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दीपदान का लोकपर्व  दीवाली
—प्रमिला कटरपंच

दीवाली भारतीय संस्कृति का सबसे महत्वपूर्ण पावन पर्व हैं। हर गाँव नगर और प्रांतों में हर जाति एवं धर्म के लोग इस पर्व को मनाते हैं। दीवाली को त्योहार का रूप देने में भारतीय संस्कृति के लोक-व्यवहारों का प्रमुख योग रहा हैं। घरों की सफ़ाई दीवाली के कई दिन पूर्व से की जाती है। गाँवों और क़स्बों में आज भी लोग-बाग स्वयं अपने घरों की सफ़ाई दीवाली से हफ़्तों पहले प्रारंभ करते हैं। घरों की लिपाई और पुताई का प्रचलन आज भी दृष्टिगत होता है। गाँवों में जहाँ कच्चे मकान मिट्टी के बने होते हैं, वहाँ गोबर की लिपाई दीवारों, छतों और फ़र्श पर की जाती हैं। गोबर गंदे वातावरण को दूर कर कीटनाशन गुण रखने वाले पदार्थ हैं। हमारे स्वास्थ्य के लिए भी गोबर की उपयोगिता को वैज्ञानिकों ने स्वीकार किया है।

शहरों में जहाँ मकान पक्के बने होते हैं वहाँ मकानों पर कलई, सफ़ेदी की पुताई अथवा रंगों की सजावट की जाती हैं। चूना भी कीटनाशक पदार्थ हैं। दीवारों और छतों पर चूने की पुताई करके हम अपने घर के वातावरण को स्वच्छ और शुद्ध बनाते हैं। घरों की सफ़ाई में ही निहित हैं और अपने गाँव और शहर की सफ़ाई और नगर की स्वच्छता में ही छिपा हुआ हैं, वहाँ के निवासियों का स्वास्थ्य। इस प्रकार दीवाली के अवसर पर की जाने वाली घरों की सफ़ाई में हमारे नगर प्रांत और देश की स्वच्छता और हमारे स्वास्थ्य की भावना प्रवाहित होती है। इतना ही नहीं एक दूसरे के मकानों की सफ़ाई में हम लोग आपस में सहयोग करते हैं। समाज के कल्याण और दूसरों की भलाई करने के लिए यह सहयोग व्यापक रूप ग्रहण कर लेता हैं, जिसमें हमारी यह भावना अंतर्निहित रहती हैं कि हम दूसरों के स्वास्थ्य और साफ़ रहने की कामना करते हैं।

दीवाली के अवसर पर घरों में चौंक पूरे जाते हैं। दरवाज़ों पर रंगोली रचाई जाती हैं और आँगन में अल्पना सजाई जाती हैं। घर के मुख्य द्वार पर "शुभ लाभ" लिखना अथवा गणेश और लक्ष्मी की मूर्ति बनाने की प्रथा आज भी दृष्टिगत होती है। कहीं-कहीं तो घर के मुख्य दरवाज़े पर दोनों ओर रंग-बिरंगे हाथी बनाए जाने की प्रथा भी हैं। हाथी लक्ष्मी का सहचर हैं और गणेश बुद्धि तथा सफलता के देव हैं। दीवाली से ही व्यापारी लोग अपना नया साल शुरू करते हैं। शुरू करने को ही श्री गणेश भी कहा जाता है। अत: लक्ष्मी गणेश और हाथी के चित्र हमारे पारिवारिक और सामाजिक जीवन में आने वाले वर्ष के लिए सुख, समृद्धि और सफलता की कामना के प्रतीक हैं।

शुभ गणेश का प्रतीक हैं और लाभ लक्ष्मी का। इसलिए दीवाली के दिन लक्ष्मी के साथ-साथ गणेश की भी पूजा होती हैं। लक्ष्मी सामाजिक समृद्धि का आधार स्तंभ हैं, जिसकी कामना ग़रीब और अमीर सभी करते हैं। लेकिन केवल समृद्धि ही सब कुछ नहीं हैं। लक्ष्मी (धन) के सदुपयोग के लिए बुद्धि और विवेक की आवश्यकता होती हैं। बुद्धि और विवेक के अभाव में धन का दुरुपयोग होने से हमारा नैतिक पतन अवश्यंभावी हैं। हमारे आसपास ऐसे उदाहरण कम नहीं हैं, जहाँ धन की बहुतायत वाले परिवार दुराचरण और अनैतिकता के रास्ते पर चलते-चलते पतन की ओर अभिमुख होते देखे गए हैं। अत: आज के इस पावन पर्व दीवाली के अवसर पर हम लक्ष्मी और गणेश दोनों की पूजा करके सदाचार, विवेकशील और समृद्धिशाली होने की अपनी मनोकामना व्यक्त करते हैं।

दीवाली के दिन घरों पर दीप जलाए जाते हैं और रंग-बिरंगी रोशनी की जाती है। सामाजिक जटिलताओं के कारण दीपावलियों की रोशनी के रूप में और प्रकार में अंतर आ जाता रहा है। हमारी प्रगति की परिचायक विज्ञान के सहारे हम रंग-बिरंगे बिजली के बल्बों का प्रयोग इस अवसर पर करने लगे हैं। मोमबत्तियों से भी रोशनी की जाती है। मूलरूप मे दीपावली दीपों की रोशनी का उत्सव हैं। मिट्टी के दिये में तेल डालकर रूई की बाती बनाकर दिये जलाए जाने की हमारी लोक परंपरा आज भी अपनी लोक संस्कृति को आलोकित करती है। तेल तरल होता है और वह किसी भी वातावरण में अपने को ढाल लेता है। समाज में परिस्थितियों के अनुकूल समायोजित करने की यह कला से क्यों न सीखे। रूई सफ़ेदी होती है, जो सतोगुण का प्रतीक और निर्मल पावनता का द्योतक है। दीपावलियों की यह ज्योति हमारी आंतरिक प्रसन्नता को व्यक्त करती है।

