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''दियासलाई जब चिराग़ रोशन कर
देती है तो उसे फेंक देते हैं.।''
''फूल महल'' की गद्दी पर बैठे सौगंधी लाल मुझे अपने तजुर्बे की
बातें सिखाते रहते हैं।
''अपनी बातों में, फूलों के हारों में इतने चुटकुले लतीफ़े
टाँकते जाओ कि साला ग्राहक इस में उलझता ही चला जाए और फिर हार
के मुँहमाँगे दाम वसूल कर लो।'' वह बड़ी ज़ोर से हँसते, इस
उम्मीद के साथ कि मैं भी उन का साथ दूँगा, मगर उनकी बातों में
उलझ कर सूई मेरी उँगली में चुभ जाती है।
सौगंधी लाल अपनी गद्दी पर बैठे
दिन भर नोट गिन-गिन कर रसीदें काटते रहते हैं। हर ग्राहक से
ऐसे बात करते हैं जैसे जन्म-जन्म का नाता हो। दिन भर ग्राहकों
का जमघट, नई-नई फ़रमाइशें और सौगंधी लाल की डाँट ''राजू, राजी,
अबे राजू!''
''फूल महल'' के साइन बोर्ड को हमने रंगबिरंगी रोशनी से ऐसा
सजाया है कि दूर से देख कर ग्राहक खिंचा चला आए। तरह-तरह के
बूटे, झिलमिलाते हार, फूलों के साथ लिपटे हुए काँटों से मेरे
हाथ लहूलुहान हो जाते हैं, मगर मुझे यह काम अच्छा लगता है।
भाग-दौड़ कुछ नहीं आराम से बैठे फूलों के हार गूँथे जाओ और
सौगंधी लाल के साथ-साथ हँसना सीख लो नहीं तो वह नाराज़ हो जाते
हैं। |