समुद्र से ३६०० फुट की ऊँचाई
पर स्थित अमरकंटक प्राचीन काल से ही ऋषि मुनियों की
तपस्थली, लक्ष्मी जी की शरण स्थली और उमा महेश्वर के विहार
स्थल के रूप में प्रसिद्ध है। यहाँ के पुजारी जी ने हमें
बताया कि यहाँ आज भी शंकर जी के डमरू की आवाज़ सुनाई देती
है। यही कारण है कि यहाँ झरनों के किनारे, पहाड़ों की
गुफ़ाओं में और आश्रमों में ऋषि मुनि ध्यानस्थ होते हैं।
स्वामी रामकृष्ण परमहंस आश्रम के प्रभारी जी ने बताया कि
अमरकंटक का वातावरण स्वस्थ है। साधना के लिए यह बहुत ही
उपयुक्त है। यहाँ ब्रह्म के कण विद्यमान हैं जो मन को
शांति प्रदान करते हैं।
सूर्य सिर के ऊपर चढ़ आया
था और हमें नाश्ता नसीब नहीं हुआ था। या यों कहें कि यहाँ
के नैसर्गिक अलभ्य सुषमा के पान करते इतना समय गुज़र गया।
नाश्ता करके फिर हमारा काफिला यहाँ के दर्शनीय स्थलों-माई
का बगिया जो नर्मदा कुंड से मात्र ३ कि.मी. दूर है, सोनुमुड़ा जो उद्गम से २ कि.मी देर है, देखने के बाद
नर्मदा कुंड से लगे प्राचीन मंदिरों को देखने गए। यहाँ पर
९ वीं और ११-१२वीं शताब्दियों में निर्मित अनेक मंदिर हैं।
इनमें केशवनारायण, पंचमहला, कर्णेश्वर और जालेश्वर महादेव
मंदिर प्रमुख है। इन मंदिरों के समीप स्थित कुंड को
वास्तविक 'नर्मदा कुंड' माना जाता है।
बहुत कम लोगों को
मालूम होगा कि यहाँ नर्मदा और सोन नदी के अलावा अन्य किसी
नदी का भी उद्गम है? यहाँ से तीसरी 'जोहिला नदी' निकली है।
वास्तव में इन नदियों के बारे में यहाँ प्रचलित
जनश्रुतियों के अनुसार ब्रह्मा की आँखों से दो अश्रु
बूँदें टपके जो आगे नर्मदा और सोन नदी कहलाए। राजा मैकल के
घर नर्मदा युवती के रूप में जन्मीं। उसके विवाह के लिए
मैकल राजा ने घोषणा की कि जो कोई बकावली का फूल तीन महीने
के भीतर लाएगा उसी से राजकुमारी नर्मदा का विवाह किया
जाएगा। राजकुमार सोन (शोण) के रूप और गुण पर नर्मदा पहले
से ही मुग्ध हो गई थी। वह बकावली का फूल भी ले आया मगर
थोड़ी देर होने पर नर्मदा अपनी सहेली जोहिला को उसका पता
करने भेजा। जोहिला भी अनिंद्य सुन्दरी थी। शोणभद्र जोहिला
के अनिंद्य सौंदर्य पर मोहित हो गया। जोहिला के मन में भी
कपट आ गया और वह अपना सब कुछ राजकुमार शोणभद्र के उपर
निछावर कर बैठी। जोहिला को आने में विलंब होते देख
राजकुमारी नर्मदा स्वयं गई। वहाँ राजकुमार को जोहिला के
साथ प्रेमालाप करते देख गुस्से से काँपने लगीं और एक कुंड
में कूदकर प्राण त्याग दिये। कुंड में ऐसा तूफ़ान आया कि कुंड की जलधारा
उलटी दिशा में पश्चिम की ओर बहने
लगी। शोणभद्र ने भी असफल प्रेमी की तरह अमरकंटक की पहाड़ी
से कूदकर अपनी जान दे दी। जोहिला के भ्रमजाल ने
नर्मदा और शोणभद्र को मिलने नहीं दिया। तभी तो लोकगीतों
में इसे इस प्रकार गाया जाता है:-
माई नरबदा सोन बहादुर,
जोहिला ला तई नई बिहाय,
गोड़े के पैरी उतार नरबदिया, जोहिला ल लै पहिराय।
अमरकंटक में हमने देखा कि
नर्मदा कुंड से ६ कि.मी. की दूरी पर कपिलधारा में नर्मदा
१५० फीट नीचे गिरकर प्रपात बनाती है। यहाँ से थोड़ी दूर पर
नर्मदा दूध की धारा बनाकर १० फीट नीचे गिरती है। उसी तर्ज़
में सोन नदी ३०० फीट नीचे गिरती है। यहाँ के गर्भ में
बाक्साइट है जिसे निकालकर बाल्को भेजा जाता है। खानों के
विस्फोट यहाँ के वातावरण में कंपकपी पैदा कर देते
हैं। इसी प्रकार ''वंशगुल्म'' के नाम से प्रसिद्ध अमरकंटक
आज बांस के कटीले पेड़ों से वंचित होता जा रहा है। अब तक
हमारा मन यहाँ के मनोरम दृश्यों को देखकर प्रफुल्लित हुआ
जा रहा था। अचानक हमारी नज़र घड़ी के उपर पड़ी। चार बजने
को आ रहा था और हमें बड़ी ज़ोर की भूख लग रही थी। हमने
वन के बीच 'केंवची'
में खाना खाकर थोड़ा विश्राम किया और यादगार स्मरण लिए
वापसी को लिए रवाना हुए। अनायास हमारे मन में लोकगीत के ये
बोल फूट रहे थे -
चलो रे भैया, चलिहें
नरबदा के तीर
परब के दिन आयो
दिन आयो रे अनमोल
परब के दिन आयो।
गंगा नहायो, जमुना नहायो
अब देखिहै मैया तेरी नीर
परब के दिन आयो रे भैया... |