शादी विवाह के अवसर भी हमारे समाज में रोशनी की जाने की परंपरा है। रंग-बिरंगी रोशनी से आलोकित भवन को देखकर कोई भी व्यक्ति यह सही अनुमान लगा सकता है कि वहाँ खुशियाँ मनाई जा रही है। प्राचीनकाल में जब राजा युद्धस्थल से विजयी होकर वापस लौटते थे तो भी नगर और राज्य में रोशनी की जाकर विजय का स्वागत और प्रसन्नता को आलोकित किया जाता था। राष्ट्रीय पर्व गणतंत्र और स्वतंत्रता दिवस पर भी हम अपने घरों में रोशनी करके स्वतंत्र गणतंत्र के नागरिक होने के गौरव की खुशी प्रकट किए बिना नहीं रहते। अयोध्या के राजा राम द्वारा रावण का वध करने के पश्चात विजयी होकर लौटने पर अयोध्या नगर में खुशी और प्रसन्नता का वातावरण छा गया। इसीलिए दीपों की रोशनी की गई और दीवाली का उत्सव मनाया गया। अस्तु ऐतिहासिक और पौराणिक रूप में भी दीपावलियों हमारी खुशियाँ और प्रसन्नता का प्रतीक है।

दीपावली का यह उज्जवल आलोक अमावस्या के अंधकार को समाप्त-सा करता प्रतीत होता है। अंधकार पर प्रकाश की विजय के इस पर्व पर हमारी संस्कृति का यह श्लोक "तमसो माँ ज्योर्तिगमय" "हे प्रभु मुझे अंधकार से प्रकाश की ओर ले चल" मुखरित होता है। और हमारे अंतर्ज्ञान को प्रकाशित करता है। आत्मविश्वास और आत्मशक्ति का संचार करने वाला यह श्लोक हमें सुमार्ग की ओर प्रेरित करता है। चलना तो हमें स्वयं ही है। हम ईश्वर से केवल यही प्रार्थना करते हैं कि वह हमें प्रकाश के माध्यम से प्रेरणा देकर सन्मार्ग पर चलने और सद्कार्य करने की शक्ति और क्षमता प्रदान करे। दीपावली के दिन कुमारी कन्याएँ और विवाहित महिलाएँ थाली में जलते हुए दीपों को सजाकर दीपदान करती हुई आज भी गाँव और छोटे क़स्बों में देखी जा सकती हैं। समय के चक्र में हमारी लोक संस्कृति को शहरों में पनपने नहीं दिया है। परंतु वह गाँव में आज भी मौलिक रूप से विद्यमान है।

राजस्थान और मालवा में तो दीपदान की प्रथा बड़े शहरों में भी दिखाई देती हैं। दीपदान में ये महिलाएँ आस-पड़ोस में घर-घर जलते हुए दीपक बाँटती फिरती है। दीपदान का यह व्यावहारिक रूप एक परिवार से दूसरे परिवार में चलता हैं। हम अपने इष्ट मित्रों और पारिवारिक संबंधियों के घरों में दीपदान करते हैं। दीपों का आदान-प्रदान होता हैं और उसी क्रम में दूसरे परिवार की महिलाएँ भी हमारे घरों में आलोकित दीप लेकर आती है। जलता हुआ दीपक हमारे स्नेह और सदाचार की कामना प्रतीक है। प्रसन्नता को प्रकट करने वाले आलोकित दीपक को समाज में आपस में बाँटते हुए हम एक दूसरे से अपनी प्रसन्नता, समृद्धि और सहयोग का वितरण समाज में करते हैं। सुख और समृद्धि में ही हमारी खुशी समाहित होती है। प्रसन्नता और समृद्धि के प्रतीक दीपदान में हमारी लोक संस्कृति की लोक कल्याण और लोक सहयोग की कामना प्रकट होती है।

दीपदान के इस पावन पर्व पर दीपावली के त्योहार में छिपी अपनी लोक संस्कृति को हम चिरस्थायी बना सकें। ऐसा सोचने समझने और करने की आवश्यकता है। लोक संस्कृति की रक्षा का दायित्व सरकार और समाज दोनों का है परंतु इस क्षेत्र में सरकार उतना महत्वपूर्ण कार्य नहीं कर सकती जितना हमारा समाज कर सकता है। क्या हम यह आशा कर सकते हैं कि दीपदान की यह परंपरा गाँवों और क़स्बों से बाहर निकलकर बड़े शहरों में आए और स्नेह और सद्भाव का वातावरण बनाने में सहायक हो। दीपदान के पर्व पर कुछ तो ऐसा कार्य करें - शुभकामनाएँ और खुशियाँ आपस में बाँटे और सहयोग की इस भावना में निष्ठा को सम्मिलित करें। औपचारिकता के धुँध को चीर कर सच्ची भावना से हम अपनी अपने परिवार और समाज की और फिर देश और विश्व की सुख समृद्धि की कामना करते रहें। आओ, दीपदान के इस लोक पर्व पर हम सद्भावना के साथ आपसी मैत्री सहयोग और भाईचारे की भावना की त्रिवेणी में अवगाहन करें।

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