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कहानियाँ

समकालीन हिंदी कहानियों के स्तंभ में इस सप्ताह प्रस्तुत है
संयुक्त अरब इमारात से पूर्णिमा वर्मन की कहानी- 'उड़ान'


अल्बर्ट अबेला से कॉफी लेकर जब साक्षी क्लास में पहुँची तब पहले ग्रुप के प्रेज़ेंटेशन का अंत होने को था। यानी कॉफ़ी आराम से ख़त्म की जा सकती थी। मैम आना गवासा की ओर हल्की सी गुड मार्निंग उड़ाकर वह अपने व्याख्यान को मन ही मन दोहराने लगी। सामने वाले दूसरे छोटे ऑडिटोरियम में सहर मसूद अपने लैपटॉप को प्रोजेक्टर से जोड़ प्रेजेंटेशन की तैयारी में लग चुका था। साक्षी को देख उसने राहत की साँस ली।

“सब कुछ ठीक है ना?” साक्षी ने पूछा।
“अकीद।“ सहर मसूद ने थम्सअप वाली मुद्रा बनाई।
मैडम आना पहले वाले प्रेज़ेंटेशन के बाद पाँच मिनट के लिए अपने ऑफ़िस में जाएँगी। उसके बाद शुरू होगा साक्षी और मसूद का टेस्ट।

टेस्ट बढ़िया रहा। प्रेजेंटेशन में नए जोड़े गए एस.वी.जी. ग्राफ़िक्स ज़बरदस्त थे। रातों रात मसूद ने इन्हें फ्रेंच लाइब्रेरी से उड़ाकर फ्रेंच टैक्स्ट को अंग्रेज़ी में परिवर्तित कर दिया था और अंत में दिखाई गई स्वाफ़ मूवी तो एकदम जानलेवा थी। जबरदस्त काम कर डाला था मसूद ने। उस पर साक्षी की साफ़ दमदार अंग्रेज़ी... विरोधी टीम के तीखे सवाल और साक्षी के सुलझे जवाब। आना गवासा खुश और जंग फ़तह।

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