यताओं और
संस्कृतियों को अपने में समाहित करती
जाती इस भारत-भूमि ने उन सभ्यताओं और
संस्कृतियों के विविध अंगों को
आत्मसात कर उन्हें अद्भुत बना दिया
है— यहाँ तक कि उनके व्यंजनों को भी।
तब जिज्ञासा यह भी जगी कि पकौड़े का
अतीत क्या है? क्या पकौड़ा कहीं बाहर
से तो नहीं आया है, या फिर यह विशुद्ध
रूप से इसी धरा में उपजा व्यंजन है?
फिर गूगल बाबा को खँगाला गया।
थोड़े-बहुत परिश्रम के बाद पता लगा कि
सबसे पहले जिस ग्रंथ में इसका उल्लेख
आया है, वह है बारहवीं सदी का ग्रंथ
*मानसोलासा*। चालुक्य नरेश सोमेश्वर
तृतीय द्वारा संपादित राजनीति, कला,
नीति, खगोल, चिकित्सा, वास्तु, काव्य
और पाकशास्त्र का अनुपम रत्न। मन सोच
में पड़ गया। सोचता हूँ, इस भारत-भूमि
पर ऐसे विचारवान और ज्ञानी शासक भी
हुए, जिन्होंने ऐसे ग्रंथों का
निर्माण किया! और फिर आज का राजनीतिक
परिदृश्य भी मस्तिष्क में घूम जाता
है। ...खैर... देखिए, कहाँ से कहाँ आ
गए। बात चली थी मुंबईया मानसून की और
पहुँच गए राजनीति तक।
वैसे आज वर्षा रानी की विशेष कृपा
रही। हमेशा की तरह छाता ऑफिस में ही
छूट गया और बारिश को मौका मिल गया।
पानी की बौछारों में भीगते-भागते जो
घर पहुँचा तो देखा, ड्रॉइंग रूम की
सेंटर टेबल पर नाश्ता लग चुका था—
गरम, कुरकुरे प्याज़ के पकौड़े और साथ
में हरी धनिए की चटनी। फटाफट कपड़े
बदलकर वापस टेबल के पास आ गया।
ड्रॉइंग रूम में लता दीदी की सुरीली
आवाज़ गूँज रही थी—
"रिमझिम गिरे सावन, बहक-बहक जाए
मन..."
मेरी नज़र प्लेट पर पड़ी। तनिक सोच
में पड़ गया हूँ। इन्हें पकौड़ा कहूँ
या भजिया? वैसे कुछ फ़र्क तो नहीं
पड़ता। लेकिन हाँ, यह बात तो है कि
"पकौड़ा" कह देने से मुंबई और लखनऊ की
दूरी तनिक कम हो जाती है।
१ जुलाई २०२४ |